मैरीकॉम के लिए संन्यास की घड़ी?

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भारत की मुक्केबाज़ एमसी मैरीकॉम लंदन ओलंपिक से कांस्य पदक लेकर लौट रही हैं. ओलंपिक खेलों में पहली बार हिस्सा लेने वाली मैरीकॉम का इस भव्य आयोजन में भाग लेना और एक पदक जीतने का सपना था जो इस बार पूरा हो गया.

हालांकि भारत को और पूरे मणिपुर को शायद उनसे एक स्वर्ण पदक की आस थी, जो पूरी नहीं हो सकी.

लेकिन क्या आगे कभी इस मुकाम को हासिल कर सकेंगी मदर मैरी?

अगर मुझसे पूछिए तो बेहद मुश्किल लगता है.

उम्र का पड़ाव

ज़ाहिर सी बात है 2016 में आयोजित होने वाले अगले रियो ओलंपिक खेलों तक मैरीकॉम पूरे 33 वर्ष की हो चुकी होंगी. उस उम्र में ओलंपिक जैसे शीर्ष प्रतिस्पर्धा वाले खेलों में एक स्वर्ण या रजत पदक जीतना किसी भी 33 वर्ष के इंसान के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है, चाहे वो पुरुष हो या महिला.

Image caption रेचुंग्वार और खुपेंवार को लंबे समय तक मां से अलग रहना पड़ा है.

रहा सवाल मैरीकॉम का तो अब हासिल करने के लिए बचा ही क्या है?

पांच बार विश्व प्रतियोगिता का ख़िताब जीत लेना कोई मामूली बात नहीं होती. साइना नेहवाल और अभिनव बिंद्रा जैसे खिलाडियों के लिए भी विश्व चैम्पियन बनना अभी एक सपना सा है.

एक दूसरी बात ये भी है कि मैरीकॉम के अपने देश भारत में अब शायद ही कोई ऐसा खेल पुरस्कार शेष रह गया है जो उन्हें नहीं मिला हो. पद्म श्री, अर्जुन पुरस्कार और राजीव गांधी खेल रत्न जैसे नामी-गिरामी पुरस्कार तो ओलंपिक में भाग लेने के पहले ही उनकी झोली में थे.

इस लिहाज़ से अब मैरीकॉम के लिए हासिल करने के लिए कुछ बहुत शेष नहीं रह गया है.

एक और बेहद अहम बात है. मैरीकॉम के जुड़वां बच्चे. रेचुंग्वार और खुपेंवार. जी हाँ, अब इन बच्चों को अपनी चहेती मां का वो प्यार चाहिए जो अभी तक शायद उन्हें नहीं मिल सका है.

परिवार की ज़रूरत

मैरीकॉम के इंफाल स्थित घर में एक पूरा दिन बिताने के बाद मुझे तो कम से कम यही लगा कि इन बच्चों को अब पूरी तरह अपनी सफल और कामयाब मां कि छाँव चाहिये.

नाना, चाची, मौसी और चचा की छांव में ज़्यादातर रहने वाले मैरीकॉम के बच्चों के चेहरे पर एक अजीब सा कौतूहल और जिज्ञासा ही देखने को मिलती है. पांच साल कि उम्र में शायद दूसरे बच्चे इतने परिपक्व नहीं होते जितने मैरीकॉम के बच्चे हो चुके हैं.

यक़ीन मानिए अगर दुनिया के तमाम मीडियाकर्मी आपके घर उतर आएं और आपके नन्हे बच्चों की तरफ कैमरे तानकर खड़े हो जाएं तो उनके होश उड़ से जाएँगे. लेकिन मैरीकॉम के बच्चों का ढांढस देखते ही बनता है. वो इन सबके बावजूद थोड़ा सा मुस्कुराते हैं, थोडा सा शर्माते हैं और फिर पीछे हट जाते हैं.

Image caption मैरी कॉम के बॉक्सिंग अकादमी के बच्चे बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहे हैं.

ख़ासतौर पर मुझे तो थोड़ा बुरा ही लगा जब मैरीकॉम के हारने के बाद उनके पिता दुखी होकर घर की रसोई में जाकर चुप-चाप बैठ गए और ये दोनों बच्चे मैरीकॉम के ड्राईंग रूम में अजनबियों से एक आस लिए टीवी स्क्रीन की तरफ निहार रहे थे कि शायद उनकी मां दोबारा पर्दे पर दिखा जाएँ.

आस और संकल्प

ट्रेनिंग और नियमित प्रैक्टिस के चलते दूर रहने के कारण मैरीकॉम के साथ-साथ बच्चों की दाद भी देनी ही होगी.

लेकिन अब कम से कम मुझे लगता है कि साल भर के भीतर ही अपने एक सफल करियर का आकलन करने की ज़रुरत आ पड़ेगी खुद मैरीकॉम को भी.

आखिरकार पांच फुट दो इंच वाली भारत की सबसे सफल बॉक्सर के कन्धों पर देश में और बेहतरीन महिला बॉक्सरों को बढ़ावा और ट्रेनिंग देने की भी तो ज़िम्मेदारी है.

अपने जुड़वां बच्चों के साथ-साथ उन तमाम बच्चों को भी अब मैरीकॉम की नियमित ज़रुरत है जो उनकी बॉक्सिंग अकादमी में रोज़ बेनागा पहुँच जाते हैं. मन में एक आस और संकल्प लिए.

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