हार पर हैरानी नहीं

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मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई भी जिसके भीतर आलोचना करनेवाली आत्मा ज़िन्दा है और जिसका विवेक उस पैसे के विशाल चक्र के लिए गिरवी नहीं रखा है जिसे कि भारतीय बोर्ड घुमा रहा है, वो इस बात से असहमत होगा कि ये एक ऐसा संकट है जो समय का इंतज़ार कर रहा था.

संकट का आकार थोड़ा चौंका सकता है, मगर हार पर कोई हैरानी नहीं हो सकती.

ऐसे लोगों की निराशापूर्ण टिप्पणियों को पढ़ना और देखना लगभग बेतुका है जो इस श्रृंखला के ऐन पहले तक भारतीय क्रिकेट की सेहत और दौलत की प्रशस्ति गा रहे थे और अब एक चैंपियन टीम के पतन पर आँसू बहाए जा रहे हैं.

हममें से वो लोग जो अब भारतीय क्रिकेट के जीर्णोद्धार के लिए एक दस-सूत्री कार्यक्रम सुझा रहे हैं, सरकार की ग़रीबी हटाओ योजना की तरह, उन्हें याद होना चाहिए कि ये वही टीम है जिसने हमें टेस्ट क्रिकेट के शिखर तक पहुँचाया.

भारतीय टीम, कहीं कोई भूल ना जाए, वन डे क्रिकेट की भी विश्व विजेता है, जिसे कि, अगर एक अख़बार के सर्वेक्षण पर नज़र डालें, इस देश के युवा स्वाधीनता के बाद के भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखते हैं.

इस बहस में ना पड़ते हुए, कि हमारे शहरी युवाओं की प्राथमिकताएँ कैसी हैं जिसमें कि एक खेल की उपलब्धि हर उपलब्धि पर भारी पड़ जाती है, गौ़र करनेवाली मुख्य बात ये है कि इतनी ताक़तवर टीम कैसे अचानक इतनी ख़राब हो गई?

थकान

ऐसे लोग जो सुविधानुसार चीज़ों को भुलाते रहते हैं, ये याद दिला दें कि धोनी ने विश्व कप शुरू होने के पहले से ही ये चिंता जताई थी कि भारतीय टीम का अभियान खिलाड़ियों के अत्यधिक क्रिकेट खेलने के कारण होनेवाली थकान से पटरी से उतर सकता है.

सौभाग्य से, ऐसा नहीं हुआ, हालाँकि प्रतियोगिता के दौरान, अधिकतर खिलाड़ियों को चोटें लगीं जिनसे उबरने के लिए उन्हें आराम चाहिए था ताकि वो आगे के खेलों के लिए समय पर फ़िट हो सकें.

और दुःखों का सिलसिला यहाँ से शुरू हुआ. आईपीएल को इस विपदा का मूल नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसका ऐसे समय आयोजन जब सारी टीम को आराम चाहिए था, वो कारण ज़रूर है.

कोई भी सोच-समझ रखनेवाला व्यक्ति, क्या इस बात से असहमत होगा कि धोनियों, तेंदुलकरों, सहवागों और गंभीरों वाली इस टीम को अवसर का लाभ उठाते हुए अपने-आप को दुरूस्त करना चाहिए था ना कि शरीर पर और चोटिल और दिमाग़ को और बोझिल बनाना चाहिए था.

लोभ

पैसे का लोभ और भारतीय बोर्ड का समर्थन, जो कि यदि चाहता तो खिलाड़ी आईपीएल से बाहर रह सकते थे, खिलाड़ियों पर उनके कौशल और देश के लिए उनकी प्रतिबद्धता पर भारी पड़ा.

दुःखद बात ये है कि जो शक्तिशाली स्वर हैं ( पूर्व खिलाड़ी और यहाँ तक कि मीडिया भी ), इस ख़तरनाक प्रभाव की अनदेखी करते रहे जिसका कि भारत के भविष्य पर असर पड़ सकता था.

पैसे का लोभ और फ़ायदे निश्चित तौर पर किसी भी वाजिब चिन्ता से आगे निकल जाता है, ख़ासकर टेस्ट क्रिकेट को लेकर जताई जानेवाली चिन्ता से.

हितों का टकराव, जिसकी शुरूआत स्वयं बोर्ड के सचिव से होती है, अब एक वायरस की तरह फैल चुका है.

यहाँ तक कि वे लोग जो कि खेल से रिटायर कर चुके हैं और जिनका कि बोर्ड के साथ कोई क़रार नहीं है, उनके लिए भी ऐसे समुदाय का हिस्सा बनना भारी कमाई का ज़रिया बन जाता है जिसमें कि वे दो महीने के दौरों के लिए कमेंट्री करते हैं या टीवी और प्रिंट मीडिया के लिए विशेष टिप्पणियाँ देते रहते हैं.

क्या हम एक उत्साही और शक्तिशाली क्रिकेट खेलनेवाला देश, या केवल ऐसा एक देश ही, बने रह सकते हैं, अगर जो टिप्पणियाँ और मत पहुँचाए जाते हैं, वे सब की सब प्रायोजित हों?

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