मुरली के साथ खेलना ख़ुशकिस्मती

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टीम को फ़ाइनल जीतने की बड़ी उम्मीद थी लेकिन ये बड़े दुख की बात है कि हम भारत से हार गए. मैंने सिर्फ़ दो विश्व कपों में हिस्सा लिया है और ये एक ख़राब अहसास है कि दोनों ही बार श्रीलंका दूसरे स्थान पर रहा है.

फ़ाइनल में जीत का पूरा श्रेय भारत को जाता है. भारत ने हमसे बेहतर बैटिंग, बॉलिंग और फ़ील्डिंग की.

अगर मैं दस ओवर तक और पिच पर टिका रहता और कप्तान कुमार संगाकारा के साथ एक साझेदारी करता तो मैं अपने प्रदर्शन से ख़ुश होता.

ज़हीर ख़ान की शानदार गेंद पर उपुल थरंगा के आउट हो जाने के बाद मैं क़दम पीछे खींचने पर मजबूर हो गया. अगर मैं अपना स्वभाविक खेल खेलता और आक्रामक शॉट लगाता तो मेरी विकेट जाने का ख़तरा होता.

फ़ाइनल मेरा आउट होना इस सारे टूर्नामेंट में सर्वाधिक दुर्भाग्यशाली रहा. गेंद ने बल्ले को नहीं छुआ, वो मेरे आर्मगार्ड में लगी, उसके बाद पैड पर और फिर स्टंप्स में घुस गई.

मुझे यक़ीन है कि अगर में कुछ देर और टिका रहता तो हम 300 से अधिक रन बनाते. इतने बड़े स्कोर का पीछा करना आसान नहीं होता.

टॉस पर विवाद और टीम में बदलाव

Image caption संगाकारा हमेशा हैड्स की कॉल देते हैं और फ़ाइनल के टॉस पर भी उन्होंने वही किया.

इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल ने संकेत दिए कि धोनी या संगाकारा में से एक ने पहली बार हुए टॉस की 'कॉल' ना सुनने का बहाना बनाया होगा.

मुझे सही-सही नहीं पता कि क्या हुआ लेकिन संगाकारा के अनुसार हज़ारों फ़ैन्स के शोर के बीच उन्हें कुछ सुनाई नहीं दिया.

संगाकारा आमतौर पर 'हैड्स' की कॉल देते हैं और फ़ाइनल में भी उन्होंने वही किया लेकिन धोनी और मैच रेफ़री जैफ़ क्रो ने संगाकारा की ये 'कॉल' नहीं सुनी.

हमने टीम में चार बदलाव किए. एंजेलो मैथ्यूज़ घायल थे. टीम में बदलाव एक संयुक्त फ़ैसला था. शुक्रवार को सारी टीम ने इस विषय पर चर्चा की थी और निर्णय के लिए टीम के सभी सदस्य ज़िम्मेदार हैं.

अगर हम विश्व कप जीत जाते तो कई लोग हमारे इस फ़ैसले की तारीफ़ करते लेकिन ये स्वभाविक है कि अब कुछ लोग इस फ़ैसले पर सवाल उठा रहे हैं.

हमने थिसारा पेरेरा और नुवान कुलासेकारा को एंजेलो मैथ्यूज़ की जगह रखा था. मैथ्यूज़ का घालय होना टीम के लिए एक बड़ा धक्का था.

कुलासेकारा ने जयवर्धने के साथ एक महत्त्वपूर्ण साझेदारी की. उधर सूरज रांदिव ने भी बढ़िया गेंदबाज़ी की लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें कोई विकेट नहीं मिली.

मेरे विचार से टीम में सभी परिवर्तन कारगर साबित हुए लेकिन हम अपनी क्षमता के अनुकूल नहीं खेले और भारत ने हमें कोई मौका भी नहीं दिया.

नए खिलाड़ियों के सहायक थे मुरली

टूर्नामेंट शुरू होने से पहले मैंने अपने लिए 'प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट' बनने का लक्ष्य रखा था. और मेरे ख़्याल से मैं इस लक्ष्य के क़रीब भी पहुंचा. मुझे दुख है कि मैं अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पाया लेकिन मुझे ये यक़ीन भी है कि अगर श्रीलंका विश्व कप जीतता तो मैं 'प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट' बन जाता.

लेकिन मेरा फ़ोकस केवल व्यक्तिगत लक्ष्य पर ही नहीं था, हम 1996 के बाद पहली बार विश्व कप श्रीलंका लाना चाहते थे.

ये बहुत ही दुख की बात है कि हम मुरलीधरन को बढ़िया विदाई नहीं दे पाए. मुरली इससे बेहतर विदाई के हक़दार थे. सारी टीम उनके लिए विश्व कप जीतना चाहती थी. सबसे पहले मुरली के साथ खेलने की याद अब भी ताज़ा है.

वर्ष 1999 में मुझे श्रीलंका के ज़िम्बाब्वे के दौरे के लिए चुना गया. उस दौरे पर मुरली ही था जिसनें मेरे जैसे युवा खिलाड़ी का साथ दिया था. मुरली एक महान खिलाडी़ हैं जिन्होंने पिछले 20 सालों में श्रीलंका और विश्व क्रिकेट की सेवा की है.

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Image caption मुरलीधरन हमेशा टीम के नए सदस्यों का साथ देते थे.

मुझे ऐसा एक भी पल याद नहीं पड़ता जब मुरली मैच के दौरान टीम को उत्साहित करने के लिए बोलना बंद करते हों. मैं स्वयं ड्रैसिंग रूम में एक हंसमुख व्यक्ति, एक बढ़िया दोस्त और महान प्रेरक को खोने का अहसास कर रहा हूं.

टीम में जब भी कोई नया खिलाडी़ आता है तो मुरली उससे बात करता है, उसे सलाह देता है, उसका आत्मविश्वास बढ़ाता है और उसे अपने साथ डिनर पर भी ले जाता है. वो नए खिलाडी़ का पूरा साथ देता है.

मुरली श्रीलंकाई टीम के कई खिलाड़ियों का प्रेरक रहा है और मैं ख़ुद को ख़ुशकिस्मत समझता हूं कि मैंने उसके साथ क्रिकेट खेली है.

मैं मुरली के भविष्य के लिए शुभकामनाएं देता हूं. मैं चाहता हूं कि वे भविष्य में किसी न किसी रूप में श्रीलंका क्रिकेट की सहायता करें.

(तिलकरत्ने दिलशान से बीबीसी सिंहला सेवा के सरोज पथिराना ने बातचीत की.)

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