बांग्लादेश की उम्मीदें शरमीन अख्तर पर टिकी...

  • 13 जून 2012
Image caption शरमीन अख्तर को आठ साल पहले निशानेबाज़ी का शौक चढ़ा था

बांग्लादेश की महिला निशानेबाज़ शरमीन अखतर रत्ना लॉर्ड रॉबर्ट्स सेंटर के इंडोर शूटिंग रेंज में अपने बांगलादेशी कोच के साथ अभ्यास करने में जुटी हैं. उनकी पैनी नज़र सामने निशाने पर टिकी हैं.

शरमीन का दिन सुबह 8.30 बजे शुरु होता है और शाम पांच बजे तक स्टेडियम में वे कड़ी मेहनत करती हैं.

ढाका से जुड़े सावार क्षेत्र में उनका घर है और गत अप्रैल से ही वे अपने परिवार से दूर रह रही हैं.

परिवार की याद सताती है, लेकिन फिलहाल वे अपने लक्ष्य से चूकना नहीं चाहती.

बांग्लादेश के लिए पहला ओलंपिक मेडल जीत कर लाना शरमीन का सपना है.

लेकिन उनका कहना है कि चीज़ें योजना के मुताबिक नहीं हो रही हैं.

शरमीन रत्ना कहती हैं, “दरअसल पहले मैंने सोचा था कि हमें कोई अंतरराष्ट्रीय कोच मिलेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मैं अपने बांग्लादेशी कोच के साथ ही अभ्यास कर रही हूं. हालांकि ट्रेनिंग ठीक ही चल रही है, लेकिन बाहरी देश के कोच से हमें ज़्यादा फायदा हुआ है. और फिर मुझे अभ्यास के लिए ज़्यादा वक्त भी नहीं मिल पाया. हमने काफी देर बाद शुरुआत की.”

सुधार की कोशिश

बांग्लादेश ओलंपिक समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कर्नल वलीउल्ला ने बीबीसी को बताया कि वे बिसले अंतरराष्ट्रीय शूटिंग रेंज के ही किसी कोच को नियुक्त करना चाहते थे, लेकिन इतने कम समय के लिए कोई भी कोच इस काम के लिए राज़ी नहीं हुआ.

शरमीन के बांग्लादेशी कोच शोएब उज़ ज़मान का कहना है कि वे उपलब्ध तकनीक का बेहतर इस्तेमाल कर रहे हैं और शरमीन का सपना साकार करने के लिए उसे अच्छी ट्रेनिंग भी दे रहे हैं.

उनका कहना है, “ओलंपिक खेलों में दुनिया के बेहतरीन निशानेबाज़ हिस्सा लेंगें. इनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने 400 प्वाइंट्स का स्कोर आसानी से पा लिया है. शरमीन तो अभी ऐसे स्कोर के करीब नहीं पहुंच पाई है. वो 396 या 397 तक ही पहुंच पाई है. अगर हम ये स्कोर दो प्वाइंट्स से भी बढ़ा पाएं, तो फाइनल में पहुंचने की अच्छी उम्मीद है. ये पहली बार है कि एक बांग्लादेशी प्रतियोगी को किसी दूसरे देश में इतनी बड़ी ट्रेनिंग का मौका मिला है.”

10 मीटर एयर राइफल श्रेणी में फिलहाल शरमीन दक्षिण एशियाई चैंपियन हैं. दिल्ली में 2010 में आयोजित हुए राष्ट्रमंडल खेलों में इन्हें स्वर्ण पदक मिला था.

उम्मीदें

शरमीन को निशानेबाज़ी का शौक आठ साल पहले लगा था.

शरमीन कहती हैं, “जब मैं सावार कैंटोनमेंट पब्लिक स्कूल में एक छात्रा थी, तब वहां सेना का एक शूटिंग क्लब था. 16 साल से कम की श्रेणी में उन्हें कुछ छात्रों की तलाश थी, और इसी तरह शूटिंग मेरा शौक बन गया. मेरी मां मुझ पर गुस्सा करती थीं, लेकिन पापा ने हमेशा साथ दिया. लेकिन अब मां भी मेरा खूब साथ देती हैं और जब भी मैं परेशान होती हूं तो मुझे सलाह भी देती हैं.”

जब अप्रैल के महीने में दुनिया भर के निशानेबाज़ लंदन में इकट्ठे हुए तो उस समय वहां काफी ठंड थी. शुरु में शरमीन को दिक्कत हुई थी, लेकिन अब उन्होंने खुद को इस वातावरण में बखूबी ढाल लिया है.

शरमीन रत्ना कहती हैं, “जब आप किसी प्रतियोगिता में जाते हैं और वहां का मौसम आपको नहीं भाता, तो निशानेबाज़ी में ध्यान केंद्रित करने में बहुत दिक्कत होती है. लेकिन अब मैंने खुद को ढाल लिया है. हां अंतरराष्ट्रीय कोच न मिल पाने का दुख ज़रूर है, लेकिन मैं फोकस करने की पूरी कोशिश कर रही हूं.”

ये पहली बार है जब बांग्लादेश एक अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में लंबे अभ्यास के लिए एक खिलाड़ी पर इतना निवेश कर रहा है.

बांग्लादेश सन 1984 से ओलंपिक खेलों में भाग लेता आ रहा है, लेकिन अब तक कोई मेडल इस देश के हाथ नहीं लगा है.

लेकिन इस बार शरमीन अख़्तर रत्ना जैसे खिलाड़ियों से उम्मीदें बहुत सी हैं...

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