लंदन ओलंपिक में खुली भारत के दावों की पोल

  • 5 अगस्त 2012
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लंदन ओलंपिक अपने आखिरी चरण में प्रवेश कर गया है और अब ट्रैक एंड फील्ड मुकाबले शुरू हो गए हैं.

अभी तक के भारतीय प्रदर्शन पर नजर डालें, तो पता चलेगा कि खेल संघों और अधिकारियों के ज्यादा से ज्यादा मेडल जीतने के दावे को तगड़ा झटका लगा है.

लंदन ओलंपिक पर विशेष कवरेज

राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में अपने प्रदर्शन का दम दिखाने वाले भारतीय एथलीट ओलंपिक जैसी प्रतियोगिता में आकर फिसड्डी साबित हो जाते हैं.

ओलंपिक शुरू होने से पहले भारत ने कई दावे किए थे. तीरंदाजी से लेकर टेनिस तक में पदक जीतने के दावे किए गए थे. लेकिन सच्चाई यही है कि भारत को जो तीन पदक हासिल हुए हैं, वे निशानेबाजी और बैडमिंटन में हैं.

तो खेल संघों और भारतीय अधिकारियों के बड़े बोल खोखले साबित हुए हैं और एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं कि भारत की खेल नीति किस दिशा में जा रही है. क्या इक्का-दुक्का खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रदर्शन को खेल नीति की सफलता मानी जाएगी, शायद नहीं.

चलिए लंदन ओलंपिक पर ध्यान केंद्रित करते हैं.

तीरंदाजी में दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी दीपिका कुमारी के कंधे पर बड़ा बोझ था, लेकिन क्या हुआ. दीपिका कुमारी बोझ तले ऐसी दबीं कि औसत प्रदर्शन भी नहीं कर पाईं.

मौसम का रोना क्या असली वजह है. अगर ऐसा है भी तो प्रशिक्षण के लिए ऐसा माहौल तैयार क्यों नहीं कराया गया. दीपिका कुमारी न तो टीम मुकाबले में चलीं और न ही व्यक्तिगत मुकाबले में.

बाकी के तीरंदाजों का भी वही हश्र हुआ. पुरुष तीरंदाजों से तो किसी ने अपेक्षा भी नहीं की थी और न ही उन्होंने ऐसा कुछ कमाल ही किया. तो तीरंदाजी में भारत का तरकश खाली ही रहा.

बैडिमिंटन खिलाड़ियों ने दिल जीता

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बैडमिंटन में भारतीय खिलाड़ियों ने दिखाया कि उनमें दम है. जरूरत सिर्फ सही ट्रेनिंग और ज्यादा से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने की है..

साइना नेहवाल ने दिखाया कि उन्हें यूँ ही भारत का स्टार खिलाड़ी नहीं माना जाता है. हालाँकि वे पदक जीतने में भाग्यशाली रहीं. क्योंकि चीन की खिलाड़ी शिन वांग उनसे एक गेम जीत चुकी थी, लेकिन घायल होने के कारण वे मैच से हट गईं और साइना को कांस्य पदक मिल गया.

वैसे साइना ने ओलंपिक सेमी फाइनल में जगह बनाकर भारत के लिए इतिहास रचा था.

पुरुष बैडमिंटन में भारत के लिए स्टार बनकर उभरे हैं पी कश्यप. उनसे किसी ने भी कोई खास उम्मीद नहीं की थी. लेकिन उन्होंने क्वार्टर फाइनल तक जगह बनाई. सेमी फाइनल में वे नहीं पहुँच पाए. लेकिन दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी को उन्होंने अच्छी चुनौती दी.

मिक्स्ड डबल्स में ज्वाला गुट्टा और वी दीजू की जोड़ी एकदम फ्लॉप रही. हालाँकि महिलाओं के डबल्स में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा की जोड़ी दुर्भाग्यशाली रही और समीकरणों में उलझकर क्वार्टर फाइनल में नहीं पहुँच पाई.

कहाँ गए मुक्केबाज

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मुक्केबाजी में भारत के सात पुरुष मुक्केबाजों ने हिस्सा लिया, जिनमें से चार बाहर हो चुके हैं. ओलंपिक शुरू होने से पहले भारतीय मुक्केबाजी संघ ने ओलंपिक पार्क से बाहर एक होटल में पत्रकारों को बुलाकर लंबे-चौड़े दावे किए थे.

सभी मुक्केबाजों को बैठाकर उनकी नुमाइश लगाई गई थी. लेकिन इनमें से पाँच मुक्केबाज बाहर हो चुके हैं. अब विजेंदर सिंह और देवेंद्रो सिंह से काफी उम्मीदें हैं.

विजेंदर सिंह जिस तरह की रणनीति से खेल रहे हैं और उन्होंने आगे भी इस रणनीति को जारी रखा, तो शायद वे भारत को एक पदक जरूर जिता सकते हैं.

महिला मुक्केबाज मेरी कोम ने अभी अपना अभियान शुरू नहीं किया है. लेकिन उनकी राह आसान नहीं है. क्वालिफाइंग राउंड में उन्हें जिस तरह की चुनौतियाँ झेलनी पड़ी, उससे स्पष्ट है कि उन्हें भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

गायब हुई हॉकी टीम

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क्या आपको लगता है कि भारतीय हॉकी टीम को इस चर्चा में शामिल भी किया जाना चाहिए. बात सिर्फ हार की नहीं. बात टीम के प्रदर्शन की और मैदान पर बहादुरी से विपक्षी टीम का सामना करने की है.

लेकिन भारत की टीम ऐसा कुछ भी नहीं कर पाई. पहले ब्लू टर्फ का बहाना था, लेकिन उसके लिए भी खेल मंत्रालय ने जम कर पैसे खर्च किए और ओलंपिक से पहले उन्हें कई बार ब्लू टर्फ पर खेलने का मौका नहीं मिला.

इक्का-दुक्का खिलाड़ियों को छोड़ दिया जाए, तो भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन बयां करने लायक भी नहीं. तीन में से तीन मैच में मिली बुरी हार भारतीय हॉकी के भविष्य पर कई सवाल खड़े करती है.

जूडो में गरिमा चौधरी पहले ही दौर में बुरी तरह परास्त हो गईं. रोविंग में स्वर्ण सिंह सिंगल स्कल और संदीप कुमार/मंजीत सिंह लाइटवेट डबल स्कल के फाइनल तक गए, लेकिन वहाँ बुरी तरह पिटे.

निशानेबाजों ने लगाया सही निशाना

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निशानेबाजी में पहले बात महिला निशानेबाजों की, जिनमें से किसी ने भी किसी भी मुकाबले के फाइनल में जगह नहीं बनाई और क्वालिफाइंग राउंड में ही बाहर हो गईं. शगुन चौधरी, राही सरनोबत, अन्नुराज सिंह और हिना सिद्धू में से किसी ने भी प्रभावित नहीं किया.

पुरुष निशानेबाजों ने जरूर प्रभावित किया और भारत को तीन में से दो पदक पुरुष निशानेबाजों ने ही दिलाए हैं.

गगन नारंग और विजय कुमार ने भारत की लाज रखी है. नारंग ने 10 मीटर एयर राइफल में कांस्य जीता, तो विजय कुमार ने 25मीटर रैपिड फायर पिस्टल में रजत पदक जीतकर भारत का मान रखा.

अभिनव बिंद्रा नहीं चले, तो रोंजन सिंह सोढ़ी भी हार गए. जयदीप कर्माकर भी अच्छा प्रदर्शन करके हारे.

इसके अलावा संजीव राजपूत और गगन नारंग को 50 मीटर राइफल थ्री पोजिशन में हिस्सा लेना है.

तैराकी में गगन उलालमठ के चयन पर ही सवाल हैं. वे 1500 मीटर फ्री-स्टाइल तैराकी में आखिरी स्थान पर रहे.

टेबल टेनिस में सौम्यजीत घोष दूसरे राउंड तक गए, लेकिन अंकिता दास पहले राउंड में ही हार कर बाहर हो गईं.

लड़ते रह गए टेनिस खिलाड़ी

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टेनिस में भारतीय खिलाड़ियों की आपसी लड़ाई का नतीजा क्या होता है, ये साफ दिखा है. महेश भूपति अपने मनपसंद पार्टनर रोहन बोपन्ना के साथ किसी तरह एक राउंड का मैच जीतने में सफल रहे, लेकिन दूसरे राउंड में बुरी तरह हारे.

दूसरी ओर विष्णु वर्धन के साथ लिएंडर पेस ने अच्छा प्रदर्शन किया. वे भी दूसरे राउंड में हारे, लेकिन अच्छे प्रदर्शन के साथ.

मिक्स्ड डबल्स में लिएंडर पेस और सानिया मिर्जा की जोड़ी बनाई गई थी. लेकिन वो भी एक ही मैच जीत पाए. कहा तो ये जा रहा था कि मिक्स्ड डबल्स में भारत के पदक जीतने की उम्मीद है.

सिंगल्स में सोमदेव देववर्मन एक राउंड भी मैच नहीं जीत पाए, वही हाल विष्णु वर्धन का रहा.

पहलवानी से उम्मीदें

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लेकिन सवाल यही है कि क्या भारतीय टेनिस के आला अधिकारी इस मामले पर कोई कड़ा कदम उठाते हैं या नहीं. क्या देश के लिए खेलते समय खिलाड़ियों की व्यक्तिगत लड़ाई इतनी हावी होनी चाहिए कि टीम ही बदल जाए. इसका जवाब तो अधिकारी ही देंगे.

भारोत्तोलन में रवि कुमार और सोनिया चानू का भी प्रदर्शन बयां करने लायक नहीं. रवि कुमार 15वें और चानू सातवें स्थान पर रहीं.

डिस्कस थ्रो में कृष्णा पूनिया फाइनल तक गईं, लेकिन मेडल नहीं पा सकीं. उन्हें सातवें स्थान से ही संतोष करना पड़ा. जबकि सीमा अंतिल क्वालिफाई तक नहीं कर पाईं.

भारत को पहलवानी से काफी उम्मीदें हैं. जिनके मुकाबले अगले सप्ताह शुरू हो रहे हैं.

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