उबाऊ और थकाऊ हुआ आईपीएल-4

  • 19 मई 2011
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चार साल पहले हल्ला बोलने वाला आईपीएल कहने को तो एक विश्व स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता है लेकिन इसमें जितना खेल का पुट है उतना ही बाज़ार भी शामिल है...और रही-सही कसर ग्लैमर पूरा करता है.

ज़ाहिर है जब क्रिकेट, पैसे और ग्लैमर का ऐसा घातक मिश्रण लोगों को पहली बार परोसा गया तो लोगों ने आईपीएल को हाथों-हाथ लिया. लेकिन आईपीएल-4 के आते-आते ये चमक थोड़ी फ़ीकी पड़ती नज़र आ रही है.

ऐसे में रुचि बनाए रखने के लिए टीम मालिकों को नए-नए तरीके इजाद करने पड़ रहे हैं ताकि लोगों की रुचि का ग्राफ़ केवल कुछ शुरुआती और अंतिम मैचों तक ही न सिमट जाए. योजना है कि अब टीमें साल भर प्रोमोशन करेंगी.

इसमें बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ आईपीएल टीमों का विज्ञापन करना, कोचिंग कैंप लगाना और साल भर तरह- तरह की प्रतियोगिताएँ करवाना शामिल है. डेल्ही डेयरविल्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने बताया है कि टीमो सोशल नेटवर्क आदि का सहारा लेकर इस साल बड़ा प्रोमोशनल कार्यक्रम लेकर तैयार हैं.

जब आईपीएल पहली बार शुरु हुआ था तो टी-20 के इस फटाफट खेल को देखने के लिए स्टेडियम खचाखच भरने लगे. सास बहू सीरियल देखने वालों ने भी रात को अपनी वफ़ादारी आईपीएल के लिए बदल ली.

लेकिन आईपीएल-4 पर जैसे सुस्ती के बादल छाने लगे हैं. सचिन जैसे खिलाड़ियों को देखने के लिए भीड़ जुटती है पर अब हर मैच में स्टेडियम खचाखच नहीं भरे रहते, कई टीवी दर्शक भी अपना पाला बदल धारावाहिकों और रियलिटी शो का रुख़ करने लगे हैं. ऐसा लगता है कि आईपीएल का लंबा थकाऊ फ़ॉर्मेट थोड़ा उबाऊ लगने लगा है.

हाल ही में आए टैम स्पोर्ट्स आँकड़ों के मुताबिक आईपीएल के पहले तीन संस्करणों में 37 मैचों की औसत टीवी रेटिंग 4.81 थी लेकिन आईपीएल-4 में ये घटकर 3.26 हो गई है. विज्ञापनों पर भारी भरकम ख़र्च करने वाली कंपनियों के लिए भी घटती रेटिंग शुभ संकेत नहीं.

लगभग दो महीने तक चले विश्व कप के तुरंत बाद आए आईपीएल ने लोगों को साँस तक लेने का वक़्त नहीं दिया.

इससे पहले कि लोग विश्व चैंपियन बनने की ख़ुमारी का लुत्फ़ उठा पाते, आईपीएल सामने मुँह बायं खड़ा था...कुछ लोगों के लिए शायद क्रिकेट का ओवरडोज़ हो गया. और फिर कितने ऐसे मैच रहे जो रोमांचक रहे, जिनमें आख़िरी ओवर या गेंद पर फ़ैसला हुआ हो.

क्रिस गेल भले ही एक ओवर में 37 रन जड़ दिए हों लेकिन उस रोमांच का क्या जब लंबे इंतज़ार के बाद शानदार चौक्का या छक्का देखने को मिलता था.

खिलाड़ी बड़ा या टीम

स बार नई टीमें आने और कई बड़े खिलाड़ियों की अदला-बदली से भी लोगों में थोड़ी असमंजस की स्थिति रही. यूरोप के फ़ुटबॉल क्लबों की तरह अभी आईपीएल में उस तरह से टीमों के प्रति लगाव और वफ़ादारी की संस्कृति नहीं पनपी है, स्टार खिलाड़ी अब भी हावी है.

आईपीएल जब शुरु हुआ था तो हर टीम का एक आइकन खिलाड़ी थी जैसे युवराज पंजाब टीम के, गांगुली कोलकाता के..जिससे स्थानीय लोग इन टीमों से जुड़ाव महसूस कर सकें.

लेकिन युवराज की ख़ातिर किंग्स इलेवन पंजाब का समर्थन करने वाले कई स्थानीय लोग मोहाली में इस बार किंग्स इलेवन का मैच देखने नहीं आए. कोलकाता नाइट राइडर्स में गांगुली के नहीं होने पर ईडन गार्डन्स में क्या हुआ सबने देखा, ख़ुद शाहरुख़ खान को सफ़ाई देनी पड़ी.

डेल्ही डेयरडेविल्स टीम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीओओ) अमृत माथुर कहते हैं, “आईपीएल का ढाँचा ही ऐसा है कि कुछ सालों बाद खिलाड़ियों की अदला-बदली होती रहेगी. ऐसे में लोगों के बीच टीम की पहचान और वफ़ादारी बनाने में दिक्कत होती है. लेकिन दीर्घकालिक परिपेक्ष में देखें तो टीम और ब्रैंड ज़्यादा बड़ा बन जाएगा. यानी टीम पहले और खिलाड़ी बाद में.”

करना होगा प्रोमोशन

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इस बार कई खिलाड़ियों पर अच्छी-ख़ासी बोली लगी है, ज़ाहिर है मालिकों भी तिजोरी भरने की उम्मीद लगाए बैठे हैं. अभी चिंता की बात नहीं लेकिन लोगों की उदासीनता अच्छा संकेत भी नहीं है.

अगले साल आईपीएल ब्रैंड को भुनाने के लिए टीमों के प्रबंधन ने तैयारी अभी से शुरु कर दी है. अब आईपीएल ब्रैंड का प्रोमोशन केवल प्रतियोगिता के दौरान ही नहीं होगा.

विभिन्न टीमों का प्रबंधन तैयारी कर रहा है कि साल भर तरह-तरह के प्रोमशन और कार्यक्रम चलें ताकि लोग इस बीच आईपीएल को भूल न जाएँ.

मकसद सिर्फ़ यही कि लोगों के ज़हन में आईपीएल ब्रैंड घर कर जाए.ज़ाहिर है आईपीएल अपने आप में इतना बड़ा कॉमर्शियल ब्रैंड बन चुका है कि उसके अस्तित्व को तो ख़तरा नहीं है.

लेकिन लंबे समय तक इसमें लोगों की रुचि बरकरार रखने और आईपीएल को धनकुबेर बनाए रखने के लिए नए-नवेले विचारों के ज़रिए इसे अपना रंग-रूप बदलते रहना होगा.

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