'कोच के रूप में विदेशी ही क्यों?'

  • 29 अप्रैल 2011
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Image caption डंकन फ़्लेचर को हाल ही में भारतीय क्रिकेट टीम का कोच चुना गया है.

एक ऐसा देश जहाँ गुरु-शिष्य परंपरा को पावन माना जाता है और जिसे धर्मग्रंथ से मान्यता मिली हो, उस देश में एक क्रिकेट कोच की नियुक्ति भी लोगों में ख़ासी रुचि पैदा कर सकती है.

भारत का नया क्रिकेट कोच गोलाकार, भारी-भरकम और आलसी दिखने वाला ज़िम्बाबवे क्रिकेट टीम का एक पूर्व ख़िलाड़ी है, जिसके बारे में यहां ज़्यादा लोगों ने नहीं सुना होगा.

शायद लोग उनके बारे में इतना जानते होंगें कि वे इंगलैंड क्रिकेट टीम के कोच रह चुके हैं और उस भूमिका में उन्होंने ठीक-ठाक काम किया है.

डंकन फ़्लेचर की नियुक्ति का बड़ी गंभीरता से विश्लेषण किया जा रहा है. भारत के दो मशहूर क्रिकेट ख़िलाड़ियों को ये नियुक्ति कुछ जमी नहीं.

उनका कहना है कि इस भूमिका के लिए भारत एक भारतीय को ही क्यों नहीं चुन पाया?

ये एक जायज़ सवाल है जिस पर एक बड़ी बहस होनी चाहिए. इस मुद्दे की तह तक पहुंचने के लिए शायद इस कॉलम से बड़ी जगह की ज़रूरत पड़ेगी.

वैसे इतना भर कहना काफ़ी होगा कि एक क्रिकेट-प्रेमी देश के लिए ये शर्मनाक बात है कि उसे हमेशा कोच ढूंढने के लिए देश के बाहर नज़र घुमानी पड़ती है.

जो क्रिकेट टीम विश्व में अव्वल दर्जे पर है, उसे इस खेल की तकनीक सिखाने के लिए एक बाहरी आदमी की ज़रूरत पड़ गई है?

इस रवैए को उपनिवेशी मानसिकता कहें या फिर ये कहें कि भारत के पास वाकई इन गुणों की कमी है? इस विषय पर गहन विचार की ज़रूरत है.

टीम में राजनीति

कई बार खिलाड़ियों से ही ये सुनने को मिलता है कि वे कोच की भूमिका के लिए किसी भारतीय पर भरोसा नहीं करते क्योंकि उन्हें टीम में ‘राजनीति’ के घुस आने का डर रहता है.

लगभग एक दशक पहले जब जॉन राइट भारत के पहले विदेशी कोच बने तो भारत ने कभी ये नहीं सोचा कि इस भूमिका के लिए किसी भारतीय को भी चुना जा सकता था.

जब ग्रेग चैपल अपने निरंकुश और अनुचित तरीक़ों से भारतीय टीम के विनाश में लगे हुए थे, तब भी भारत ने विदेशी मदद ली.

कहा जाता है कि चैपल ने अपने तरीक़ों से कोचिंग नियम-पुस्तक बनाने में बेहतरीन योगदान किया, क्योंकि उन्होंने दुनिया को बताया कि किस तरह कोचिंग नहीं की जानी चाहिए.

उन्होंने पूरी तरह से भारतीय टीम का मनोबल गिरा दिया था.

उनके उत्तराधिकारी गैरी कर्स्टन एक समझदार इंसान साबित हुए, जिन्होंने चैपल के नियमों को पीछे छोड़ दिया.

गैरी के बारे में कहा जाता है कि वे भारतीय टीम के लिए एक वरादान साबित हुए. भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों ने उन्हें असली भारतीय गुरु माना और हमेशा उन्हें इज़्ज़त दी.

डंकन फ़्लेचर को शायद जल्द ही भारतीय टीम के बेहतरीन खिलाड़ी रिटायरमेंट के लायक लगने लगें.

क्या फ़्लेचर भारतीय टीम में फूट डाले बिना इस टीम का पुनर्निर्माण कर पाएंगें?

गैरी कर्स्टन को तो लगता है कि फ़्लेचर उनकी ही तरह सोचते हैं, पर क्या फ़्लेचर भारतीय टीम की नैया को सुरक्षित किनारे पर ले जा पाएंगें?

अगर वो ऐसा कर पाते हैं, तो उनके सेवानिवृत्त होने के बाद एक भारतीय को कोच के रूप में देखना मुश्किल लगता है.

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