वन डे सिरीज़ और सवाल

युवराज सिंह

दक्षिण अफ़्रीका के साथ रोमांचक टेस्ट श्रृंखला देख दिमाग़ी तौर पर थक जाने के बाद अब वहाँ हो रहे एकदिनी क्रिकेट के मुक़ाबलों का मेरे लिए लगभग कोई मतलब नहीं है.

इससे पहले कि मेरी इस बात से बौखलाए क्रिकेट प्रशंसक तलवारें निकाल लें और मुझपर ईशनिंदा का आरोप मढ़ने लगें, मैं अपनी स्थिति स्पष्ट कर देना चाहता हूँ.

मुझे पता है कि ये एकदिवसीय श्रृंखला भारतीय टीम की अंतिम परीक्षा के समान है और इससे, जैसा कि हममें से बहुतेरे मानते होंगे, विश्व कप के लिए तैयारी का एक सबसे अच्छा मौक़ा मिलेगा.

विरोधी टीम और परिस्थितियाँ इतनी कठिन हैं कि ये आनेवाली बड़ी परीक्षा की तैयारी का एक आदर्श अवसर है.

अब देखा जाए तो किसी को भी इस लीक पर जाती हुई सोच में कोई समस्या नहीं दिखाई देनी चाहिए.

लेकिन इसके बाद आपको बस ये करना है कि आप 2003 में हुए विश्व कप के लिए भारत की तैयारियों की याद कर लें, जब न्यूज़ीलैंड ने उनकी ज़मीन पर हमें इस तरह धराशायी कर दिया था कि तब बल्ले को गेंद के सामने रख भर देना एक बहुत बड़ी बात बनकर रह गई थी.

हम बिना ठीक तैयारी के, बल्कि मानसिक रूप से बुझे-बुझे से, विश्व कप में खेलने गए और इसके बावजूद हम फ़ाइनल तक पहुँचे.

इसके लिए बहुत हद तक न्यूज़ीलैंड में हमारे घटिया प्रदर्शन का बहुत बड़ा महत्व था.

अब मैं वापस उस बात पर आता हूँ जहाँ से मैंने शुरू किया था.

एक दिवसीय मैचों को लेकर बोरियत इसलिए हो रही है क्योंकि यहाँ मामला कुछ ऐसा है मानो शानदार भोज से पेट भर लेने के बाद आपको जबरन ऐसी मिठाई खिलाई जा रही हो जिसमें कुछ ऐसी ख़ास बात नहीं है.

दलीलें और दम

क्रिकेट का तर्क लिया जाए तो मैं इस बात से उनलोगों से सहमत हो सकता हूँ जिन्हें लगता है कि विश्व कप की तैयारी का ये सबसे अच्छा तरीक़ा है, हालाँकि इतनी ही संख्या में वे लोग भी होंगे जिन्हें अत्यधिक क्रिकेट से होनेवाली थकान और महत्वपूर्ण खिलाड़ियों के घायल हो जाने का भय सता रहा होगा.

भारत की तेज़ गेंदबाज़ी इससे प्रभावित हो भी चुकी है और दो प्रमुख दिग्गज – सहवाग और गंभीर – एक दिवसी मैचों के शुरू होने से पहले ही घायल होकर मैदान से बाहर हैं.

भारत को इस श्रृंखला में नहीं खेलना चाहिए, ये माननेवाले लोग एक और बात ये उठाते हैं कि विश्व कप उस माहौल से बिल्कुल दूसरे तरह के माहौल में खेला जाएगा जैसा कि दक्षिण अफ़्रीका में होता है.

उछाल लेती हुई गेंदें दक्षिण अफ़्रीका में घातक होती हैं, लेकिन उनका भारत में कोई मतलब नहीं है, इसलिए इस श्रृंखला से होगा केवल ये कि उन बल्लेबाज़ों का आत्मविश्वास कमज़ोर होगा जो रन नहीं बना पाएँगे.

अब चूँकि खेल, और वो भी क्रिकेट जैसा खेल, उसमें तरह-तरह के ऐसे सिद्धांत चलते हैं जिन्हें बिना अधिक सोच-विचार के बनाया जाता है, और ऐसे में कोई तरीक़ा नहीं है जिससे ये पता लगाया जा सके कि किसकी सोच सही है.

ऐसे में जबकि हममें से अधिकतर लोग जो हुआ उसकी चीर-फ़ाड़ करने में माहिर हैं, आइए इंतज़ार करें विश्व कप के समाप्त होने का और तब हम उस दलील को सही साबित करने में दम लगा देंगे जिससे कि मतलब सिद्ध होता हो.

क्योंकि ये बात यूँ ही नहीं कही गई है, कि – समझदारी के सभी स्वरूपों में, जो हो गया उसके आधार पर बात करना, सबसे कम निर्दय और सबसे कम अक्षम्य होता है.

क्या ये बेहतर नहीं है कि घटना होने के बाद चालाक बना जाए, ना कि उसके पहले बेवकूफ़.

(लेखक अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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