'क्रिकेट को क्रिकेट ही रहने दो'

  • 27 मार्च 2011
धोनी और शाहिद अफ़रीदी इमेज कॉपीरइट BBC World Service

विश्व कप के लीग मैच चल रहे थे और पाकिस्तान के हर मैच में उनका समर्थन करते देख मेरे एक मित्र ने मुझसे बड़े ही सपाट शब्दों में पूछा था- आप ऐसा क्यों कर रहे हो.

कोई भारतीय पाकिस्तान का समर्थन कैसे कर सकता है. राहत की बात थी कि वो भारत-पाकिस्तान का मैच नहीं था. अन्यथा देशद्रोही का तमग़ा लग ही जाता.

अब मैं उन्हें क्या समझाता. मैं ये किसी से कहना भी नहीं चाहता हूँ कि आप अपने देश का समर्थन न करें. भारत के लोग भारत का ही समर्थन करेंगे और पाकिस्तान के लोग भी अपने ही देश का.

लेकिन इन सबके बीच क्रिकेट की भी उतनी ही अहमियत है. मैं उन लोगों को क्या बताऊँ कि आज भी जब शोएब अख़्तर गेंदबाज़ी के लिए दौड़ना शुरू करते हैं, तो मेरी आँखें टीवी स्क्रीन से हटती नहीं हैं.

बात भले ही पुरानी हो गई हो, लेकिन वक़ार यूनुस की सटीक गेंदबाज़ी पर वाहवाह करने को किस क्रिकेट प्रेमी का जी नहीं करता होगा. न जाने कितने नाम हैं पाकिस्तानी क्रिकेट के, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से सबका मन जीता है.

तर्क

अब ये तर्क एक क्रिकेट प्रेमी के नाते कम से कम मेरे गले से तो नहीं उतरता कि सचिन तेंदुलकर का फ़ैन होने के नाते मैं शोएब अख़्तर की प्रशंसा नहीं कर सकता.

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Image caption सचिन की बल्लेबाज़ी देखना किसे पसंद नहीं आता

ये सब बातें इसलिए क्योंकि आजकल भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले सेमीफ़ाइनल को लेकर एक ओर उत्साह है, तो दूसरी ओर जंग जैसा जुनून.

विश्व कप क्रिकेट का सेमी फ़ाइनल हो. आमने-सामने हों भारत और पाकिस्तान की टीमें. प्रतिष्ठित प्रतियोगिता भारतीय उपमहाद्वीप में खेली जा रही हो और साबित करने के लिए बहुत कुछ हो, तो लोगों का जुनून समझ में आता है.

समझ में आती है दीवानगी क्रिकेट के प्रति. मोहाली में लोगों को होटल में कमरे नहीं मिल रहे. टिकट नहीं मिल रहे फिर भी स्टेडियम के बाहर भारी भीड़ किसी चमत्कार की उम्मीद में जमा रहती है.

ये है भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच को लेकर लोगों में उत्साह. इतना ही नहीं क्रिकेट के माध्यम से कूटनीति का फिर पुराना राग अलापा जा रहा है.

इसी का फ़ायदा उठाते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ़ रजा गिलानी और आसिफ़ अली ज़रदारी को न्यौता भी दे डाला है. अब ये दोनों नेता आएँगे या नहीं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो मोहाली ज़रूर जाएँगे.

लेकिन इन सबके बीच जब क्रिकेट को एक युद्ध की संज्ञा दी जाने लगती है और कुछ कट्टरपंथी ताक़तें फ़रमान जारी करने लगती हैं, को कहीं न कहीं क्रिकेट का मज़ा किरकिरा होने का ख़तरा भी पैदा हो जाता है.

वर्षों से क्रिकेट को दोनों देशों के बीच जंग का नाम देने वाले अब भी अल्पसंख्यक नहीं हैं. उनकी तादाद बहुत ज़्यादा है. मौक़ा मिलने पर क्रिकेट खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी करने वाले राजनेता भी कम नहीं.

सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी एक तबका इसे युद्ध का रूप देने पर तुला हुआ है. कुछ टीवी चैनल ने तो इस युद्ध को मसालेदार बनाने की पूरी तैयारी कर ली है.

एक सदी बीत गई है ये राग अलापते हुए. हमें पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना चाहिए या नहीं- इस पर चर्चाएँ कभी नहीं थमेगी. कभी कश्मीर का फ़ैसला क्रिकेट के मैदान पर कर लेने की भी बात कही जाती थी.

सीख

दुनिया बदली, समय बदला और हम ग्लोबल विलेज में रहने लगे. लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट युद्ध की चर्चा नहीं बदली.

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Image caption शोएब के फ़ैन्स भी दुनियाभर में हैं

मोहाली में होने वाले तथाकथित युद्ध के बीच कट्टरपंथी संगठनों का ये फ़रमान भी सामने आया है कि अगर पाकिस्तान की टीम फ़ाइनल में पहुँची, तो उसे मुंबई नहीं आने दिया जाएगा.

मुंबई में वर्ष 2008 में हुए हमलों और उसमें पाकिस्तान की भूमिका का हवाला देते हुए इस संगठन ने फ़तवा जारी किया है. अब आप ही बताइए क्या पाकिस्तान की टीम को भारत में होने वाले विश्व कप के फ़ाइनल में पहुँचने का हक़ नहीं.

इन संगठनों को ये बात पहले ही सोचनी चाहिए थी कि पाकिस्तान की टीम भी विश्व कप के फ़ाइनल में पहुँच सकती है. अगर उन्हें फ़रमान जारी ही करना था तो विश्व कप के भारत में आयोजन के विरोध में करते.

मुझे तो सिर्फ़ इतना ही कहना है कि ये क्रिकेट का मैदान है, जंग का मैदान नहीं. आप सभी अपने-अपने देशों का समर्थन कीजिए, इसमें कोई बुराई नहीं. लेकिन क्रिकेट का भी मज़ा लीजिए. खिलाड़ियों के प्रदर्शनों को सराहिए और हार-जीत को पचाना भी सीखिए.

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