कंगारू, क्रिकेट और कुंठा!

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Image caption पहला मैच जीतने पर ऑस्ट्रेलिया के ऊपर से मनोवैज्ञानिक दबाव अब हट जाएगा.

जाड़ों में क्रिकेट का मज़ा कुछ और ही है. रज़ाई में बैठ कर ऑस्ट्रेलिया में खेली जा रही टेस्ट श्रंखला का भरपूर मनोरंजन.

लेकिन मनोरंजन किसका? ज़ाहिर है, जीतने वाली टीम के प्रशंसकों का.

या कुछ एक क्रिकेट प्रेमियों का जो खेल के लिहाज़ से हर मैच पर पैनी निगाह रखते हैं, हर अच्छे शॉट और अच्छी गेंद की सराहना अगले दिन तक करते हैं.

लेकिन उनका क्या जिनकी टीम बुरी तरह पिट गई हो?

भारतीय क्रिकेट टीम को ही ले लीजिए. साल 2011 में कहा जा रहा था कि विश्व कप विजेता भारतीय टीम इंग्लैंड के दौरे पर टेस्ट क्रिकेट में भी अपना वर्चस्व कायम कर के लौटेगी.

हुआ क्या. चार टेस्ट मैचों वाली श्रंखला में इंग्लैंड की टीम ने भारतीय सूरमा टीम को 4-0 से पटखनी दे डाली.

उस दौरे पर न तो सचिन का सौंवा शतक पूरा हो सका और न ही किसी दिग्गज बल्लेबाज़ का बल्ला चल सका.

टीम के खिलाड़ियों के हिस्से जो हाथ आया वो थी निराशा, चोटें और और ख़राब फ़ॉर्म.

मौका था भी या नहीं?

साल के अंत में 'मेन इन ब्ल्यू' के पास एक मौका था उस दाग को मिटा देने का. ऑस्ट्रेलिया में होने वाली थी टेस्ट श्रंखला.

एक ऐसी टीम के विरुद्ध जो मक्ग्रा, वार्न और हेडेन जैसे अपने पुराने महान खिलाड़ियों के बाद दोबारा एकजुट होने की कोशिश में है.

पहले टेस्ट मैच का माहौल बन चुका था. पहला दिन एक टीम के नाम तो दूसरा दिन दूसरी टीम के नाम. दोनों ही टीमों ने बढ़त हासिल करने के बाद गँवा भी दी.

आख़िरकार मैच पर अपनी मुहर लगाने के लिए भारतीय टीम की बल्लेबाज़ी आती है.

लक्ष्य है 292 रन. पूरा करने के लिए समय है भरपूर.

दिग्गजों का रेला

बल्लेबाज़ी करने के लिए कौन-कौन क्रीज़ पर पहुंचेगा, सुनकर दुनिया की किसी भी विपक्षी टीम के रोंगटे खड़े हो जाएं!

सचिन तेंदुलकर, वीरेंदर सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण, राहुल द्रविड़, फ़लाना कोहली, ढिमाका गंभीर और न जाने कौन-कौन.

हश्र...भारतीय टीम 200 रन तक भी नहीं पहुँच पाती है.

राहुल द्रविड़ मैच में ऐसे बोल्ड होते रहे जैसे की कोई नया खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना पहला सीज़न खेल रहा हो.

गौतम गंभीर को देख कर लगा जैसे इंग्लैंड के दौरे तक ले गए अपनी चोट का भार उन पर अब भी भारी है.

वीवीएस लक्ष्मण को टीम प्रबंधन के ज़रिए ये बताया जाना चाहिए कि पाँच में से एक पारी में सैकड़ा या बड़ा स्कोर बना डालने से टीम श्रंखला नहीं जीत सकेगी.

सचिन तेंदुलकर को शायद अपने ज़हन से कुछ मैचों के लिए यह ख़याल बाहर निकाल फेंकना चाहिए कि वे अपने सौंवे शतक की दहलीज़ पर हैं.

'कैप्टन कूल' धोनी के लिए बेहतर यही रहेगा कि वे दोबारा रनों से दो-चार हों लें. कहीं ऐसा न हो कि उन्हें अपनी टीम चुनने के अलावा टीम में अपने स्थान पर भी श़क पैदा होने लगे.

विराट कोहली को कोई जाकर यह याद ज़रूर दिला दे कि रोहित शर्मा अपने बेहतरीन फ़ॉर्म को लिए हुए बस टीम में दोबारा जगह पाने को बेक़रार बैठे हैं.

गेंदबाजों को लेकर तो ख़ासा रोष नहीं दिख रहा है. कम से कम पहले मैच के बाद की कहानी तो यही है.

और कुछ नहीं तो भारतीय टीम को अपने लाखों-करोड़ों प्रशंसकों के बारे में तो सोच भर लेना चाहिए. नहीं तो हाल मेरे जैसा ही होगा.

गुरुवार सुबह जब अपने जिम (व्यायामशाला) पहुंचा तो लोगबाग जुटे हुए एक दूसरे का मुह बाए सिर्फ़ टीवी पर चल रहे मैच को निहार रहे थे.

बिखरती हुई भारतीय बल्लेबाज़ी को देखकर उनके पास आखि़र कहने को होता भी तो क्या होता!

आख़िरकार अभी तक ऑस्ट्रेलिया में एक भी टेस्ट श्रंखला जो नहीं जीत सकी है टीम इंडिया.

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