विश्व कप के चर्चित चेहरे

जावेद मियांदाद

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जावेद मियांदाद को पाकिस्तान का अब तक का सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ कहा जा सकता है. मियांदाद ने अपने पहले ही टेस्ट मैच में न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध 1976 में शतक लगाकर पाकिस्तान के पहले कप्तान अब्दुल हफ़ीज़ कारदार की बात को सच साबित कर दिया कि वह 70 के दशक की सबसे बड़ी खोज हैं.

मियांदाद को महान क्लासिक बल्लेबाज़ों में तो नहीं गिना जाता लेकिन क्रिकेट से बाहर के जितने शॉट मियांदाद के पास थे वह शायद दुनिया में किसी दूसरे खिलाड़ी के पास नहीं थे. मियांदाद ने पहले विश्व-कप से लेकर 1996 तक होने वाले सारे विश्व कप में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व किया. मियांदाद ऐसे एकमात्र खिलाड़ी हैं जिनकी बल्लेबाज़ी का औसत टेस्ट में कभी भी 50 से नीचे नहीं आया.

भारत और न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध वे ख़ास तौर से प्रभावी रहे हैं. पाकिस्तान की ओर से सबसे ज़्यादा दोहरा शतक लगाने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है. भारत के विरुद्ध टेस्ट मैच और वनडे दोनों में मियांदाद ने कई यादगार पारियाँ खेली हैं. उनका टेस्ट का सर्वाधिक स्कोर 280 नाबाद भारत के विरुद्ध है जबकि शारजाह के मैदान पर चेतन शर्मा की अंतिम गेंद पर छक्का लगाकर मियांदाद ने वनडे क्रिकेट को एक नया मोड़ दिया था.

कहा जाता है कि मियांदाद के लिए हर तरफ़ रन था. मियांदाद को क्रिकेट के तेज़ दिमाग़ खिलाड़ियों में रखा जाता है. मैदान में और मैदान के बाहर भी मियांदाद काफ़ी विवाद में रहे हैं--बात चाहे ऑस्ट्रेलिया के लिली से हो या भारत के विकेट कीपर किरण मोरे की नक़ल हो. 1992 के विश्व कप में पाकिस्तान की ख़िताबी जीत में मियांदाद की बड़ी भूमिका रही थी उन्होंने उसमें छह अर्ध-शतक लगए थे. मियांदाद के नाम सबसे ज़्यादा लगातार अर्धशतक लगाने का रिकार्ड अभी तक बरक़रार है.

इमरान ख़ान

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किसी को इस बात में शायद ही कोई शक हो कि इमरान ख़ान पाकिस्तान के सबसे करिश्माई क्रिकेटर और करोड़ों लोगों के दिलों की धड़कन रहे हैं. 1952 में लाहौर में पैदा हुए इमरान ने पाकिस्तान को सबसे सफल कप्तानी दी और 1992 के विश्व कप में जीत दिलाई.

इमरान ख़ान अपनी तेज़ गेंदबाज़ी के लिए तो जाने ही जाते हैं साथ में वह एक अच्छे बल्लेबाज़ भी रहे हैं. 1980-82 के दौरान वह अपनी गेंदबाज़ी के शिखर पर थे लेकिन घुटने की चोटके बाद वह बहुत दिनों तक सिर्फ़ एक बल्लेबाज़ की हैसियत से पाकिस्तान टीम में शामिल रहे.

1983 के विश्व कप में वह शामिल तो थे लेकिन गेंदबाज़ी नहीं की. इमरान अपने ज़माने के चार मशहूर ऑल राउंडर में शामिल रहे अन्य तीन में भारत के कपिल देव, इंग्लैंड के इयन बॉथम और न्यूज़ीलैंड के रिचर्ड हैडली थे.

जहां इयन बॉथम की धार वक़्त के साथ कम होती गई वहीं इमरान की बढ़ती गई. इमरान ने अपने आख़री 10 साल के क्रिकेट करियर में बल्लेबाज़ी में 50 से ज़्यादा की औसत से रन बनाए जबकि गेंदबाज़ी में उनका 19 का औसत रहा जो किसी भी गेंदबाज़ के लिए ख़्वाब से कम नहीं है.

इमरान का ग्लैमर किसी फ़िल्मी हस्ती से कम नहीं रहा और पश्चिमी दुनिया में उनके जितने प्रशंसक हुए किसी और के नहीं हुए. विश्व कप में इमरान ने एक शतक और चार अर्ध शतक लगाए हैं. क्रिकेट की दुनिया को अलविदा कहने के बाद इमरान राजनीति में आ गए हैं लेकिन अभी तक कोई बड़ी सफलता उनके हाथ नहीं लगी है.

विवियन रिचर्ड्स

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विवियन रिचर्ड्स क्रिकेट इतिहास के अबतक के सबसे धुरंधर बल्लेबाज़ माने जाते हैं. रिचर्ड्स एक ऐसे बल्लेबाज़ रहे हैं, जिनसे सारे गेंदबाज़ पनाह मांगते थे. अपनी शक्तिशाली और तेज़ प्रहार के लिए रिचर्ड्स प्रसिद्ध रहे. विश्व कप में उन्होंने एक पारी में सर्वाधिक 181 रन बनाया था.

विश्व कप के 23 मैचों में रिचर्ड्स ने 63.31 की औसत से 1013 रन बनाए. ये औसत 20 से ज़्यादा मैच खेलने वाले खिलाड़ियों में सबसे ज़्यादा है. रिचर्ड्स ने विश्व कप में तीन शतक और पांच अर्ध शतक लगाए. रिचर्ड्स के नाम एक ज़माने तक वनडे में सबसे ज़्यादा शतक का रिकॉर्ड रहा था.

वे वेस्ट इंडीज़ के एकमात्र कप्तान हैं जिनेक नेतृत्व में वेस्ट इंडीज़ कोई भी सिरीज़ नहीं हारा है. आज के क्रिकेट प्रेमी को याद रहना चाहिए कि जिस प्रकार 30 के दशक में सर डॉन ब्रेडमैन क्रिकेट पर राज कर रहे थे उसी तरह 70 के दशक में रिचर्ड्स का राज था. रिचर्ड्स अपने ज़माने के ज़बरदस्त क्षेत्ररक्षक माने जाते रहे और वे फ़िरकी गेंदबाज़ी भी करते थे.

रिचर्ड्स ने इंग्लैंड के ख़िलाफ़ ख़ास तौर से अच्छा प्रदर्शन किया है और वनडे में उनका सर्वाधिक स्कोर 189 काफ़ी दिनों तक रिकॉर्ड रहा. जब तक कि पाकिस्तान के सईद अनवर ने उसे न तोड़ दिया और अब ये रिकॉर्ड सचिन तेंदुलकर के नाम है. अगर रिकॉर्ड को देखें तो रिचर्ड्स कोई ख़ास नहीं दिखते लेकिन क्रिकेट मैदान पर उनसे ज़्यादा ख़तरनाक कोई दूसरा क्रिकेटर उनके ज़माने में नहीं था.

मैदान में रिचर्ड्स शेर की तरह सुस्त चाल से चलते लेकिन फ़्रंट फ़ुट पर उनका जवाब नहीं था. रिचर्ड्स और नीना गुप्ता का रोमांस भी काफ़ी चर्चित रहा. पहले विश्व कप में बल्ले से तो रिचर्ड्स कोई कमाल नहीं दिखा सके लेकिन फ़ाइनल में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के तीन खिलाड़ियों को रन आउट कर ख़िताबी जीत दिलाई. रिचर्ड्स बिना हेलमेट के खेलते थे.

ब्रायन लारा

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जिस तरह 70 के दशक में विव रिचर्ड्स वेस्टइंडीज़ की जान रहे उसी तरह 90 के दशक में और फिर उसके बाद ब्रायन लारा की बल्लेबाज़ी का जादू सर चढ़ कर बोलता रहा.

हालांकि तेंदुलकर ने लारा को हर क्षेत्र में पीछे छोड़ दिया लेकिन बाएं हाथ के इस बल्लेबाज़ के खेल की ख़ूबसूरती और लंबी पारी खेलने का धर्य किसी और में नहीं. टेस्ट क्रिकेट में 400 का जादुई आंकड़ा छूने वाले वे एकमात्र खिलाड़ी हैं.

इसके अलावा ब्रायन लारा ने 375 रन की पारी भी खेली थी. 2005 में जब लारा ने एलन बोर्डर का रिकॉर्ड तोड़ा तो वे टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी बन गए. लारा को कई बार कप्तानी सौंपी गई और कई बार उन्हें हटाया गया. लारा लय के खिलाड़ी थे.

रन बनाने पर आते तो कोई उन्हें रोक नहीं पाता था. ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के ख़िलाफ़ कई श्रृंखला में वह रंग में दिखे. श्रीलंका के ख़िलाफ़ तो एक सिरीज़ में लारा ने अकेल लगभग आधा रन बनाया. विश्व कप में लारा ने दो शतक और सात अर्धशतक लगाए हैं.

उन्होंने 34 मैच में 1200 से ज़्यादा रन बनाए. 2007 के विश्व कप में लारा के लिए मौक़ा था कि वह वेस्ट इंडीज़ को जीत दिलाकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदाई लेते लेकिन ऐसा न हो सका क्योंकि आम तौर पर इस तरह के महान खिलाड़ी की क़िस्मत में ऐसी विदाई नहीं होती.

सबसे ज़्यादा चौका लगाने का रिकॉर्ड भी ब्रायन लारा के नाम है.

ग्लेन मैकग्रॉ

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तेज़ गेंदबाज़ी में ग्लेन मैकग्रॉ क्रिकेट इतिहास के सफलतम गेंदबाज़ हैं. जब 2005 में हुए सुपर कप में उन्होंने वेस्ट इंडीज़ के कर्टनी वॉल्श के 519 विकेट का रिकार्ड तोड़ा तो वह तेज़ गेंदबाज़ों में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले बन गए.

मैकग्रॉ विश्व कप में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ हैं. उन्होंने 39 मैचों में कुल 71 विकेट लिए हैं और 2003 के विश्व कप में नामीबिया के ख़िलाफ़ उन्होंने 15 रन देकर सात विकेट लेकर इतिहास रचा जो विश्व कप में अब तक का बेहतरीन प्रदर्शन है.

मैकग्रॉ अपनी पतली काठी और लंबाई में वेस्ट इंडीज़ के एंब्रोज़ से मिलते हैं. सही लाइन और लेंथ के साथ तेज़ गति से उठती हुई गेंद उनकी विशेषता थी.

टेस्ट में पाकिस्तान के विरुद्ध उन्होंने 24 रन देकर आठ विकेट लिए जो किसी भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी की ओर से दूसरा बेहतरीन प्रदर्शन है. टेस्ट में अगर उनका औसत 21 का है तो वनडे में 22 का.

उन्होंने वनडे में जितने रन बनाए हैं उसका तीन गुना विकेट लिया है. ऑस्ट्रेलिया की ओर से 100 अधिक टेस्ट खेलने वाले वो पहले तेज़ गेंदबाज़ हैं.

मैकग्रॉ की क्षमता पर ऐड़ी की चोट के बाद सवाल उठने लगे थे लेकिन उन्होंने सबको ग़लत साबित किया और अपने आख़िरी विश्व कप में सर्वाधिक 26 विकेट लेकर नया इतिहास रचा और साथ ही वसीम अकरम के 55 विकेट के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया.

मैकग्रॉ ने इंग्लैंड के माइक आथर्टन और वेस्ट इंडीज़ के ब्रायन लारा को काफ़ी परेशान किया.

स्टीव वॉ

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स्टीव वॉ एक ऐसे क्रिकेट खिलाड़ी हैं जो वक़्त के साथ निखरे और उन्हें ऑस्ट्रेलियाई आत्मा का प्रतीक माना जाता है. स्टीव वॉ मध्यक्रम के बल्लेबाज़ रहे और मध्यम गति के तेज़ गेंदबाज़. स्टीव ने ऐतिहासिक पलों में ऑस्ट्रेलिया का नेतृत्व किया.

एक ज़माना ऐसा भी आया जब उनकी जगह टीम में उनके जुड़वां भाई मार्क वॉ को शामिल किया गया. स्टीव वॉ ने फिर टीम में अपनी वापसी की और टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलिया की लगातार 16 जीत में से 15 में ऑस्ट्रेलिया का नेतृत्व किया.

इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया को 1999 में दूसरी बार विश्व कप जिताया और ऑस्ट्रेलिया की ओर से सबसे ज़्यादा 398 रन बनाए. स्टीव वॉ ने टेस्ट में 10 हज़ार से ज़्यादा रन बनाए और 32 शतक लगाए. उन्हें ऑस्ट्रेलिया का संकट मोचक खिलाड़ी के तौर पर जाना जाता है.

स्टीव ने एक मुकम्मल क्रिकेटर की परिभाषा तय की उन्होंने अगर रिचर्ड्स को बाउंसर फेंके तो संयम के साथ ख़राब गेंद का इंतज़ार करके उसे कड़ी सज़ा दी.

स्टीव एलन बोर्डर की टीम का भी हिस्सा थे जिसने पहली बार 1987 में ऑस्ट्रेलिया को विश्व कप जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. 36 वर्ष की आयु में 2001 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के बेहतरीन खिलाड़ी के तौर पर एलन बोर्डर मेडल पुरस्कार दिया गया.

वनडे में स्टीव 2002 में दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ अपना आख़िरी मैच खेले तो टेस्ट में अपनी अंतिम पारी में उन्होंने भारत के विरुद्ध 80 रन बनाए. स्टीव जितने सफल क्रिकेट खिलाड़ी रहे उससे ज़्यादा वे सफल कप्तान रहे.

शेन वॉर्न

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जब दाएं हाथ के बल्लेबाज़ के पीछ वाइड होती हुई गेंद जिसे बल्लेबाज़ जान-बूझ कर छोड़ दे वह अचानक स्टंप बिखेर जाए तो समझें कि गेंदबाज़ कोई और नहीं शेन वार्न हैं. शेन वार्न ने लेग स्पिन को संदूक़ से निकाल कर एक बार फिर फ़ैशन में ला दिया.

वे दुनिया में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले खिलाड़ियों में मुथैया मुरलीधरन के बाद दूसरे नंबर पर हैं. उन्होंने स्टीव वॉ के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलिया की लगातार 16 टेस्ट में जीत में अहम भूमिका निभाई.

वॉर्न ने दो विश्व कप 1999 और 2003 में ऑस्ट्रेलिया की ख़िताबी जीत में अहम भूमिका निभाई है. 1999 के विश्व कप में वार्न ने 20 विकेट लिए थे जबकि उन्होंने 145 टेस्ट मैचों में कुल 708 विकेट लिए. वनडे में उन्होंने 194 मैचों में 293 विकेट 25 की औसत से लिए.

वॉर्न ने बल्ले से भी आस्ट्रेलिया को कई जीत दिलाई है और हार से भी बचाने में अपनी भूमिका निभाई है. उन्होंने कुल 12 अर्धशतक लगाए हैं.

शेन वॉर्न और श्रीलंका के स्पिनर मुरलीधरन के साथ विकेट लेने की उनकी प्रतिस्पर्धा भी काफ़ी रोचक रही है क्योंकि कभी शेन विकेट लेने में आगे तो कभी मुरलीधरन आगे हो जाते थे लेकिन आख़िर में बाज़ी मुरली के हाथ रही. गेंदबाज़ी के जादूगर शेन वॉर्न मैदान में जितने तूफ़ान उठाते थे उतने ही विवाद मैदान से बाहर उनके नाम रहे हैं. सुर्ख़ियों में रहने की उनकी सलाहियत अदभुत है.

वॉर्न ने पहले आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स जैसी कमज़ोर मानी जा रही टीम को ख़िताबी जीत दिलाई.

मुथैया मुरलीधरन

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मुथैया मुरलीधरन विश्व के शायद ऐसे खिलाड़ी हैं जिनकी प्रतिभा का जितना लोहा माना गया है उतना ही उनकी प्रतिभा को नकारा भी गया है. उन्होंने टेस्ट और वनडे दोनों प्रकार के क्रिकेट में सबसे ज़्यादा विकेट लिए हैं.

टेस्ट में अगर वह अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी शेन वर्न से लगभग 100 विकेट आगे हैं तो वनडे में वसीम अकरम का 502 विकेट का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है. मुरलीधरन 1992 में श्रीलंका टीम में आए और तबसे ही वे अपनी गेंदबाज़ी के ऐक्शन को लेकर विवाद में हैं.

उन्होंने घरेलू विकेट पर विकेट तो लिए ही, वे दूसरे मैदानों पर भी श्रीलंका के सबसे प्रभावी गेंदबाज़ रहे हैं. उन्हें गेंदबाज़ी का जादूगर कहा जाता है. मुरलीधरन ने श्रीलंका की टेस्ट और वनडे जीतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उन्होंने 67 बार टेस्ट पारी में पांच से ज़्यादा विकेट लिए हैं.

वह श्रीलंकाई क्रिकेट के ज़बरदस्त क्षणों में टीम का हिस्सा रहे हैं. इंग्लैंड के विरुद्ध 1998 में ओवल के मैदान पर उन्होंने 16 विकेट लेकर अकेले ही श्रीलंका के लिए मैच जीता. मुरलीधरन जहां विकेट लेने में सबसे आगे हैं वहीं रन देने में बहुत ही किफ़ायती साबित हुए हैं.

मुरली आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स की ख़िताबी जीत का भी हिस्सा रहे हैं इसके अलावा चेन्नई सुपर किंग्स की दक्षिण अफ़्रीका में बेहतर प्रदर्शन में भी उनका बड़ा योगदान रहा है. मुथैया मुरलीधरन 2011 में अपना पाँचवाँ विश्व कप खेल रहे हैं. और इस बार भी उन पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी.

अर्जुन रणतुंगा

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अर्जुन रणतुंगा 18 वर्ष की उम्र में श्रीलंका के पहले टेस्ट मैच का हिस्सा रहे और श्रीलंका की ओर से पहला अर्धशतक लगाया. उन्होंने श्रीलंका जैसी नई टीम को दुनिया की बेहतरीन टीमों की मौजूदगी में 1996 में विश्व कप जिताया.

रणतुंगा ने लगभग 20 वर्ष तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में श्रीलंका की ओर से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. छोटे-मोटे रणतुंगा देखने में क्रिकेटर नहीं लगते लेकिन उनके पास क्रिकेट के सारे स्ट्रोक्स मौजूद थे.

विकेट के बीच में तेज़ सिंगल के बजाए वह गेंद को गैप में डालकर आसानी से रन हासिल किया करते थे ख़ास तौर से वह ऑफ़ साइड में खेलते थे. 1999 के विश्व कप में श्रीलंका के ख़राब प्रदर्शन के कारण उन्हें श्रीलंका टीम की कप्तानी से हाथ धोना पड़ा और एक साल बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया.

लेकिन श्रीलंका क्रिकेट में उनका बहुमूल्य योगदान रहा है. वह 2008 में श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष बना दिए गए लेकिन उन्हें बाद में कई कड़े फ़ैसले लेने के कारण उस पद से हटा दिया गया. रणतुंगा का क्रिकेट रिकॉर्ड बहुत ज़्यादा प्रभावशाली नहीं है और वह एक औसत खिला़ड़ी दिखते हैं लेकिन श्रीलंकाई क्रिकेट को ऊंचाई पर पहुंचाने में उनका योगदान बड़े-बड़े रिकॉर्ड रखने वालों से बेहतर है.

रणतुंगा ने अरविंद डी सिल्वा के साथ मिलकर कई यादगार जीत हासिल की है और कई निश्चित हार को जीत में परिवर्तित किया.

वसीम अकरम

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वसीम अकरम को क्रिकेट इतिहास के सबसे बेहतर बाएं हाथ के गेंदबाज़ के तौर पर जाना जाता है. जब अकरम अपने बेहतरीन फ़ॉर्म में हों तो वे ख़्वाब में खेली गई क्रिकेट खेलते हैं. गेंद पर जो कंट्रोल अकरम को रहा है वह शायद किसी और गेंदबाज़ का हिस्सा नहीं रहा है.

कहा जाता है कि गेंद उनके इशारों पर रहती है और वह छह गेंद को छह अंदाज़ में फेंकने में महारत रखते हैं. कभी-कभी तो वह एक ही गेंद को एक ही बार में दोनों ओर मोड़ देते थे.

अकरम ने अपने क्रिकेट करियर में अपनी बल्लेबाज़ी की भी झलक दिखाई है लेकिन उस क्षेत्र में उनका प्रदर्शन उनकी क्षमता से कम रहा है. सिवाए ज़िम्बॉबवे के विरुद्ध 257 की यादगार पारी के, जिसमें रिकॉर्ड छक्का लगाया गया था.

अकरम इमरान ख़ान के उत्तराधिकारी के तौर पर उभरे थे लेकिन पाकिस्तानी क्रिकेट में आई मैच फ़िक्सिंग की बला ने अकरम के खेल को काफ़ी नुक़सान पहुंचाया. अकरम ने पाकिस्तान की 1992 विश्व कप जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वनडे क्रिकेट के वे सफलतम गेंदबाज़ रहे.

उन्होंने 2003 के विश्व कप में अपना 500वां विकेट लिया. लेकिन पाकिस्तान के अत्यंत ख़राब प्रदर्शन के कारण टीम से निकाले गए आठ खिलाड़ियों में वे भी एक थे.

दाएं हाथ के वक़ार यूनिस के साथ बाएं हाथ के अकरम की जोड़ी दुनिया की अभी तक की सफलतम जोड़ी है क्योंकि कहा जाता है कि तेज़ गेंदबाज़ जोड़ी में शिकार करते हैं.

क्लाइव लॉयड

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भले ही आज के हिसाब से क्लाइव लॉयड की बल्लेबाज़ी बेमानी हो गई हो लेकिन क्लाइव क्रिकेट इतिहास के वो क्रिकेटर हैं जिनके नेतृत्व में वेस्ट इंडीज़ ने शुरुआती दोनों विश्व कपों में ख़िताबी जीत हासिल की.

क्लाइव लॉयड ने अपने क्रिकेट जीवन में एकमात्र वनडे शतक लगाया है और वह भी उन्होंने पहले विश्व कप के फ़ाइनल मैच में. साढ़े छह फ़ुट के लंबे-चौड़े लॉयड चश्मा लगाते थे क्योंकि 12 साल की उम्र में एक बच्चे से झगड़े के कारण उनकी आंख ख़राब हो गई थी.

वे आक्रामक खिलाड़ी थे और कप्तान बनने के बाद उनके खेल में ज़्यादा निखार आया. कप्तान के तौर पर अपने पहले ही मैच में भारत के विरुद्ध उन्होंने 163 रनों की पारी खेली और पांचवें और अंतिम टेस्ट में 242 नाबाद रन की पारी खेल कर मैच और सिरीज़ पर क़ब्ज़ा किया.

1975-76 में लिली और थॉमसन की जोड़ी ने वेस्ट इंडीज़ को सिरीज़ में 5-1 की करारी हार दी थी उसके बाद लॉयड के पास तेज़ गेंदबाज़ों की पूरी पलटन तैयार थी जिसमें रॉबर्ट्स, गार्नर, होल्डिंग, मार्शल और क्रॉफ़्ट जैसे तूफ़ानी गेंदबाज़ थे तो बल्लेबाज़ी में हेंस, ग्रीनिज और रिचर्ड्स जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे.

उन्होंने दूसरे विश्व कप में भी ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 73 रनों की नाबाद पारी खेली. 1983 में लॉयड के तीसरी बार ख़िताब जीतने के ख़्वाब को भारत ने तोड़ दिया.

लेकिन उसके फ़ौरन बाद ही बदले की भावना से भरी वेस्ट इंडीज़ की टीम ने लॉयड के नेतृत्व में ही भारत को पांचों वनडे में करारी हार दी टेस्ट सिरीज़ तो पहले ही जीत चुकी थी. लॉयड को क्रिकेट इतिहास के सफ़लतम कप्तानों में गिना जाता है.

एलन बॉर्डर

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एलन बॉर्डर को विश्व के सबसे जुझारू खिलाड़ियों में गिना जाता है. वे आसानी से कभी अपना विकेट नहीं देने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं. बोर्डर के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलिया ने पहली बार 1987 में विश्व कप जीता था.

जिस वक़्त उन्होंने क्रिकेट मैदान को अलविदा कहा उस वक़्त उनके पास सबसे ज़्यादा टेस्ट खेलने का, लगातार सबसे ज़्यादा टेस्ट खेलने का, सबसे ज़्यादा टेस्ट में कप्तानी और सबसे ज़्यादा कैच का रिकॉर्ड था.

एक बार अपने अंदाज़ से गेंदबाज़ी करते हुए बोर्डर ने 96 रन देकर 11 विकेट लिए थे. उन्हें उस वक़्त ऑस्ट्रेलिया की कप्तानी सौंपी गई जब ह्यूज़ को रोते हुए कप्तानी छोड़नी पड़ी थी.

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट में उनके योगदान को सराहते हुए हर वर्ष ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी को एलन बॉर्डर मेडल से सम्मानित किया जाता है. मैदान में कभी अपनी दाढ़ी को खुजाते हुए हमेशा कुछ नया सोचते हुए बॉर्डर ने 165 टेस्ट में 11 हज़ार से ज़्याद रन बनाए, जिसमें 27 शतक और 63 अर्ध शतक शामिल थे.

वनडे में उनका औसत ज़्यादा अच्छा तो नहीं लेकिन उन्होंने तीन शतक और 39 अर्ध शतक लगाए हैं. 1987 के विश्व कप में स्टीव वॉ और डेविड बून के साथ मैकडरमॉट का बड़ा योगदान था. बॉर्डर ने 1979 से लेकर 1992 तक विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया का प्रतिनिधित्व किया है. बॉर्डर ने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट पाताल से निकाल कर चरम पर पहुंचने के रास्ते पर डाल दिया.

एडम गिलक्रिस्ट

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ऑस्ट्रेलिया के विकेटकीपर एडम गिलक्रिस्ट हालांकि ऑस्ट्रेलिया के अब तक के सफलतम विकेटकीपर हैं लेकिन उनकी आक्रामक बल्लेबाज़ी का दुनिया ने ज़्यादा लोहा माना है. गिलक्रिस्ट का क्रिकेट फ़ंडा सिर्फ़ इतना था कि गेंद को मारना है चाहे शॉट जैसा भी हो.

गिली ने इयन हिली के बाद ऑस्ट्रेलिया की विकेट कीपिंग की ज़िम्मेदारी संभाली लेकिन उन्हें उनके रोचक और आक्रामक खेल के लिए ज़्यादा सराहा गया. ऑस्ट्रेलिया की ओर से खेली गई यादगार पारियों में से तीन बेहतरीन पारियां गिलक्रिस्ट की है.

एक जब उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एक हारे हुए मैच में 149 रन बनाकर जीत दिलाई थी. दूसरी जोहानेसबर्ग में दक्षिण अफ़्रीका के विरुद्ध 204 रनों की संकट मोचक पारी और तीसरी ऐशेज़ का तेज़ शतक जो उन्होंने 57 गेंदों पर लगाया था.

वे विव रिचर्ड्स के विश्व रिकॉर्ड तोड़ने से सिर्फ़ एक गेंद से चूक गए थे. वनडे में उन्होंने 172 रनों की पारी भी खेली है. टेस्ट में 17 तो वनडे में 16 शतक लगाए हैं. गिलक्रिस्ट के पास वनडे में सबसे ज़्यादा शिकार का रिकॉर्ड है तो टेस्ट में वह दूसरे नंबर पर हैं.

लेकिन उनका औसत किसी भी बड़े विकेटकीपर से ज़्यादा है. वनडे में अगर शाहिद अफ़रीदी के नाम सबसे ज़्यादा छक्का लगाने का रिकॉर्ड है तो टेस्ट मैचों में गिलक्रिस्ट एकमात्र खिलाड़ी हैं जिन्होंने 100 छक्का लगाया है.

गिलक्रिस्ट ऑस्ट्रेलिया की उस टीम के सदस्य रहे हैं जिसने लगातार दो बार विश्व कप में जीत हासिल की.

ग्राहम गूच

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ग्राहम गूच इंग्लैंड के ऐसे खिलाड़ी हैं जिनके रिवर्स स्वीप से इंग्लैंड शायद पहली बार विश्व कप जीतने से चूक गया हालांकि 1987 के उस विश्व कप में ग्राहम गूच ने सबसे ज़्यादा 471 रन बनाए थे.

आठ मैच में उन्होंने एक शतक और तीन अर्धशतक लगाए थे और इंग्लैंड को विश्व कप के फ़ाइनल में पहुंचाने बड़ी भूमिका निभाई थी. पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप में हुए विश्व कप में गूच ने भारत के ख़िलाफ़ 115 रन की पारी खेली और नई रणनीति का परिचय दिया था.

एक मैच में सबसे ज़्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है. गूच ने भारत के ख़िलाफ़ 333 रन की यादगार पारी खेली फिर उसी मैच की दूसरी पारी में एक और शतक जड़ कर ये रिकॉर्ड स्थापित किया था.

फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट और वनडे दोनों को मिलाकर देखा जाए तो गूच ने सबसे ज़्यादा रन बनाए हैं. गूच बड़े विवादों में रहे हैं. 1980 के दशक में बड़े विवादों में रहे जब उन्होंने रंगभेद के बावजूद दक्षिण अफ़्रीका का दौरा किया और उन पर तीन साल का प्रतिबंध लगा दिया गया.

लेकिन जब उन पर पाबंदी नहीं थी तो भी वह या तो दौरा करने के लिए तैयार नहीं रहते या फिर बीच दौरे से घर वापसी की धमकी देते. गूच के टेस्ट में 20 शतक हैं तो वनडे में आठ शतक. गूच ने गेंदबाज़ी भी की है और एक टेस्ट में 69 रन देकर उन्होंने पांच विकेट भी लिए हैं.

गूच जैसे-जैसे अनुभवी होते गए उनकी बल्लेबाज़ी निखरती गई. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी वे सुर्ख़ियों में बने रहे. कारण कुछ अच्छे नहीं थे.

सनथ जयसू्र्या

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सनथ जयसूर्या ने वनडे क्रिकेट में सलामी बल्लेबाज़ी की परिभाषा ही बदल डाली. हालांकि ये काम न्यूज़ीलैंड के सलामी बल्लेबाज़ मार्क ग्रेटबैच ने 1992 के विश्व कप में शुरू कर दिया था.

लेकिन इसका सफलतम प्रयोग श्रीलंका के सलामी बल्लेबाज़ जयसूर्या ने किया जब वह शुरुआती सतर्कता के बल्लेबाज़ी के पुराने नियम को ताक़ पर रखकर गेंद को सीमा पार पहुंचाने का काम कर रहे थे.

हालांकि जयसूर्या को टीम में एक गेंदबाज़ के रूप में शामिल किया गया था जिसके बारे में कहा जाता था कि वे थोड़ी बहुत बल्लेबाज़ी भी कर लेते हैं लेकिन आज जयसू्र्या नाम है ताबड़-तोड़ बल्लेबाज़ी का. यही कारण है वह टेस्ट के मुक़ाबले वनडे में ज़्यादा सफल रहे.

टेस्ट में अगर उनके 14 शतक हैं तो वनडे में 28. जयसूर्या के नाम कई यादगार पारियां हैं. सबसे तेज़ अर्धशतक का रिकॉर्ड अभी तक जयसूर्या के नाम है जब उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सिर्फ़ 17 गेंदों पर 50 रन बनाए थे.

उनके पास सबसे तेज़ शतक का भी रिकॉर्ड था लेकिन बाद में पाकिस्तान के एक और विस्फोटक बल्लेबाज़ शाहिद अफ़रीदी ने उसे तोड़ दिया. छक्का मारने के मामले में अफ़रीदी और जयसूर्या में एक क़िस्म की प्रतिस्पर्धा रही है.

अफ़रीदी ने अगर 280 छक्के लगाए हैं तो जयसूर्या ने भी 270 छक्के लगाए हैं. जयसूर्या अगर गेंदबाज़ी के लिए टीम में आए थे तो उन्होंने इस मैदान में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 420 विकेट लिए हैं जो अपने आप में बड़ी बात है.

उन्होंने 2008 में एशिया कप जिताने में बड़ी भूमिका निभाई. 41 साल की उम्र में भी उनमें रन बनाने की भूख बची हुई है और वह आईपीएल खेलते रहे हैं.

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