चावला की चाल चलते कप्तान धोनी

  • 12 मार्च 2011
पीयूष चावला और महेंद्र सिंह धोनी इमेज कॉपीरइट BBC World Service

क्या महेंद्र सिंह धोनी ऐसे हठी अहंवादी हैं जो कि ऐसी स्थिति में भी टस से मस होने को तैयार नहीं जबकि लग रहा हो कि भारत का विश्व विजेता बनने का अभियान पटरी से उतर रहा है?

पीयूष चावला को अंतिम 11 खिलाड़ियों में लगातार रखने और कप्तान के बार-बार उनके बचाव करने को लेकर मीडिया में जो खिंचाई हो रही है अगर उसके आधार पर इस सवाल का जवाब पूछा जाए तो अधितर लोग बोलेंगे – हाँ वो हैं.

मगर ये फ़ैसला करना ख़तरे से भरा होगा, अगर आप धोनी के पिछले रिकॉर्ड देखें, जहाँ उन्होंने तमाम विरोध के बावजूद वही किया जो उन्हें सही लगा और अक्सर ऐसे मामलों में, वे सही साबित हुए.

ऐसे मौक़े आए हैं जब फ़ील्डरों को तैनात करने और गेंदबाज़ों के परिवर्तन को लेकर उनके फ़ैसले समझ से बाहर रहे.

अगर लीक से हटकर उठाए गए तरीक़े नहीं चले तो उनको बेतुके फ़ैसले कहा जाता है और अगर वो चल पड़ा तो उन्हीं तरीक़ों को एक जीनियस का कमाल करार देकर कसीदे पढ़े जाने लगते हैं.

ये ऐसा ही है जैसे कि सहवाग जब एक गुडलेंथ बॉल पर छक्का जड़ें तो उनको एक वरदान में मिला बल्लेबाज़ घोषित कर दिया जाता है लेकिन वही एक बिल्कुल वैसी ही गेंद पर दोबारा वैसा शॉट लगाते समय वो आउट हो जाएँ तो उनपर एक अपरिपक्व खिलाड़ी का ठप्पा लगा दिया जाता है.

वह रेखा जो कि एक प्रोत्साहन देनेवाले फ़ैसले को एक बिना समझे हुए फ़ैसले से बाँटती है, वो बड़ी महीन होती है, ख़ासकर तब जबकि मात्र एक फ़ैसले से सारी टीम का भाग्य तय होने वाली स्थिति हो.

अच्छे कप्तान

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Image caption धोनी की रणनीति चावला को एक मैच जिताउ गेंदबाज़ बनाना रही है

धोनी एक प्रशंसनीय कप्तान हैं जिनकी टीम के युवा और वरिष्ठ सभी खिलाड़ी, प्रशंसा करते नहीं थकते.

एक ऐसी टीम में जिसके एक सिरे पर दिमाग़ को घुमा देनेवाली क़ाबिलियत और अनुभव वाला एक तेंदुलकर हो और दूसरे पर चावला जैसा खेल सीखता खिलाड़ी, एक सम्मिलित और मज़बूत टीम को खड़ा रखना एक चुनौती है जिसपर धोनी अभी तक बखूबी खरे रहे हैं.

इस टीम में नए-नवेले और मँझे हुए खिलाड़ी ख़ूबसूरती से एकाकार हुए हैं और उससे एक ऐसी टीम निकली है जिसपर भारत के विश्वकप विजय की आशाएँ आकर टिकी हैं.

इसी कारण से चावला का मुद्दा एक बड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है.

भारत, जिसकी गेंदबाज़ी को लेकर चिंता जताई जाती रही है, उसने इस लेग स्पिनर गेंदबाज़ में बहुत भरोसा किया हुआ है.

गेंदबाज़ उम्मीदों का ये बोझ और नियंत्रण की कमी से परेशान है, ये बात किसी से छिपी नहीं है.

उन्हें बार-बार इसी उम्मीद पर इस्तेमाल किया जा रहा है एक ऐसी टीम, जिसमें कि केवल ज़हीर ख़ान ही एकमात्र मैच जितानेवाले गेंदबाज़ लग रहे हों, वहाँ चावला एक चौंकानेवाले हथियार की भूमिका में नज़र आएँ.

ख़तरा

सवाल जो धोनी को अपने आप से पूछना है वो ये है कि ऐसे मैचों में जहाँ कि हार का मतलब विश्व कप से बाहर हो जाना हो, क्या वहाँ चावला को लेकर चाल चलने का ख़तरा उठाया जा सकता है.

या फिर क्यों नहीं दूसरे स्पिनर अश्विन को जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी मौक़ा दिया जाए ताकि जब ज़रूरत की घड़ी हो, तब आपके इस ऑफ़ स्पिनर के पास आत्मविश्वास की कमी ना हो.

ऐसे कई सवाल होंगे जो निश्चित रूप से इस टीम को डरा रहे हों और ये केवल गेंदबाज़ी से जुड़े नहीं होंगे.

टीम की फ़ील्डिंग पैनी नहीं है, और अचानक ही, दबाव के क्षणों में बल्लेबाज़ी भी बिखर जाती है.

ये अच्छा है कि ये सारी कमजोरियाँ प्रतियोगिता के शुरूआती दिनों में ही उभरकर सामने आ गई हैं और आत्मावलोकन और आगे का रास्ता तलाशने के लिए अभी समय है.

धोनी को अपनी रणनीति और जुआ खेलने की बुद्धि को संतुलित करना होगा क्योंकि दाँव बहुत बड़ा है.

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