खेल महासंघ ने आरोपों को बेबुनियाद बताया

  • 11 अप्रैल 2011
दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल
Image caption दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को लेकर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे हैं

राष्ट्रमंडल खेल महासंघ यानी सीजीएफ़ ने दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर आई शुंगलू समिति की रिपोर्ट में खेल महासंघ पर लगे आरोपों को बेबुनियाद क़रार दिया है.

सीजीएफ़ का कहना है कि रिपोर्ट के प्रकाशन से पहले उसे अपनी बात रखने का मौक़ा नहीं दिया गया.

बयान के अनुसार, “सीजीएफ़ इस बात को लेकर काफ़ी चिंतित है कि उसे समिति की रिपोर्ट के प्रकाशन से पहले उनकी समीक्षा या उस पर टिप्पणी करने का कोई अवसर नहीं दिया गया.”

ये भी कहा गया है कि इसी वजह से रिपोर्ट में कई तथ्यहीन बातें कही गई हैं.

बयान में खेल महासंघ के सभी अधिकारियों का ज़बरदस्त बचाव किया गया है मगर खेलों की आयोजन समिति और उसके अध्यक्ष रहे सुरेश कलमाड़ी का कहीं कोई बचाव नहीं है.

हूपर का बचाव

इस बयान में शुंगलू समिति की रिपोर्ट के उस हिस्से का ज़िक्र है जिसमें कहा गया है कि सीजीएफ़, उसके अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की भूमिका वो बिल्कुल नहीं थी जो होनी चाहिए थी. इसके अलावा जिस तरह के अधिकार उन्हें दिए गए थे वे महँगे तो थे ही बेहतर प्रबंधन के लिए ठीक नहीं थे.

इस पर सीजीएफ़ के बयान में कहा गया है, “सीजीएफ़ के सभी क़दम, उसके फ़ैसले और सिफ़ारिशें सिर्फ़ एक मक़सद को ध्यान में रखकर किए गए कि खेलों का सफल आयोजन हो.”

Image caption खेल महासंघ ने मुख्य कार्यकारी हूपर का बचाव किया है

खेल महासंघ के मुख्य कार्यकारी माइक हूपर अक्तूबर 2007 से अक्तूबर 2010 तक नई दिल्ली में रहे और इस दौरान उनके फ़ैसलों और उन पर हुए ख़र्चों की भी शुंगलू समिति की रिपोर्ट में चर्चा है.

रिपोर्ट के अनुसार हूपर पर दिल्ली में आया ख़र्च तीन करोड़ 45 लाख रुपयों का था.

मगर सीजीएफ़ ने इस मामले में हूपर का बचाव किया है. उसका कहना है कि हूपर पर हुए ख़र्चों पर आयकर लगने की वजह से ये ख़र्च ज़्यादा दिख रहे हैं वरना ये तय सीमा में ही थे जबकि हूपर ने जो फ़ैसले किए वे पद के अनुरूप ही थे.

सीजीएफ़ के मुताबिक़ हूपर ने जो भी फ़ैसले किए वे सफल खेलों के आयोजन में काफ़ी कारगर साबित हुए.

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