वो बेचती दारू.....

Image caption हॉकी खिलाड़ी नोरी मुंडू आज अपने घर पर शराब बेचकर रोजी चलाती है

जहां लंदन ओलंपिक को लेकर विश्वभर के खिलाड़ी उत्साहित हैं, वहीं झारखंड में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाडी आज भी उदासीनता का दंश झेल रहे हैं.

यह बात कई बार उभर कर सामने आई, जब झारखंड के रहने वाले खिलाड़ी जीविका के लिए सब्जी बेच कर पेट पालते नजर आए. एक और मामला अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज़ नीशा रानी का है, जिन्हें ग़रीबी की वजह से अपना तीर-धनुष ही बेच डालना पड़ा.

लेकिन झारखंड में खिलाड़ियों के खस्ता हाल के नए किस्से आज भी सुनने मिल रहे हैं. ऐसी ही एक हॉकी खिलाड़ी हैं नोरी मुंडू जो आज घर में शराब चुलाई कर अपना और अपने घर वालों का पेट पालने पर मजबूर हैं.

रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर खूंटी जिले के माही गांव में रहने वाली नोरी अब टूट चुकी हैं. राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी में अपना लोहा मनवाने वाली नोरी को जिंदगी में अगर कुछ हाथ लगा तो वह है निराशा.

नोरी

खेल में जीते गए मेडल और सर्टिफिकेट अब नोरी के किसी काम के नहीं. इन्हें देखने वाला और सरहाने वाला तक अब कोई नहीं.

अब शराब बेचना उसकी मजबूरी है क्योंकि उसे पता है कि अब उसे कोई नौकरी नहीं मिल सकती है. नोरी एयर इंडिया के लिए 2006 तक खेलीं. लेकिन वह अनुबंध पर थी. बाद में एयर इंडिया की महिला हॉकी की टीम का विघटन हो गया और नोरी मुंडू वापस अपने गांव लौट आई.

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Image caption कोच कहते हैं कि कम प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को नौकरियां मिल जाती है लेकिन नोरी बेरोजगार है

बीबीसी से बात करते हुए नोरी उस एक दशक की तरफ मुड़ कर देखतीं हैं, जो उन्होंने खेल में बिताया.

वह कहती हैं, "पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो मन और छोटा हो जाता है. जब मैं खेल रही थी तो कहा गया कि सरकारी नौकरी मिलेगी. कई विभागों में आवेदन दिए. पुलिस विभाग में भी आवेदन दिया. मगर कहीं कुछ नहीं हुआ. अब मैं थक गई हूँ. मेरा जो लक्ष्य था वह पूरा नहीं हुआ."

नोरी जब खेलती थी तो उनकी छोटी बहन उनका खर्च उठाया करती थी. अब वापस गांव लौटकर बिना मां बाप की बच्ची नोरी देसी शराब बेचकर गुज़ारा कर रही है.

वह मानती हैं उन्हें बुरा ज़रूर लगता है जब लोग उनके घर शराब पीने आते हैं. लेकिन वह कहती हैं, "यह मेरी किस्मत है. मैंने खेल में कभी हार नहीं मानी. लेकिन जिंदगी के खेल में मेरी हार हो गई."

नोरी के प्रशिक्षक दसरथ महतो एक सरकारी शिक्षक हैं. वह कहते हैं कि उन्हें भी अफ़सोस है कि इतना अच्छा खेलते रहने के बावजूद नोरी को हॉकी नें कुछ नहीं दिया जबकि कम नाम कमाने वाले दूसरे खेल के खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी भी मिल जाती है और इज्जत भी.

फरजाना

नोरी की तरह तो नहीं मगर कुछ उसी उदासीनता का शिकार झारखंड की एक और खिलाड़ी हैं फरजाना जिन्होंने अंतर राष्ट्रीय स्तर पर लॉन बॉल में अपना लोहा विश्व में मनवाया है.

फरजाना ने 2007 से लॉन बॉल खेलना शुरू किया. पहले झारखंड के लिए और जल्द ही उन्होंने राष्ट्रीय लॉन बॉल टीम में अपनी जगह बना ली.

राष्ट्रीय खेलों में अच्छे प्रदर्शन के अलावा, फरजाना ने 2010 में हुए राष्ट्रकुल खेलों में भी अच्छा प्रदर्शन किया. उसी वर्ष उन्होंने नें विश्व कप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया.

इससे पहले 2009 में मलेशिया में हुई एशियाई प्रतियोगिता में उन्होंने कांस्य पदक जीता और चीन में हुए एशियाई खेलों में उन्होंने स्वर्ण जीतकर सबको चौंका दिया. इस वर्ष अप्रैल माह को कुआलालम्पुर में हुई प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए लॉन बॉल की टीम ने कांस्य पदक जीता.

फरजाना के साथ भी वही समस्या है. इतने साल खेलते हुए हुए आजतक उन्हें झारखंड की सरकार की तरफ से कोई नौकरी नहीं दी गई है. धनबाद की रहने वाली फरजाना के पिता नहीं हैं और वह रांची में अपने दूर के रिश्तेदार के यहाँ रहकर लॉन बॉल का अभ्यास करती है.

लेकिन उनका कहना है कि यह सब कुछ ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायेगा क्योंकि अपने परिवार के लोगों की देखभाल करने के लिए उन्हें एक रोजगार की जरूरत है.

फरजाना का कहना है, "पदक जीतने के बाद कुछ पैसे भारत सरकार से मिले. कुछ राज्य सरकार ने दिया. लेकिन यह पैसे मैंने अपने घर की मरम्मत में खर्च कर दिए. अब मैं जिंदगी भर तो नहीं खेल सकती. यह वक्त आ गया है जब मैं किसी नौकरी को पकड़ लूं. लेकिन मुझे नौकरी देगा कौन?"

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Image caption फरजाना के मेडल भी उसे नौकरी नहीं दिला सके

फरजाना के दूर के चाचा इकबाल खान भी कहते हैं कि अगर सरकार का खिलाड़ियों के प्रति ऐसा ही उदासीन रवैया रहा तो गरीब घर के बच्चे कभी खेल में रुचि नहीं लेंगे और खेलना सिर्फ बड़े घर के लोगों की शान बनकर रह जाएगा.

इस मामले पर झारखंड ओलंपिक संघ के सचिव सैयद मतलूब हाशमी से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने अपने आपको व्यस्त बताया.

बहरहाल खिलाड़ियों की उदासीनता के बारे में पूछे जाने पर उनका कहना था कि झारखंड की सरकार जल्द ही अपनी खेल नीति की घोषणा करने वाली है जिसके तहत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को सरकारी नौकरियों में तरजीह दिए जाने की बात कही गई है. लेकिन वह यह नहीं कह पाए कि यह सब कुछ कब तक शुरू हो जाएगा.

अगर सरकार खिलाड़ियों के लिए नीति भी बनती है तो इससे फरजाना जैसे कुछ खिलाड़ियों का भला तो जरूर होगा. मगर जहाँ तक बात नोरी मुंडू की है तो इसपर यह पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं- मसीहा मेरे तूने बीमारे गम की दवा लाते लाते बहुत देर कर दी.

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