कल्पना, करनाल के लिए सुमित चाहें मेडल

  • 17 जुलाई 2012
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Image caption कल्पना चावला की तरह बड़ा नाम बनना चाहते हैं हरियाणा के बॉक्सर सुमित सांगवान

सुमित सांगवान का स्कूल करनाल में टैगोर पब्लिक स्कूल के ठीक सामने है. भारतीय मूल की अमरीकी अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के कारण यह स्कूल भारत के अखबारों की सुर्खियां बना था.

छह फुट दो इंच लंबे सुमित ने ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया तो एक अखबार की खबर का शीर्षक था, ‘कल्पना चावला के बाद सुमित ने किया करनाल का नाम ऊँचा.’

सुमित के लिए यह बड़ा सम्मान था. लेकिन सुमित लंदन ओलंपिक में कोई पदक जीत कर कल्पना चावला की तरह नाम कमा इस सम्मान के साथ न्याय करने की तमन्ना रखते हैं.

नाम की ख्वाहिश

बीबीसी के साथ बातचीत में सुमित ने कहा, “मेरे मन में यह रहता है कि करनाल में कल्पना चावला का इतना नाम है. मेरा मन भी करता है कि लोग कहें कि सुमित सांगवान करनाल से हैं.”

कजाकिस्तान के शहर अस्ताना में क्वॉलीफाई टूर्नामेंट में 81 किलोग्राम भार वर्ग का गोल्ड मेडल जीतने के कारण खबरों में आए सुमित के कारण अब करनाल स्टेडियम में भविष्य के बॉक्सरों की भीड़ जुटने लगी है.

19 साल के सुमित बताते हैं, “मेडल मिलने के बाद गांव और शहर के लोग मेरा नाम जानने लगे हैं. अब करनाल स्टेडियम में बॉक्सिंग सीखने वालों की संख्या भी बढ़ी है. गांव से माता-पिता अपने बच्चों को स्टेडियम ले कर जा रहे हैं. स्थानीय कोचों की नजर में भी हालात बदल गए हैं.”

कोई वादा, दावा नहीं

लंदन ओलंपिक में अपनी संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर सुमित ने कोई वादा या दावा करने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन कहा कि अच्छे परिणाम की संभावना काफी मजबूत है.

सुमित ने कहा, “भारतीय टीम में हम चार काफी युवा बॉक्सर हैं. इसलिए टीम के अच्छा करने की उम्मीद है. मेरी अपनी तैयारियां भी काफी अच्छी हैं. कोच जैसा कार्यक्रम तैयार करके दे रहे हैं, सभी उसी के हिसाब से खुद को तैयार कर रहे हैं.”

सुमित के पास एक और कारण भी है ओलंपिक में कुछ बड़ा करने के लिए. वह है उनके बडे़ भाई. सुमित को मलाल है कि भाई को बीच में ही बॉक्सिंग छोड़नी पड़ी.

सुमित ने कहा, “मैंने और मेरे भाई ने साथ में बॉक्सिंग शुरू की थी. लेकिन परिवार के हालात के कारण उन्हें यह खेल छोड़ देना पड़ा. मेरे भाई ने एक बार मुझ से यह कहा था कि देख मैं यहां तक नहीं पहुंच पाया. लेकिन तू पहुंच गया. वह शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते है.”

वैसे सुमित का बॉक्सिंग में आना भी रोचक है. वह पढ़ने में कमजोर थे. लिहाजा स्कूल से बचने के लिए कोई बहाना चाहिए था.

जिंदगी के इस हिस्से को साझा करते हुए उन्होंने बताया, “स्कूल से बचने के लिए ही मैंने बॉक्सिंग शुरु की थी. मैने नौ साल की उम्र में बॉक्सिंग शुरू की थी. मेरे अंकल ने इसे आगे बढा़ने के लिए प्रेरित किया.”

लेकिन मां नहीं चाहती थी कि सुमित बॉक्सिंग करें. मां को डर था कि अगर नाक की हड्डी टूट गई तो क्या होगा. अंदर एक डर था बेटे के चोटिल होने का. लेकिन सुमित के क्वालिफाई करने के बाद वही सबसे खुश थीं.

मां की खुशी

इस बारे में सुमित ने बताया, “लंदन के लिए क्वालिफाई करने की खबर पहले ही गांव पहुच चुकी थी. मैं पहुंचा तो मां के चेहरे की खुशी देखने लायक थी. मुझे देखते ही वह रो पड़ी और मुझे गले से लगा लिया.”

अधिकतर इंसानों की तरह सुमित भी मीठा खाने के शौकीन हैं. खासकर रसमलाई उनकी पसंदीदा मिठाई है. लेकिन वजन को काबू में रखने के लिए उन्हें अनेकों बार अपनी इच्छा की हत्या करनी पड़ी.

सुमित ने बताया, “ हाल ही में मेरे दोस्त के माता-पिता एयरपोर्ट मिलने आए थे. वे अपने साथ रसमलाई के तीन डिब्बे भी ले कर आए. मेरे लिए तो जैसे मुसीबत हो गई क्योंकि रसमलाई के डिब्बे सामने थे और मैं खा नहीं सकता था. हालांकि मन मार कर मैंने कुछ खाए भी. बाकी सब साथी लोग खा गए. ”

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