क्रिकेट में अब एशिया की बारी

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अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी ने विश्व कप 2011 ख़त्म होने के बाद टीम ऑफ़ द टूर्नामेंट की घोषणा की है. इस टीम में श्रीलंका के चार खिलाड़ी, भारत के तीन खिलाड़ी और पाकिस्तान का एक खिलाड़ी है. यानी 11 में से आठ खिलाड़ी एशियाई हैं.

ये विश्व कप भारतीय उपमहाद्वीप में आयोजित हुआ था और विजेता बनी टीम इंडिया. लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में भारतीय टीम का जीतना सिर्फ़ इत्तेफ़ाक नहीं. ये दम है एशियाई टीमों का, जो भारत के रूप में विजेता बनकर उभरा, श्रीलंका के रूप में उप विजेता बना और पाकिस्तान के रूप में सेमी फ़ाइनल तक पहुँचने वाली टीम बना.

ये सिर्फ़ इत्तेफ़ाक नहीं कि चार एशियाई टीमों में से तीन सेमी फ़ाइनल तक पहुँची और दो का मुक़ाबला ख़िताब के लिए हुआ. ये विश्व कप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एशियाई देशों के बढ़ते प्रभुत्व का प्रतीक है.

सालों की मेहनत

Image caption कपिल देव की 'अंडरडॉग टीम' ने 1983 में कमाल कर दिखाया था.

लेकिन ये चार दिन की चाँदनी नहीं है, ये प्रभुत्व स्थापित होने में वर्षों लगे हैं और इन टीमों के शानदार प्रदर्शन को देखते हुए ये लगता है कि ये वर्चस्व इतनी आसानी से एशियाई देशों के हाथों से नहीं निकलेगा.

28 साल बाद भारत ने दोबारा विश्व कप का ख़िताब हासिल किया है. लेकिन ये 28 साल एशियाई क्रिकेट के लिए वरदान साबित हुए हैं.

वर्ष 1983 में कपिल देव की कप्तानी में जब भारतीय टीम ने विश्व कप जीता, तो शायद ही किसी ने इसकी उम्मीद की थी. लेकिन कपिल देव की अंडरडॉग टीम ने यह कमाल कर दिखाया.

रॉबर्ट्स, गार्नर, होल्डिंग और मार्शल जैसे गेंदबाज़ों की चौकड़ी के सामने 183 रन बनाना और फिर ग्रीनिज, हेंस, रिचर्ड्स और लॉयड जैसे खिलाड़ियों के रहते उन्हें सिर्फ़ 140 रनों पर समेट कर ख़िताब जीतना आसान नहीं था.

भारत की साहसिक जीत ने एशिया में क्रिकेट के मायने को बदल कर रख दिया. हालाँकि एशियाई देशों को यह जीत पचाने और वेस्टइंडीज़, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और बाद में दक्षिण अफ़्रीका के प्रभुत्व को चुनौती देने में वर्षों लग गए.

लेकिन कपिल देव की टीम की जीत ने बाक़ी के एशियाई मुल्कों में यह भरोसा ज़रूर भर दिया था कि अगर भारत ख़िताब जीत सकता है तो हम क्यों नहीं.

पाकिस्तान का कमाल

Image caption 1992 में पाकिस्तान की जीत ने सबको चौंका दिया था.

एशियाई देशों को एक बड़ा तोहफ़ा उस समय मिला जब 1987 के विश्व कप का आयोजन भारत और पाकिस्तान को मिला. इस विश्व कप में दोनों ही मेज़बान देश भारत और पाकिस्तान सेमी फ़ाइनल तक पहुंचे लेकिन हार गए.

एक बार फिर वक़्त पर अच्छा न खेल पाने की एशियाई देशों की कमी सामने आई और फिर हार तो होनी ही थी. लेकिन 1983 से शुरू हुई ख़ामोश क्रांति धीरे-धीरे बलवती होती गई.

1987 का क़रीबी मामला, 1992 में आकर एक और सपने की सच्चाई बना. ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड में हुए विश्व कप में पाकिस्तान ने ख़िताब जीतकर सबको चौंका दिया. वो भी ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की धरती पर.

पाकिस्तान ने दुनिया को दिखाया कि तेज़ गेंदबाज़ सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या वेस्टइंडीज़ के ही नहीं हो सकते. इमरान ख़ान और वसीम अकरम ने दुनिया की दिखाया कि उपमहाद्वीप की बेजान पिचों वाले देश में तेज़ गेंदबाज़ी के तुर्रम ख़ाँ भी पैदा हो सकते हैं.

आने वाले वर्षों में पाकिस्तान ने इमरान ख़ान, वसीम अकरम, वक़ार यूनुस और फिर शोएब अख़्तर के रूप में दुनिया को बेहतरीन तेज़ गेंदबाज़ दिए लेकिन पाकिस्तानी क्रिकेट में लगातार उठते विवाद और वहाँ के हालात ने क्रिकेट को काफ़ी प्रभावित किया. और पाकिस्तान की टीम इस विरासत को संभाल नहीं पाई. ये कहानी हर क्रिकेट प्रेमी को पता है.

लेकिन 1992 का विश्व कप जीतकर पाकिस्तान ने यह दिखा दिया कि एशियाई टीमें भी बाक़ी टीमों की आँख में आँख डालकर ये कह सकती हैं कि हममें भी है दम.

श्रीलंका शीर्ष पर

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Image caption वर्ष 1996 अर्जुन रणतुंगा की टीम ने लाहौर में विश्व कप अपने नाम किया

इन सबके बीच तीसरे एशियाई देश में क्रिकेट ने एक नई करवट ले ली थी. ये एकाएक नहीं हुआ कि 1996 आते-आते तीसरे एशियाई देश ने भी चैम्पियन टीम में अपना नाम लिखा लिया.

अर्जुन रणतुंगा के नेतृत्व में पनपती टीम में सबकुछ था.

बल्ले का दम, स्पिन का तेज़ था और तेज़ गेंदबाज़ी में भी कुछ नयापन था, हालाँकि अब भी एशियाई टीमों की समस्या तेज़ गेंदबाज़ी ही बनी रही. रणतुंगा की टीम ने जब ऑस्ट्रेलियाई टीम को फ़ाइनल में परास्त किया तो लगा एशियाई टीमें बस क्रिकेट की दुनिया में राज करने वाली है.

क्रिकेट में आक्रामकता, मैदान पर प्रतिद्वंद्विता और हार न मानने की कला एशियाई देशों में आ गई थी, लेकिन कमी भी बहुत कुछ रह गई थी. कमी थी अपने घर से निकलकर जीत हासिल करने की, कमी थी तेज़ गेंदबाज़ों की और कमी थी जीत की आदत न डालने की.

नतीजा 1999 के विश्व कप में पाकिस्तान की टीम फ़ाइनल में पहुँचकर बुरी तरह हारी, तो 2003 के विश्व कप में भारत की टीम फ़ाइनल में बुरी तरह हारी और फिर 2007 के फ़ाइनल में बुरी तरह हारने की बारी थी श्रीलंका की.

1983 के विश्व कप से दुनिया जीतने का सपना सच होते देख एशियाई देशों ने धीरे-धीरे अपने को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के हिसाब से ढालने की अच्छी कोशिश की.

इसी का नतीजा था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और फिर दक्षिण अफ़्रीका का दबदबा कम तो हुआ लेकिन ख़त्म नहीं हुआ. वेस्टइंडीज़ की टीम धीरे-धीरे रेस से बाहर हो गई थी और कई फ़ाइनल हार चुकी इंग्लैंड की टीम भी कुछ ख़ास नहीं कर पा रही थी.

एशिया की चुनौती

Image caption वर्ष 2008 में भारत के ऑस्ट्रेलिया में प्रदर्शन ने नया अध्याय लिखा.

लेकिन धीरे-धीरे ही सही ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ़्रीका के आगे एशियाई चुनौती ज़ोर पकड़ने लगी. पिछले कुछ वर्षों में इन दोनों टीमों के लिए जीत मुश्किल होने लगी. टेस्ट क्रिकेट में भारत ने ऑस्ट्रेलिया के लंबे समय से चले आ रहे वर्चस्व को तोड़ा तो वनडे में भी कमाल होने लगा. श्रीलंका ने भी कई बार अपने प्रदर्शन से लोगों को चकित दिया.

सबसे बड़ा मौक़ा उस समय आया, जब भारत ने ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में धूल चटाई. 2008 में भारत ने तीन देशों की प्रतियोगिता में जब ऑस्ट्रेलिया को लगातार दो फ़ाइनल में शिकस्त दी, तो एक नया अध्याय लिखा गया.

वर्ष 2007 के विश्व कप में पहले ही दौर से बाहर हो जाने वाली भारतीय टीम की सफलता की कहानी आम नहीं ख़ास है. महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी और टीम का आकलन फिर कभी करेंगे. पिछले कुछ वर्षों में एशियाई टीमों ने अपनी बल्लेबाज़ी को काफ़ी दुरुस्त और आक्रामक बनाया है.

बल्लेबाज़ी भारत की मज़बूती रहा है, लेकिन अब ये बल्लेबाज़ी इतनी आक्रामक और बेहतरीन हुई है कि जीतना आसान लगने लगा है. स्पिन तो शुरू से ही एशियाई टीमों का ख़ास हथियार रहा है. और इस मोर्चे पर भी एशियाई टीमों को मात देना मुश्किल है. चाहे तो भारत हो, पाकिस्तान हो, श्रीलंका हो या फिर बांग्लादेश हो.

और एक बार फिर भारत

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Image caption भारतीय क्रिकेट टीम की जीत के बाद रात भर चला जश्न

2011 के विश्व कप के बाद एक नया परिदृश्य क्रिकेट जगत में दिखने लगा है. परिदृश्य एशियाई देशों के प्रभुत्व का. इसमें कोई शक़ नहीं कि एशियाई देशों ने अपना दम दिखाया है.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अगर आप इसे वर्चस्व मान भी लें, तो सवाल ये है कि ये वर्चस्व कितने दिनों का है. एशियाई देशों को ये बात तो समझनी होगी कि सिर्फ़ मज़बूत बल्लेबाज़ी और चमकदार स्पिन गेंदबाज़ी की बदौलत क्रिकेट की दुनिया पर आप राज नहीं कर सकते.

भारत और श्रीलंका की मुश्किल तेज़ गेंदबाज़ी है. एक ज़हीर ख़ान और एक लसिथ मलिंगा की बदौलत कोई भी टीम क्रिकेट की शहंशाह नहीं कहला सकती. एक समय एशियाई देशों को तेज़ गेंदबाज़ी का सबक सिखाने वाली पाकिस्तान की टीम की समस्या कुछ और है.

इस विश्व कप में टीम सेमी फ़ाइनल तक पहुँची तो है, लेकिन ये विवादों से घिरी पाकिस्तानी क्रिकेट के लिए कितना फ़ायदा पहुँचाएगी, ये तो आने वाला वक़्त बताएगा.

इस विश्व कप का ख़िताब एक एशियाई टीम भारत ने जीता है, फ़ाइनल में हारने वाली टीम भी एक एशियाई टीम श्रीलंका है और सेमी फ़ाइनल में हारने वाली टीमों में से एक एशियाई टीम पाकिस्तान की है.

लेकिन एशियाई टीमों का ये दबदबा दीर्घकालिक रहे, इसके लिए उन्हें विश्व स्तरीय तेज़ गेंदबाज़ों की पूरी पीढ़ी तैयार करनी होगी, जो इतना आसान नहीं.

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