तुमको ना भूल पाएँगे....

  • 10 जून 2011
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किसी फ़ेवरिट खिलाड़ी का खेल को अलविदा कहना गहराई तक पीड़ा देता है. अप्रत्यक्ष रूप से उस खिलाड़ी के साथ मैदान के हर पल को जीना एक जज़्बा है, जोश है और जुनून है.

उसकी हर हार और हर जीत में चीखने-चिल्लाने से लेकर गरियाने तक की भावना इतनी आसानी से नहीं पनपती. वर्षों लगते हैं इसे पनपने में. खेलशास्त्र के अलावा किसी खिलाड़ी से जुड़ने का एक समाजशास्त्र भी होता है.

आप क्यों किसी ख़ास खिलाड़ी से जुड़ जाते हैं, क्यों उसका हर स्टाइल और उसकी हर उपलब्धि आपको अपनी लगने लगती है. खिलाड़ी और उसके प्रशंसकों का भावनात्कम रिश्ता अजीब होता है.

आप उसे नहीं जानते और न ही वो आपको जानता-समझता है, लेकिन ये भावना अटूट होती है. एक बार जब ये भावना पनप जाती है, फिर वो खिलाड़ी आपमें ऐसे जुड़ता है जैसे वो आपकी दिनचर्या का हिस्सा हो.

ब्राज़ील के रोनाल्डो ने फ़ुटबॉल से संन्यास ले लिया है. कोई अचरज वाली बात नहीं. पिछले कई वर्षों से उनका करियन ढलान पर था और फिर एक न एक दिन तो ऐसा होना ही था.

पता नहीं क्यों अपने इस प्रिय फ़ुटबॉल खिलाड़ी की विदाई की बात उन सारे सुनहरे क्षणों को एक बार फिर जीवंत कर रही है.

शौक

बचपन से क्रिकेट के साथ-साथ फ़ुटबॉल खेलने का भी शौक था. कम लागत वाले इस खेल को हर गाँव, गली और मोहल्ले का बच्चा खेलता है. लेकिन समय के साथ-साथ वो आगे बढ़ता है और फ़ुटबॉल से वास्ता कम होता जाता है.

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Image caption यूरोपीय लीग में भी रोनाल्डो का जलवा चला

भारत के परिप्रेक्ष्य में यह कटु सच्चाई है. फिर फ़ुटबॉल से उसका वास्ता ट्रेन की खिड़की से गाँव के मैदान में खेलते बच्चों को निहारने या फिर गली-मोहल्ले के बच्चों की किक से घर की खिड़की-दरवाज़ों से आकर टकराई गेंद को वापस करने तक सिमट कर रह जाती है.

सैटेलाइट टीवी के ज़माने में जब देश-दुनिया के फ़ुटबॉल को टीवी पर झाँकने का मौक़ा मिला, तो अजीब सुख मिला. लेकिन ये सुख बहुत मेहनत से मिलता था.

पता नहीं चला कब और कैसे ब्राज़ील और फिर रोनाल्डो ने दिल में जगह बना ली. विश्व कप फ़ुटबॉल आते ही बिजली की कमी से जूझने वाले बिहार में मैच देखने का जुगाड़ शुरू होता था.

जुगाड़ की आड़ में ब्राज़ील और रोनाल्डो के प्रति दीवानगी बढ़ती गई. 1994 के विश्व कप फ़ुटबॉल में ब्राज़ील ने जीत हासिल की थी. रोमारियो, बबेटो, फ़्रैंको, डूंगा, काफ़ू, लियोनार्डो, मारियो सिल्वा, टफ़रैल जैसे खिलाड़ियों के बीच रोनाल्डो टीम में ज़रूर थे, लेकिन उन्हें मौक़ा नहीं मिला.

हम भी ब्राज़ील की जीत के जश्न में सराबोर थे. बबेटो और रोमारियो भारत के फ़ुटबॉल प्रेमियों की ज़ुबां पर थे. लेकिन अगला कुछ साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस खिलाड़ी का रहा, वो थे हमारे पसंदीदा रोनाल्डो.

डंका

1998 के विश्व कप से पहले ही रोनाल्डो का दुनियाभर में डंका बज गया था. 1996 और 1997 में फ़ीफ़ा फ़ुटबॉलर ऑफ़ द ईयर बनने के बाद रोनाल्डो का जलवा विश्व कप में देखने का इतना उत्साह था कि पूछिए मत.

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Image caption रोनाल्डो का जौहर फ़ुटबॉल प्रेमियों के सर चढ़कर बोलता था

ठीक-ठाक शुरुआत के बाद फ़्रांस के ख़िलाफ़ फ़ाइनल में रोनाल्डो को लेकर जिस तरह का रहस्य बना, वो आज भी पचता नहीं. ब्राज़ील हारी और रोनाल्डो का निराश चेहरा देखकर मुझे भी रोना आया.

लेकिन अगले चार साल में जिस तरह रोनाल्डो ने तैयारी की और 2002 के विश्व कप में अपने पैरों का दम दिखाया. पूछिए मत. आज भी मुझे फ़ाइनल याद है जब रोनाल्डो ने दो ख़ूबसूरत गोल करके ब्राज़ील को चैम्पियन बना दिया था.

उस समय मैं दिल्ली में था और अपने घर में इतनी उछलकूद मनाई कि मकान मालिक की फटकार सुननी पड़ी. वर्ष 2006 का विश्व कप ब्राज़ील और रोनाल्डो दोनों के लिए बुरा रहा. लेकिन रोनाल्डो के प्रति दीवानगी कम नहीं.

वर्ष 2003 में लंदन जाने के बाद यूरोपीय लीग को और क़रीब से जानने समझने का मौक़ा मिला. उसी साल डेविड बेकम इंग्लैंड के प्रतिष्ठित क्लब मैनेचेस्टर यूनाइटेड को छोड़कर स्पेन के रियाल मैड्रिड गए थे.

रियाल मैड्रिड में उन दिनों दुनियाभर के कई स्टार खिलाड़ी खेलते थे. फ़्रांस के महान ज़िदान, स्पेन के राउल, पुर्तगाल के फ़िगो, ब्राज़ील के रॉबर्तो कार्लोस और फिर मेरे फ़ेवरिट रोनाल्डो.

मुश्किल

मुझे याद है रियाल मैड्रिड में शामिल होने के बाद बेकम ने कहा था कि ये उनके लिए गर्व की बात है कि वे रोनाल्डो और ज़िदान जैसे खिलाड़ियों के साथ खेलेंगे.

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Image caption रोनाल्डो ने फ़ुटबॉल से संन्यास ले लिया है

लेकिन धीरे-धीरे रोनाल्डो की धार में कमी नज़र आने लगी. उनका हर मैच देखते उसी क्षण का इंतज़ार रहता था, जब रोनाल्डो बेहतरीन गोल मारते थे. रियाल मैड्रिड के बाद रोनाल्डो एसी मिलान चले गए. जहाँ उन्हें भयंकर चोट लगी और उनके फ़ुटबॉल करियर का अंत क़रीब दिखने लगा.

रोनाल्डो ने वापसी तो की लेकिन इस बार वे वापस ब्राज़ील चले गए. बढ़ते वज़न के बीच रोनाल्डो ने आठ जून को अपना विदाई मैच खेला. 15 मिनट के लिए वे मैदान पर आए और गोल करने के तीन सुनहरे मौक़े गँवाए.

इन मौक़ों को गँवाने के बाद भी जब ब्राज़ील के मौजूदा स्टार खिलाड़ी रॉबिनियो ने उन्हें गले लगाया तो लगा ब्राज़ील की नई पीढ़ी इस महान खिलाड़ी के योगदान का जश्न मना रही है.

रोनाल्डो की ख़ासियत की चर्चा करना बहुत मुश्किल है. लेकिन इस फ़ॉरवर्ड खिलाड़ी ने फ़ुटबॉल को एक नई दिशा दी. विपक्षी खिलाड़ियों के बीच से गेंद निकालकर गोल करना रोनाल्डो की ख़ूबसूरती थी.

हर अच्छे खिलाड़ी को एक दिन अलविदा कहना होता है. लेकिन उछलती, गिरती-पड़ती गेंदों के बीच अपना करिश्मा दिखाते रोनाल्डो का चेहरा नहीं भूल पाएगा.

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