क्या ये विश्व कप क्रिकेट का अंत है?

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Image caption ट्वेंटी-20 की रंगीनियों के सामने एक दिवसीय मैच फीके नज़र आ रहे हैं.

क्या विश्व कप क्रिकेट अपने अंत की कगार पर है? वरिष्ठ खेल पत्रकार सुरेश मेनन इसकी संभावनाओं पर ग़ौर कर रहे हैं.

ये लगभग तय है कि ये 2011 का विश्व कप कई नामीगिरामी खिलाड़ियों--सचिन (शायद), मुरलीधरण, कैलिस, चंदरपॉल—के लिए आख़िरी होगा.

इसमें कोई नई बात नहीं है, खिलाड़ी आते जाते रहते हैं, विश्व कप चलता रहता है.

लेकिन अब शायद ऐसा न हो.

टेस्ट क्रिकेट के अवैध संतान की तरह उभरकर एक-दिवसीय मैच का प्रारूप चार दशकों तक राज करने के बाद अब अपनी एक्सपायरी डेट की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है.

उसकी जगह लेने को तैयार है बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ रहा ट्वेंटी-20.

अनूठा खेल

क्रिकेट दूसरे खेलों के मुक़ाबले अनूठा है क्योंकि इसमें न जाने कितनी संभावनाओं का समावेश है.

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Image caption 1983 के विश्व कप में भारत की जीत ने एक-दिवसीय मैचों को नई बुलंदियों तक पहुंचाया.

टेस्ट क्रिकेट, एक-दिवसीय क्रिकेट और ट्वेंटी-20—तीन अलग-अलग प्रारूप एक जैसे साजोसामान का इस्तेमाल करते हैं, एक जैसे नियमों से खेले जाते हैं, खिलाड़ी भी तीनों के एक से ही हैं.

लेकिन देखा जाए तो तीनों की ही एक अलग लय है, एक अलग सोच है और एक अलग एहसास है.

न सिर्फ़ खिलाड़ी बल्कि समर्थक भी इन अलग अलग प्रारूपों के विशेषज्ञ हैं.

जो ट्वेंटी-20 में रूचि रखते हैं वो ज़रूरी नहीं है कि टेस्ट क्रिकेट पर नज़र रखें.

यूसुफ़ पठान के चाहनेवाले टेस्ट क्रिकेट नहीं देखते और राहुल द्रविड़ के समर्थक ट्वेंटी-20 पर ध्यान नहीं देते.

तो पांच दिनों तक चलने वाले टेस्ट क्रिकेट और साढ़े तीन घंटे की ट्वेंटी-20 के बीच की लकीर तो साफ़ हो चुकी है.

भविष्य

इसमें 50-ओवरों का क्रिकेट कहां फ़िट होता है?

विश्व कप क्रिकेट 35 साल पुराना हो चुका है और अब ज़िंदगी बदल देने वाले अनुभव की कगार पर है.

कुल 43 दिन चलने वाला ये टूर्नामेंट विलुप्त होते-होते पुनर्जीवित हो जाएगा या फिर ये फिर ये उसके आख़िरी लम्हे होंगे.

एक दिवसीय मैचों ने एक नई सदी की नींव रखने में बड़ी भूमिका निभाई है लेकिन अब इसमें कल्पनाशीलता की कमी साफ़ नज़र आ रही है और यदि क्रिकेट के नज़रिए से देखें तो ये न तो इस ओर है न उस ओर.

अब मानो तय लगता है कि 50 ओवरों के पहले 15 ओवर और आख़िरी 10 ओवरों में आतिशबाज़ी होगी, बीच के ओवर कुछ खामोश और गतिहीन से होंगे.

Image caption ट्वेंटी-20 में जीत की खुशी मनाती दक्षिण अफ़्रीका की टीम

हाल के दिनों में ये एक ऐसा खेल बन चुका है जिसके सभी उतार-चढ़ाव अब मानो तय से नज़र आते हैं.

वैसे 2015 के विश्व कप मेज़बान का एलान हो चुका है (ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड) और 2019 की मेज़बानी भी इंग्लैंड को दी जा चुकी है.

लेकिन सवाल ये उठ रहा है कि क्या तब तक ये प्रारूप ज़िंदा रह पाएगा?

उम्मीद भारत से

संभव है कि यदि 1983 में भारत ने विश्व कप नहीं जीता होता तो शायद ये प्रारूप कब का दफ़न हो चुका होता.

यदि समर्थकों की एक अनगिनत फ़ौज, उभरता मध्यम वर्ग और इस खेल की पैसा बटोरने की ताकत जो भारत में पिछले दो दशकों में दिखी वो नहीं होती तो शायद ये प्रारूप संघर्ष कर रहा होता.

और अभी भी यही उम्मीद है कि भारत इस प्रारूप में जान फूंक दे.

यदि भारत विश्व कप जीतता है तो निसंदेह एक दिवसीय मैचों और विश्व कप की उम्र लंबी हो जाएगी.

जिस तरह से 2007 में ट्वेंटी-20 विश्व कप जीतकर भारत ने विश्व क्रिकेट को बदल कर रख दिया उसी तरह की संभावनाएं जुड़ी हैं विश्व कप की जीत से भी.

जिस तरह से 1983 की जीत के बाद कार्पोरेट जगत और समर्थकों ने इस खेल को गले लगा लिया अगर वो नहीं हुआ तो फिर ये प्रारूप संकट में है.

विश्व कप के फ़ाइनल के छह दिनों बाद ही भारतीय आईपीएल शुरू हो रहा है.

ये या तो काफ़ी प्रतीकात्मक होगा यानि पुराना नए को जगह देता दिखाई देगा या फिर ये पुराने के जुझारूपन की परीक्षा होगी?

अब सवाल ये नहीं रह गया है कि विश्व कप कौन जीतेगा, अब सवाल ये है कि क्या विश्व कप विजेता बनेगा?

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