क्रिकेट का सियाह मैच-फ़िक्सिंग अंडरवर्ल्ड

मोहम्मद आमिर, मोहम्मद आसिफ़ और सलमान बट्ट इमेज कॉपीरइट
Image caption पाकिस्तान की ये तिकड़ी अब जेल में है.

स्पॉट फ़िक्सिंग षंड़यंत्र में तीन पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों और एक एजेंट को कारावास की सज़ा होने के बाद अब संदेह जताया जा रहा है कि वास्तव में ये घोटाला काफ़ी फैला हुआ हो सकता है.

लंदन की अदालत से मिले संकेतों से पता चलता है कि कई अन्य पाकिस्तानी खिलाड़ी भी इसमें शामिल हो सकते हैं. सोमवार और गुरुवार को हुई अदालती कार्यवाही में कुछ नाम उछाले गए थे.

पाकिस्तानी मीडिया ने गुरुवार को ‘द क्रिकेटर’ पत्रिका में छपी एक ख़बर का उल्लेख किया गया है जिसमें कहा गया था कि स्कॉटलैंड यार्ड ने कुछ मिटाए गए (डिलीट किए गए) संदेश खोजे हैं और उन्हें अदालत में पेश किया गया है.

पत्रिका के अनुसार इन मैसेजिस से पता चला है कि पिछले साल इंग्लैंड-पाकिस्तान श्रृंखला का हर मैच बूकीज़ के निशाने पर था.

तो क्या साल 2010 की गर्मियों में हुई इस सीरिज़ में क्या-कुछ हो रहा था?

किताब से संकेत

इस विषय पर पाकिस्तानी के तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख़्तर की हाल में आई किताब ‘कंट्रोवर्शियली योर्स’ में कुछ संकेत मिलते हैं. शोएब अख़्तर उस टीम का हिस्सा थे.

शोएब अख़्तर ने इस पुस्तक में लिखा है, "मैं चाहता था कि हमारी टीम अच्छे से खेले, विशेष तौर पर विश्व कप की तैयारी के लिए. लेकिन मैं हतोत्साहित होने से बचने के लिए संघर्ष कर रहा था. मैं युवा खिलाड़ियों का मार्गदर्शक बनना चाहता था लेकिन अब मैं नहीं जानता कि किस पर विश्वास करुँ."

शोएब अख़्तर ने लिखा है कि लॉर्ड्स के मैदान पर हुए एक वनडे मैन के दौरान इंग्लैंड के पॉल कॉलिंगवुड ने उन्हें बताया कि कुछ पाकिस्तानी खिलाड़ी मैच-फ़िक्सिंग में शामिल हैं.

अख़्तर ने लिखा है, "मैंने बार-बार पूछा, कौन हैं? वो साफ़ तौर पर निराश थे...उन्होंने दावा किया कि मैं बिल्कुल अंधा हूं."

अख़्तर अपनी पुस्तक में आगे लिखते हैं कि अभ्यास के दौरान जोनाथन ट्रोट ने वहाब रियाज़ को फ़िक्सर कहा और वे दुख भरी निगाहों से देखते रहे.

‘मैच-फ़िक्सर’

पाकिस्तान में कई लोगों का मानना है कि पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी बार-बार फ़िक्सरों के जाल में इसलिए फंसते हैं क्योंकि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड इस बीमारी को जड़ में उखाड़ने में असफल रहा है.

पूर्व पाकिस्तानी ओपनर आमिर सुहैल ने बीबीसी को बताया, "हमने पहले भी ऐसे मामले देखे हैं...लेकिन अब ये दोबारा हो रहा है. अगर हम इस बारे में कुछ नहीं करते हैं तो मुझे डर है कि ये भविष्य में भी होता रहेगा."

पाकिस्तानी पत्रकार शमीमुर रहमान का मैच फ़िक्सिंग से पहला सामना 1990 के दशक में हुआ था, जब वे पाकिस्तानी टीम के साथ दक्षिण अफ़्रीका में थे.

शमीमुर रहमान कहते हैं, "एक व्यक्ति ने मुझे भारत से फ़ोन किया. उसने कहीं से मेरा नंबर लिया और वो मैच से पहले वहां के मौसम के बारे में जानना चाहता था."

पाकिस्तान के डॉन अख़बार के खेल संपादक रिशाद मेहमूद कहते हैं कि अब बूकीज़ साधारण जुआरियों से मैच-फ़िक्सर बन गए हैं.

रिशाद मेहमूद कहते हैं, "1980 और 1990 के दशक में इन लोगों ने खिलाड़ियों और पत्रकारों से संपर्क साधा और एक ऐसी स्थिति में पहुंच गए कि वो खिलाड़ियों का प्रदर्शन प्रभावित करने के लिए उन्हें बड़ी रक़म देने लगे. वर्ष 1990 के मध्य तक आते-आते ऐसी स्थिति आ गई थी कि दुनिया की कई टीमें मैच-फ़िक्सिंग माफ़िया की सदस्य बन गई थीं."

रिशाद मेहमूद कहते हैं कि भारत और दक्षिण अफ़्रीका के क्रिकेट प्रशासकों ने इस विषय पर क़दम उठाते हुए कुछ खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की लेकिन पाकिस्तान इस मामले में सुस्त ही रहा.

नवंबर 2010 में पाकिस्तान के एक उभरते खिलाड़ी ज़ुलक़रनैन हैदर दुबई से टीम को बीच में ही छोड़कर इंग्लैंड पहुंच गए थे. उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ श्रृंखला में मैच फ़िक्स करने के लिए धमकी दी जा रही है.

बाद में उन्होंने पाकिस्तानी टीम के एक मशहूर खिलाड़ी के नज़दीकी रिश्तेदार पर बूकीज़ से मिलीभगत का आरोप लगाया था. लेकिन ये आरोप ख़ारिज कर दिया गया था.

कुछ जानकारों का कहना है कि पाकिस्तानी खिलाड़ी ऐसे लालच में इसलिए फंस जाते हैं क्योंकि उन्हें स्पांसरशिप या आईपीएल जैसी किसी अमीर क्रिकेट लीग से पैसे कमाने का अवसर नहीं मिलता.

‘ख़राब प्रदर्शन के लिए पैसा’

लेकिन पाकिस्तान में कई लोगों का मानना है कि मैच-फ़िक्सिंग कई खिलाड़ियों का पारिवारिक पेशा बन गया है.

साल 2000 में पाकिस्तान के युवा गेंदबाज़ अता-उर-रहमान ने न्यायिक जांच के समक्ष एक लिखित शपथपत्र दायर कर, तीन बड़े खिलाड़ियों पर उन्हें न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध एक मैच में ख़राब प्रदर्शन करने के बदले पैसे देने की पेशकश का आरोप लगाया था.

हलफ़नामें में लिखा था कि उन्हें तीन ओवरों के दौरान कमज़ोर गेंदबाज़ी करने के बदले तीन लाख पाकिस्तानी रुपयों की पेशकश की गई थी.

अता-उर-रहमान ने आरोप लगाया था कि उन्हें ये राशि दे दी गई थी और बाद में अगले मैच में फिर उनसे कमज़रो गेंदबाज़ी करने को कहा गया था. उनका कहना है कि उन्होंने ऐसा नहीं किया, जिसपर टीम के एक वरिष्ठ खिलाड़ी ने उनसे मारपीट की.

बाद में अता-उर-रहमान अपने बयान से पलट गए थे लेकिन कुछ हफ़्ते बाद वो फिर से जांच समिति के सामने पेश हुए और अपने पुराने हफ़लनामे को सही बताया.

अता-उर-रहमान ने कहा कि वो इसलिए बयान से पलट गए थे क्योंकि इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेल रहे उनके भाई ग़ायब हो गए थे और किसी ने उन्हें फ़ोन करके कहा था कि वो अगर बयान से नहीं पलटते हैं तो उनके भाई को नुक़सान पहुंचाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि अब उनके भाई सुरक्षित मिल गए हैं.

डॉन अख़बार के खेल संपादक रिशाद मेहमूद को भी इसी न्यायिक जांच समिति के समक्ष बुलाया गया था.

रिशाद मेहमूद उस समय द न्यूज़ अख़बार के लिए काम करते थे. जांच समिति ने उनसे पूछा कि कैसे बांग्लादेश के ख़िलाफ़ मैच से 20 दिन पहले ही उनके अख़बार ने ये रिपोर्ट कैसे छाप दी थी कि पाकिस्तान हार जाएगा.

पाकिस्तान सही में बांग्लादेश से हार गया था, और इस जीत के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल ने बांग्लादेश को टेस्ट मैचों में खेलने का अधिकार दे दिया था.

रिशाद मेहमूद इस विषय में अधिक जानकारी तो नहीं देना चाहते लेकिन आरोप लगाते हैं कि पाकिस्तान टीम का ये और कई अन्य फ़ैसले वरिष्ठ खिलाड़ियों की एक बैठक में लिए गए थे.

रिशाद मेहमूद कहते हैं, "शोएब अख़्तर और शाहिद अफ़रीदी जैसे जूनियर खिलाड़ी बाहर बैठे थे और अंडरवर्ल्ड के एक जाने-माने सरगना का नुमाइंदा अंदर बैठक में शामिल था."

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