खेल विधेयक का विरोध आखिर क्यों

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Image caption अजय माकन का कहना है कि खेल मंत्रालय की कोशिश खेल संघों पर नियंत्रण की नहीं है

पूर्व खेल मंत्री एमएस गिल ने जिस खेल विधेयक की नींव रखी वो बिल वर्तमान खेल मंत्री अजय माकन के हाथों मंत्रिमंडल तक पहुंचा और इस बिल पर हर तरफ़ काफ़ी हंगामा हुआ.

दल चाहे कोई भी हो, सभी नेताओं ने मिलकर, एकजुट होकर संसद में इस बिल का विरोध किया.

नेताओं का तर्क-व्यवहार कुछ ऐसा है मानो ये बिल भारत में खेल प्राधिकरणों के रोज़मर्रा कामकाज और उनकी स्वायत्ता पर शिकंजा कसने का काम करेगा.

नेताओं की इस सोच को उन लोगों से सहमति भी मिली जो ये मानते हें कि दुनिया में कोई काम तभी बखूबी हो सकता है जब उस पर जनता के चुने नुमाइंदों की निगरानी न हो.

इन लोगों के लिए लोकतंत्र का मतलब है शक्तिशाली वर्ग के लिए मुनाफ़ा कमाने की पूरी छूट. ये वो लोग हैं जो मानते हैं कि ऊपरी तबका जितने फायदे में होगा उसके नीचले पायदान पर खड़े लोग उतने संतुष्ट रह पाएंगे.

इन लोगों को इस बात से कम ही फर्क पड़ता है कि मनमानी से त्रस्त जनता ने जिस तरह अन्ना हज़ारे का साथ दिया वो देश को तानाशाही की ओर ले जा सकता है.

खेल में आखिर ऐसा क्या है

वो ये समझने में नाकाम हैं कि इससे निपटने का सिर्फ एक ही ज़रिया है कि सत्तारुढ़ वर्ग न सिर्फ लोगों की शिकायतों को सुने बल्कि उन्हें समय रहते हल करने की कोशिशें भी करे.

खेल को आमतौर से गंभीर विषय नहीं माना जाता और मुमकिन है कि समाज की बड़ी-बड़ी समस्याओं से उसे जोड़ना कई लोगों को बेहद अटपटा लगे. लेकिन सच ये है कि खेल भी इसी समाज का एक हिस्सा है और कई मायने में समाज का बेहद सटीक आइना भी.

मसलन जो लोग आज खेल संगठन और अलग-अलग प्राधिकरण संभाल रहे हैं वो सभी या तो पूर्व मंत्री है या विपक्ष के ताक़तवर प्रतिनिधि.

जिस मंत्रिमंडल ने स्पोर्ट्स बिल को खारिज करने का फैसला किया उसके आधे से ज़्यादा सदस्य वही हैं जो खेल प्राधिकरणों को चलाते हैं.

जब वही लोग क़ानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल हों जिन पर कानून लागू होना है तो क्या उनसे न्याय की उम्मीद की जा सकती है.

यही वो हितों का टकराव है जिसके चलते हर उस मामले में बहस बेमानी हो जाती है जहां सही और मज़बूत क़ानून बनाने की बात हो रही हो.

लोग भी ये देखकर हैरान होंगे की खेल में आखिर ऐसा क्या है कि जनता के नुमाइंदे उसे नियंत्रित करने का ताकत अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहते.

असहमती का तर्क नहीं

इसका जवाब खासतौर पर क्रिकेट के मामले में तो जग-ज़ाहिर है.

मुमकिन है कि इस बिल में कुछ ऐसे नियामक हों जिनसे खेल संघ या खेल प्राधिकरणों के कामकाज या उनकी स्वायत्ता पर असर पड़े और उन पर बहस होनी चाहिए.

लेकिन इस बिल को पूरी तरह नकार देना और उम्र की सीमा, आरटीआई जैसे मुद्दों पर असहमती का कोई तर्क नहीं.

केवल वही लोग चीज़ों को छिपाना चाहते हैं जिन्हें अपनी संपत्ती या क्रियाकलापों के सार्वजनिक होने पर भय हो.

आईपीएल के दौरान बीसीसीआई जिस तरह विवादों के घेरे में रहा उसके बाद उसे इस बिल का ज़ोर-शोर से स्वागत करना चाहिए था.

इसके बावजूद अगर बीसीसीआई अपने फैसले को सही मानती है तो फिर एक ही तरीका है.

बीसीसीआई को भारत के नाम पर अपनी टीम मैदान में उतारने का अधिकार नहीं होगा, वो आईपीएल की तरह अपनी टीम का अलग नाम और वजूद रखे.

मुमकिन है कि वो भी अपनी टीम के नाम के लिए बोली लगाकर अरबों रुपए कमा लें, लेकिन देश का नाम इस्तेमाल करने की इजाज़त उन्हें नहीं होगी.

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