इन्हीं में से फिर उभरेंगे सचिन और द्रविड़

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Image caption पिछले साल भारतीय क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीता लेकिन विश्व विजेता के रूप में गुज़रा साल निराशाजनक रहा

गुजरे एक साल की तरफ़ मुड़ कर देखूं तो लगता है भारतीय क्रिकेट टीम ने जो उम्मीदें जगाईं वो कतई पूरी नही हुईं.

व्यक्तिगत तौर पर मुझे विश्व कप 2011 की जीत के बाद लगा था कि ये विश्व विजेता टीम अब जहां जाएगी दबदबा कायम करेगी, जीत कर ही लौटेगी लेकिन उम्मीदें टूट गईं.

शायद भारतीय टीम को लगा कि इस जीत के रथ पर सवार होकर सब कुछ आसानी से हो जाएगा, लेकिन वो ये भूल गई कि जो चीज ऊपर जाती है वो नीचे तो आती ही है. ऊंचाई पर जाकर वहां टिके रहने के लिए मेहनत करनी पड़ती है.

मैं इसे एक मानसिकता के तौर पर लेता हूं एक विचार कि जो जैसा है वैसा ही चलता रहेगा.अगर अच्छा है तो अच्छा ही रहेगा लेकिन ज़िंदगी औऱ क्रिकेट दोनों में यही समानता है कि दोनो में कुछ भी स्थायी नहीं है.

क्या हुआ कप्तान साहब

यकीनन भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के जिस जादुई असर की बात कही जाती थी वो असर कम हो चुका है.

मेरे ख्याल से अगर आप वक्त की जरूरत के हिसाब से ढलते नही हैं, अपनी जगह पर अड़े रहते हैं तो उसका खामियाजा भुगतना ही होगा.

आप जिस टीम के साथ इंग्लैंड में हारे, लगभग उसी टीम को लेकर ऑस्ट्रेलिया औऱ फिर एशिया कप जाते हैं तो किस नए नतीजे की उम्मीद की जाए.

एक सीमा के बाद बदलाव जरूरत बन जाता है. कुछ कड़े निर्णय लेने की आवश्यकता होती है.

हो सकता है ये फैसले सबको खुश ना कर पाएं लेकिन इससे उनकी प्रासंगिकता कम नहीं होती. शायद महेन्द्र सिंह धोनी को भी कुछ ऐसे ही फैसले करने चाहिए थे जो उन्होने नहीं किए.इसी वजह से उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी.

भारतीय क्रिकेट का भविष्य

भले ही भारतीय टीम का ये साल निराशाजनक रहा लेकिन मैं बहुत विश्वास के साथ कह सकता हूं कि क्रिकेट के भविष्य को कोई खतरा नहीं है.

नाउम्मीदी के बीच विराट कोहली, उमेश यादव जैसे युवा चेहरे उभर कर आए हैं और भारतीय क्रिकेट के बेहतर भविष्य की उम्मीद बन गए हैं.

मुझे लगता है शायद इन्ही युवाओं में से कोई नया सचिन, नया द्रविड़ और नया लक्ष्मण उभर कर सामने आएगा.

मैं तो यहां तक कहूंगा कि अगर इनमें से नहीं तो कुछ और नए नाम आएंगे तो भारतीय क्रिकेट के भविष्य को लेकर चिंता करने की जरूरत बिल्कुल नहीं है.

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