विज्ञापन ने ढँका क्रिकेट के खेल को

  • 18 दिसंबर 2010

मुश्किल है कि आप निराशावादी या आशावादी हुए बिना और अपनी भावनाओं को दबाए रख कर किसी घटनाक्रम का गवाह बनें. खेल तो नाटकीय घटनाक्रमों का थियेटर होता है और इसके नायक जिन बहुस्तरीय प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं उनका अपना एक अलग जीवन संसार होता है.

विकेट गिरता हो, गेंद बाउंड्री के पार जाती हो, आसमानी कैच ली जाती हो या फिर अविश्वसनीय रन आऊट की कोई घटना, अंतत: इन घटनाओं में शामिल लोगों की प्रतिक्रियाएँ ही हैं जो खेल देखने को एक रोमांचक अनुभव बनाती हैं.

खेल न तो ठंडी आंकड़ेबाज़ी है, औ न ही भावशून्य विश्लेषण. ये दर्शकों से भी जुड़ा होता है जो ख़ुद को खिलाड़ियों की उत्तेजना, पीड़ा और ख़ुशी से जोड़ लेते हैं. तमाशबीनों के बिना न तो खेल होगा और न ही लालची धंधेबाज़ों को इसकी बदौलत पैसा बटोरने का मौक़ा मिलेगा.

ये बातें उछलती गेंदों के सामने भारत की दुर्गति बनते देखते समय मेरे में आई. संभव है ये हाल देख कर भारतीय टीम के कई प्रशंसकों का दिल बैठा जा रहा हो. कुछ प्रशंसक शायद ये सोच कर संतोष करें कि ये सिर्फ़ एक बार का भटकाव है और जैसे-जैसे सिरीज़ आगे बढ़ेगी सब कुछ ठीक होता जाएगा. मैं ये सब न तो भारत के पहले दिन के खेल की निंदा करने के लिए लिख रहा हूँ, न ही टीम से सहानुभूति प्रगट करने के लिए.

बेचारा दर्शक

गेंद को लाईन से दूर उड़ते-दौड़ते और बल्लेबाज़ों को बचते-झुकते देखना अपने आप में विशेष है. ऐसे में जब विकेट भी गिरते हों, जैसा कि स्टेन और मोर्केल की दक्षिण अफ़्रीकी जोड़ी के सामने दिखा, तो मैच से जुड़े हर व्यक्ति और ख़ास कर दर्शकों के लिए ये एक अदभुत अनुभव होता है.

दर्शक इस प्रदर्शन को जारी रहते देखना चाहते हैं, न सिर्फ़ एक्शन के लिए बल्कि अपने नायकों की पीड़ा और निराशा भरी प्रतिक्रियाओं को देखने के लिए भी. तबाही मचाने वालों के चेहरे पर ख़ुशी और पिटने वालों के चेहरे पर निराशा के विरोधाभासी भाव, खेल देखने के अनुभव को दिलचस्प बनाते हैं.

लेकिन भारतीय टेलीविज़न पर भी ये सब देखना असंभव है क्योंकि किसी बल्लेबाज़ के आऊट होने या ओवर ख़त्म होने के साथ ही स्क्रीन पर अटपटे विज्ञापन छा जाते हैं. कोई एक्शन पूरा होने से पहले ही स्क्रीन पर विज्ञापन दिखने लगते हैं. और जब खेल दोबारा स्क्रीन पर आता है तो बहुत से लोग ये तक भूल चुके होते हैं कि विज्ञापन दिखाए जाने से पहले क्या हो रहा था.

खेलों के लाइव टेलीकास्ट के धंधे से जुड़े पक्षों के लिए सिर्फ़ मुनाफ़ा ही मायने रखता है. प्रसारण अधिकार बेचते-ख़रीदते समय वे दर्शकों के बारे वे सबसे कम सोचते हैं.

ऐसा नहीं है कि ये सब अचानक आज हुआ हो. ये सब लंबे समय से चल रहा है, और दर्शकों के प्रति खेल प्रशासकों के तिरस्कार भाव को देखते हुए लगता नहीं कि ये स्थिति भविष्य में बदलने वाली है. इसलिए हम लाचार क्रिकेट प्रशंसक क्रिकेट मैच को गहन भावनाएँ पैदा करने वाले मुक़ाबले के बजाय एक रोबोटिक प्रतियोगिता की तरह देखने को बाध्य हैं.

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