गीता के पिता को चाहिए सिर्फ ओलंपिक मेडल

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Image caption 23 साल की गीता ओलंपिक में क्वॉलिफाई करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान हैं. उन्होंने कहा कि लंदन में जापानी पहलवान सबसे बड़ी चुनौती होगी

गीता फोगाट के पिता ने सामाजिक महौल के विपरीत अपनी बेटियों को कुश्ती के मैट पर खुद को साबित करने की आजादी दी.

पिता की इस हिम्मत को 23 साल की गीता ने 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में पहली बार महिला कुश्ती के गोल्ड मेडल में बदला. लेकिन पिता के लिए वह ऐतिहासिक पदक बेमानी है. क्योंकि गीता के पिता की नजर में मेडल सिर्फ ओलंपिक का ही होता है.

इसलिए बेटी भी लंदन ओलंपिक में अपने पिता की तमन्ना को पूरा करने के लिए आत्मविश्वास से भरी हैं.

गीता ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “सच कहूं तो हमने कुश्ती ओलंपिक मेडल के लिए ही शुरु की थी. यह पूरे परिवार का सपना है. दिल्ली के कॉमनवेल्थ गेम्स में मैंने गोल्ड मेडल और मेरी बहन बबीता ने सिल्वर मेडल जीता था. लेकिन मेरे पिता संतुष्ट नहीं थे, उन्होंने कहा कि मेरी नजर में मेडल सिर्फ ओलंपिक का ही होता है.”

तेइस साल की गीता ओलंपिक में क्वॉलिफाई करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान हैं. उन्होंने कहा कि लंदन में जापानी पहलवान सबसे बड़ी चुनौती होगी

55 किलोग्राम भार वर्ग में गीता एक ऐसे परिवार से हैं जिसकीं नींव में कुश्ती है. पिता मिट्टी पर सैंकड़ों दंगल लड़ चुके हैं. छोटी बहन बबीता भी पिछले दो साल से अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं. बाकी तीन मौसेरी और चचेरी बहन भी कुश्ती करती हैं.

पिता की मार

पिता ने गीता पर सबसे अधिक मेहनत की है. शायद इसलिए पिटाई भी उन्हें ही खानी पड़ती थी

छह साल की उम्र से कुश्ती शुरु करने वाली गीता बताती हैं, “मुझे एक बार नहीं बल्कि कई बार रोना आया. क्योंकि सबसे ज्यादा मार मुझे ही पड़ती थी. मेरी छोटी बहन बबीता काफी मेहनत करती थी. मेरे पिता हमेशा कहते कि जब छोटी बहन कड़ा अभ्यास कर सकती है तो मैं क्यों नहीं. मेरे पिता ने पिटाई के लिए लकड़ी की पतली सी छड़ रखी हुई थी.”

गीता के पिता की मार से बचाने वालों में सिर्फ उनकी दादी होती थी. लेकिन पिता की यह मार अपनी बेटी को एक मुकाम देने के लिए ही थी. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गीता सहित बेटियों से घर का कोई काम नहीं करवाया जाता था.

गीता बताती हैं, “ पापा ने हमें बेटों की तरह पाला है. उन्होंने हमेशा हमें यही कहा कि तुम सिर्फ मेहनत करो. तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं होगी. अगर इसके लिए मुझे अपने शरीर का हिस्सा भी बेचना पड़े तो मैं वह भी कर दूंगा. मुझे और मेरी बहन को घर का कोई काम नहीं करना पड़ता था. पापा कहते कि इन्हें आराम की जरूरत है. सारा भार मां ने ही उठाया है.”

पहलवानों की डायट के बारे में कई तरह की कहानियां हैं. लेकिन गीता के साथ बातचीत करने पर काफी चीजें साफ हो जाती हैं.

खाने में संतुलन

गीता ने बताया, “लोगों की धारणा है कि पहलवान ज्यादा खाते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. जैसे मुझे अपने वजन को काबू में रखने के लिए काफी सावधानी बर्तनी पड़ती है. हो सकता है कि पुरुष पहलवान ज्यादा घी-मक्खन खाते हों. लेकिन हमें कम फैट का खाना सेना होता है. क्योंकि वेट कैटेगरी में खुद के वजन पर नियंत्रण रखना जरूरी होता है. ”

गीता की बदौलत चरखी दादरी के पास उनके गांव बलाली का काफी नाम ऊंचा हुआ है. यह भी कि लोग अब इस महिला पहलवानों के परिवार को पहचानने लगे हैं.

गीता ने बताया, “कभी हम बस में सफर करते है तो साथ की सीट पर बैठे लोग पूछ लेते हैं कि हम क्या करते हैं. फिर जब हम बताते हैं तो वो बोलते है कि अच्छा तुम लोग पहलवानों के परिवार से हो जिसके बारे में अखबारों में छपता है.”

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