अपने आप को चुनौती देते सचिन

  • 18 मार्च 2011
सचिन तेंदुलकर इमेज कॉपीरइट BBC World Service

ऐसे समय जब सारा भारत चिंतित है, क्रुद्ध है और अपनी टीम को अरबों सलाहें और लाखों झिड़कियाँ दे रहा है ताकि टीम विश्व कप जीत सके, एक ऐसा आदमी है जिसे ये बताने की ज़रूरत नहीं कि वो ये काम करे जिसके लिए कि वो मशहूर है – रन बनाना.

एक ऐसे आदमी के लिए जिसके क़दम हज़ारों मील की दौड़ लगा चुके होंगे, जिसके कंधे और हाथ लाखों बार घुम चुके होंगे और जिसका शरीर अब तक सर्जनों के हवाले हो जाना चाहिए था, सचिन तेंदुलकर लगातार अपनी उम्र को धता बताते हुए जीवटता की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं.

ऐसी उम्र में जबकि खिलाड़ी एक गरिमापूर्ण विदाई के बारे में सोचा करते हैं वो क्रिकेट खेलने की इच्छा रखनेवालों को अपने कौशल और इंसान की पहुँच से परे रहनेवाले दम-खम का प्रदर्शन कर चकित करते जा रहे हैं.

संभवतः आज तक कोई भी खिलाड़ी - चाहे वो कितना भी महान या कितना भी योग्य क्यों ना हो – उम्र बढ़ने के साथ-साथ लगातार बेहतर नहीं होता गया होगा, क्योंकि मानव शरीर शराब नहीं है जो पुरानी होने पर कीमती होती जाती है, बल्कि ये उम्र बढ़ने पर ढीली पड़ती जाती है.

फ़िटनेस

क्रिकेट में दूसरे व्यक्तिगत मुक़ाबलों वाले खेलों की तरह खिलाड़ियों से वैसी फ़िटनेस की माँग नहीं करता लेकिन फिर भी ये एक खिलाड़ी के शरीर से बहुत कुछ चाहता है.

ये ऐसा खेल है जिसमें दिमाग़, शरीर और योग्यता बराबर मात्रा में मज़बूत होना चाहिए और इसे हासिल करना इतना ही कठिन है जितना कि एक टेनिस खिलाड़ी के लिए होता है.

टेनिस में श्रेष्ठता के प्रतीक – रोजर फ़ेडरर – पुराना समय पाने के लिए एक मृगमरीचिका का पीछा कर रहे हैं.

उनसे कहीं जवान – रफ़ाएल नडाल – जिन्हें शारीरिक ताक़त की सीमाओं को चुनौती देनेवाला एक खिलाड़ी समझा जाता था, वे आज अपने शरीर को दोबारा दौड़ाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उनका खेल इससे प्रभावित हो रहा है.

वहीं तेंदुलकर के लिए, जब हम सब सोच रहे थे कि वो रिटायरमेंट के बारे में सोच रहे होंगे, पिछले कुछ साल ये सोचने में बीते हैं कि बेहतरीन तेज़, स्विंग, स्पिन गेंदबाज़ी का क्या जवाब क्या हो और कैसे कठिन से कठिन परिस्थिति में एकाग्रता बनाए रखी जाए.

वो पहले के किसी भी समय से बेहतर खेल रहे हैं, अपनी बैटिंग शैली में सुधार कर रहे हैं, जिसके बारे में हम सोचा करते थे कि उसे कोई चुनौती नहीं दे सकेगा.

ये एक ग़लती थी क्योंकि हम भूल गए थे कि एक जीनियस किसी बाहरी खिलाड़ी से प्रतियोगिता नहीं करता.

ख़ुद से प्रतियोगिता

वे स्वयं से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, चुनौती उनके भीतर से आ रही है, जब वे सारी दुनिया जीत चुके हैं.

तेंदुलकर जैसे किसी के लिए, श्रेष्ठता एक अंतहीन प्रक्रिया है, ये कोई ठहरा हुआ लक्ष्य नहीं है, इसकी सीमाएँ वो ख़ुद गढ़ते जा रहे हैं.

जैसा कि अभी तक की उनकी विश्व कप में की गई सटीक बल्लेबाज़ी में दिखा है, यहाँ उनके इस कौशल की एक झलक दिख सकती है, लेकिन ये वहीं पूरी नहीं हो जाएगी.

उनका मुग्ध और मोहित प्रशंसक इस लगातार जुटे हुए जीनियस का कमाल देखकर निःशब्द हो गया है, जो दुनिया की निगाहों में बेशक अमरत्व को प्राप्त कर चुका है, मगर स्वयँ अपनी निगाह में वो अभी भी बच्चा है, एक स्वप्नदर्शी जिसकी यात्रा, अभी शुरू ही हुई है.

इस विश्व कप में उनके और भारत के तमाम प्रतिद्वंद्वियों के लिए ये कितना सिहरा देनेवाला ख़याल है.

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