प्रस्तावित खेल विधेयक को खिलाड़ियों का समर्थन

  • 11 नवंबर 2011
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Image caption इन खिलाड़ियों का कहना है कि खेल संघों के प्रशासकीय इकाईयों में 25 फ़ीसदी खिलाड़ी हों.

भारत के प्रस्तावित खेल विधेयक 2011 का कई नामी खिलाड़ियों ने समर्थन किया है.

दिल्ली में एक चर्चा के दौरान इन खिलाड़ियों ने खेल विधेयक के स्वरूप और खेल के प्रशासन में खिलाड़ियों के योगदान पर अपनी राय रखी.

चर्चा में कपिल देव, प्रकाश पादुकोण, अश्विनी नचप्पा, राज्यवर्धन राठौर, अभिनव बिंद्रा और बाइचुंग भूटिया जैसे खिलाड़ी शामिल हुए. खेल मंत्रालय की ओर से पेश राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक में संशोधन के बावजूद कुछ खेल संघ जैसे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई और भारतीय ओलंपिक संघ इसका विरोध कर रहे हैं.

बैठक में खिलाड़ियों ने मौजूदा खेल विधेयक के स्वरूप को पूरा समर्थन दिया और कहा कि खेल संघों की प्रशासकीय इकाइयों में खिलाड़ियों का एक चौथा हिस्सा होना ज़रूरी है.

बैठक के बाद निशानेबाज़ राज्यवर्धन राठौर ने कहा, "जिन खिलाड़ियों ने खेल में योगदान दिया है, प्रशासन में उनकी भी भूमिका होनी चाहिए. अभी बात खेल संघों में खिलाड़ियों के 25 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की हो रही है. इसके बाद भी तीन चौथाई हिस्सा तो खेल संघ के प्रशासकों के पास ही रहेगा."

क्रिकेट संघ भी बने ज़िम्मेदार

खेल विधेयक में क्रिकेट को लेकर काफ़ी विवाद रहा है. क्रिकेट को सूचना के अधिकार के अंदर लाने पर भी बहस छिडी़ हुई है.

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान कपिल देव का कहना है कि क्रिकेट बोर्ड को भी ज़िम्मेदार बनना पड़ेगा और अगर सारे संघ इसे अपना रहे हैं तो फिर बीसीसीआई को आपत्ति क्यों है.

कपिल देव ने कहा, "मैं बीसीसीआई के ख़िलाफ़ नहीं हूं लेकिन बीसीसीआई को अपना काम करने दो और सरकार को अपना. अगर बीसीसीआई भी अपने फ़ैसलों के लिए ज़िम्मेदार बन सके तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है. लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो ये नहीं चाहते हैं."

बीसीसीआई ने कहा है कि उसे सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती इसलिए वह इस विधेयक के ख़िलाफ़ है. बोर्ड ने क्रिकेट को सूचना अधिकार के अंदर लाने की बात का भी विरोध किया है.

वहीं इन खिलाड़ियों का कहना है कि खेल विधेयक 66 खेलों को लिए है और इसे सिर्फ़ बीसीसीआई या भारतीय ओलंपिक संघ के इशारों पर नहीं बनाना चाहिए.

मामला

भारत में खेल की प्रशासकीय संस्थाओं में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लाए जा रहे नए खेल विधेयक को मंत्रिमंडल से स्वीकृति नहीं मिली थी.

इसमें खेल मंत्रालय ने दुनिया के सबसे बड़े बोर्ड बीसीसीआई पर भी लगाम कसने की तैयारी की थी. इसके बाद खेल मंत्री अजय माकन को विधेयक फिर से तैयार करने के लिए कहा गया था.

इस विधेयक का विरोध करने वालों का तर्क है कि इससे खेल संगठनों की स्वायत्तता प्रभावित होगी जबकि खेल मंत्रालय का कहना है कि इसके ज़रिए वह खेल संगठनों में पारदर्शिता लाने की कोशिश कर रहा है.

इस विधेयक के ज़रिए ये कोशिश की गई है कि खेल संस्थाओं के प्रशासक 70 साल की आयु से ज़्यादा समय तक पद पर न रहे और न ही उनका कार्यकाल दो बार से ज़्यादा का हो.

बाद में खेल मंत्री ने इस प्रस्तावित बिल में संशोधन किए थे जिनमें सभी खेल संघों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे में रखने की बात को बरक़रार रखा गया है. लेकिन खिलाड़ियों की सेहत और चयन संबंधित सूचनाएं आरटीआई के दायरे से बाहर रखा गया था.

यह विधेयक संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सकता है.

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