'क्रिकेट खेलना और कप्तानी करना अलग'

  • 25 नवंबर 2011
सचिन इमेज कॉपीरइट AP

सचिन की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि उन्होंने अपने करियर में दुनिया के हर हिस्से, हर देश और हर बड़े गेंदबाज़ के ख़िलाफ़ खेलकर अपनी कामयाबी का परचम लहराया है और नए-नए कीर्तिमान क़ायम किए.

सचिन ने खेल प्रेमियों को अपने करियर के दौरान बेहतरीन पारियों के अनेक तोहफ़े दिए हैं. जहाँ 18 साल की उम्र में पर्थ के मैदान पर यादगार पारी खेली तो वहीं बाद में शारजाह में बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया.

भारत में कप्तानी को लेकर जो राय है उससे मैं सहमत नहीं हूँ. यहाँ ये ग़लत समझ है कि एक अच्छे खिलाड़ी को एक अच्छा कप्तान भी होना चाहिए. लेकिन वो समझ नहीं पाते कि क्रिकेट खेलना और कप्तानी करना दो अलग-अलग चीज़ें हैं और दोनों के लिए अलग-अलग योग्यताओं की आवश्यकता होती है.

इस संबंध में हमारे सामने अनेक उदाहरण हैं कि कई अच्छे खिलाड़ी अच्छे कप्तान हुए हैं और कई अच्छे खिलाड़ी ख़राब कप्तान भी हुए हैं.

कप्तानी में कमी

मैं समझता हूँ कि इसके कई कारण हो सकते हैं, शायद एक अच्छा खिलाड़ी अपने से कमतर खिलाड़ी को समझ नहीं पाता है या उसे कप्तानी में मज़ा नहीं आता, या उनकी बल्लेबाज़ी पर इसका असर पड़ता हो.

जहाँ तक सचिन की कप्तानी का सवाल है तो मैं यह अवश्य समझता हूँ कि वो अपने करियर में अगर पीछे मुड़कर देखें और ख़ुद से सवाल करें कि आख़िर कौन चीज़ रही जिसे वो और अच्छा कर सकते थे तो वो होगी कप्तानी.

जहाँ तक 'सचिन के बाद कौन' का सवाल है तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि सचिन एक महान खिलाड़ी हैं और उनसे पहले भी महान खिलाड़ी हुए हैं और आने वाले दिनों में भी आएँगे. गावस्कर और कपिल देव के बाद भी क्रिकेट भारत में ज़िंदा है.

मेरा मानना है कि इस समय हमारा केंद्र बिंदु ये होना चाहिए कि सचिन कई वर्षों से खेल का जो मज़ा दे रहे हैं उसे पूरे तौर पर लिया जाए. ये नहीं सोचना चाहिए कि आगे क्या होगा.

यह तय है कि सचिन के जाने के बाद कोई और खिलाड़ी आएगा, हो सकता है कि फ़िलहाल उस स्तर का कोई खिलाड़ी नहीं आए लेकिन खेल तो यूँ ही चलता रहेगा.

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