अतुलनीय लक्ष्मण

वीवीएस लक्ष्मण

जोसेफ़ कोनराड के रहस्यम, फिर भी हीरोनुमा काल्पनिक चरित्र लॉर्ड जिम की तरह, वी वी एस लक्ष्मण भी – छह फ़ीट से केवल एक या दो ईंच नीचे हैं, कसे बदन वाले हैं और आपके सामने सीधे आते हैं, कंधों को थोड़ा तिरछा झुकाए, सिर आगे किए हुए, नीचे से ऊपर की ओर देखते हैं बिल्कुल स्थिर नज़र से – बस फ़र्क ये है कि उनको देखकर आपको किसी आक्रमण करते हुए सांड़ की याद नहीं आती बल्कि याद आती है एक ऐसे इंसान की जो अपनी इस धौंस जमानेवाली शारीरिक बनावट को लेकर थोड़ा संकोच रखता है.

वो जिस कला का महारथी है, और जो उसका पहला पेशा है, वो है अपनी ओर आती चमड़े की एक गेंद की गति और उसके स्पिन का सामना करना और उसे क्रिकेट के मैदान में अलग-अलग जगहों पर मोड़ देना, बिना किसी हिंसा के संकेत या सबूत के.

जैसा कि राहुल भट्टाचार्य अपनी किताब "पंडित्स फ़्रॉम पाकिस्तान" में लिखते हैं – वीवीएस की कला में कहीं कोई ताक़त नहीं दिखती, ना कोई दुर्भावना, ना कोई छोटापन. ये बिना टकराव वाली है, मासूम है, प्यारी है.

ऐसा कोई बल्लेबाज़ ढूँढना मुश्किल है जिसमें एक सांड़ की तरह के शारीरिक गुण हों और किसी बहते बादल की तरह की रेशमी मुलायमियत.

ऐसे किसी आदमी को ढूँढना भी मुश्किल होगा जो कि लकड़ी के एक चौड़े टुकड़े का, जो इतना मज़बूत है कि किसी को पीटकर मारा तक जा सके, ख़ूबसूरत स्ट्रोक्स लगाने के लिए एक नाज़ुक साधन की तरह इस्तेमाल करे.

अतुलनीय

वो साल जो अब बीत गया, उसमें उसने दिखाया है कि उनकी इस उत्कृष्टता में कुछ ऐसी लचक है जो कि इस्पात की तरह कठोर हो सकती है या फिर उसमें ऐसी कोमलता हो सकती है जो अपनी अटलता से पहाड़ों को भी चकनाचूर कर दे.

इस साल में उन्होंने, पारी दर पारी, स्ट्रोक दर स्ट्रोक, क्रिकेट जगत को चमत्कृत किया और ऐसी कई क्लासिक पारियाँ खेलीं जिनसे कि हम उनकी पहचान एक दुर्लभ महान खिलाड़ी के रूप में करें, ऐसा खिलाड़ी जिसकी दुनिया में किसी और के साथ तुलना ना हो सके.

उनका खेल एक सहवाग के हिंसक खेल के जैसा नहीं, उनका खेल एक द्रविड़ के तकनीकी तौर पर परिष्कृत खेल जैसा नहीं, उनका खेल निर्दयी तेंदुलकर के भयानक भूख जैसा नहीं.

उनके खेल में एक शांत लय है, एक अदम्य स्वीकारोक्ति है इस बात की – जो होगा, होगा...भविष्य देखना हमारे बस में नहीं – और संभवतः इसी बात से वो मुश्किल-से-मुश्किल तनाव का भी उस बौद्ध भिक्षु की तरह सामना करते हैं जो मानता है कि दुनिया दिमाग़ के भीतर बसती है ना कि बाहर.

बुनियाद

भारत के क्रिकेट की सीढ़ी के सबसे ऊपरी पायदान पर पहुँचने के सिलसिले की नींव उन्होंने ही रखी थी, 2001 में कोलकाता के ईडेन गार्डेन्स के मैदान पर अपनी महागाथानुमा पारी से.

बीते दशक में, जब हम चोटी की ओर बढ़ रहे थे, इस दौरान कई ऐसे मज़बूत पड़ाव आए कि ये भूलना सहज है कि इसकी शुरूआत कैसे और कहाँ हुई.

और एक बार जब वहाँ पहुँच गए, तो भी पिछले एक वर्ष में कई बार ऐसा हो सकता था जब हम उस बुर्ज से नीचे फ़िसल गए होते.

अपनी कोलकाता की उस पारी की ही तरह, वे एक बार फिर तब बल्लेबाज़ी के लिए उतरे जब हमने सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं, क्योंकि हम मान बैठे थे कि भारत की सारी उम्मीदें मर चुकी हैं.

उनके खेल का सौंदर्य इस बात में नहीं है कि रोगी को कैसे बिल्कुल ठंडे, डाक्टरी तरीक़े से ठीक किया जाता है, बल्कि उनका सौंदर्य रोगी को जीवन से भरा एक गर्मागर्म चुंबन देता है जिससे लगता है कि आप नई ख़ुशी और नए उत्साह के साथ इस सारी दुनिया को गले लगा लें.

अब जबकि हम नए साल में प्रवेश कर रहे हैं, और लक्ष्मण के जीवन में भी एक और साल जुड़ गया है और वे एक खिलाड़ी के जीवन की गोधूलि बेला के निकट पहुँच रहे हैं, मुझे रॉबर्ट ब्राउनिंग की वो जादुई पंक्तियाँ याद आती हैं - "Grow old along with me, the best is yet to be."

हैप्पी न्यू ईयर!

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