युवराज: कैंसर से क्रिकेट तक का सफर...

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Image caption डॉक्टर नितेश रोहतगी युवराज की अंदरूनी शक्ति की तारीफ करते नहीं थकते

मैं सबसे पहले युवराज सिंह के परिवार और दोस्तों से मिला. हमने उनकी रिपोर्टों पर गहन चर्चा की.

बातचीत से ये साफ हो गया कि उनको किस तरह का ट्यूमर है और उसका क्या इलाज होना चाहिए.

हमें शुरूआत से पता था कि युवराज को किस तरह के इलाज की जरूरत है.

युवराज को ऐसा कैंसर था जो कीमोथेरपी से काफी हद तक खत्म हो जाता है. इसमें सीमित कीमोथेरपी की जरूरत होती है. इसमें 10 या 12 चक्र के कीमोथेरपी की जरूरत नहीं होती और तीन से चार चक्र में ही काम हो जाता है.

जिस बात ने युवराज की बहुत मदद की, वो थी उनकी अंदरूनी शक्ति. जब वो इलाज करवा रहे थे, तो उन्होंने ठान लिया था कि अभी मेरे साथ जो कर सकते हो वो कर लो और जब मैं ठीक होंगा तो पूरा ठीक होंगा.

इसके अलावा उन्हें ये बात भी समझ आ गई थी कि वो इस केस के माध्यम से लोगों में कैंसर के बारे में जागरुकता फैला सकते हैं.

वो बेहद शांत तरीके से योजनाएँ बनाते हैं.

मैं आपको इसका उदाहरण देता हूँ.

अमरीका में एक बार हम एक खेल ‘ओथेलो’ खेल रहे थे जिसमें बहुत कौशल की जरूरत होती है. ये खेल युवराज ने पहले कभी नहीं खेला था. मैं इस खेल में खुद को चैंपियन मानता हूँ क्योंकि मैं इसे सालों से खेल रहा हूँ.

जब युवराज इस खेल में पहली बार हारे तो उन्होंने मुझसे कहा, “डॉक, एक बार और.”

जब हमने उसी खेल को दूसरी बार खेला तो वो इतनी बुरी तरह से नहीं हारे जैसे पहली बार हारे थे.

उन्होंने फिर कहा, “डॉक, एक बार और.”

मैने कहा, कब तक इसे खेलेंगे. उन्होंने कहा, जब तक जीतेंगे नहीं, खेलना तो पड़ेगा.

आखिरकार वो जीते नहीं क्योंकि मैं भी अच्छा खिलाड़ी हूँ लेकिन वो खेल के उस स्तर तक पहुँच गए थे कि अगर मैं खेल में एक घंटा और लगाता तो शायद वो जीत जाते.

फिर क्रिकेट

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Image caption डॉक्टर नितेश रोहतगी के मुताबिक युवराज का ठीक हो जाना औऱ क्रिकेट के लिए तैयार होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है

युवराज चूँकि हमेशा से ही एक अच्छे खिलाड़ी रहे हैं, इसलिए उन्हें वापस स्वस्थ होने में मदद मिली.

उनकी दिनचर्या कुछ खास नहीं रहती थी. हमारी कोशिश रहती थी कि हम उन्हें एक आम व्यक्ति का माहौल दें.

वो अपनी आम दिनचर्या से बेहद खुश हैं, कि मैं सुबह उठता हूँ, पराठे खाता हूँ, दोस्तों से मिलता हूँ, घूमने-फिरने जाता हूँ, शॉपिंग जाता हूँ.

आम आदमी की जिंदगी उनके लिए बहुत जरूरी हो गई थी.

उनकी दिनचर्या में संतुलित खाना और थोड़ा व्यायाम शामिल है.

जो खाना मैं और आप खाते हैं, उनका खाना उससे अलग नहीं है. वो थोड़ा एंटी-ऑक्सिडेंट और बी-कांप्लेक्स खाते थे. उनका खाना देखकर आपको ऐसा कतई नहीं लगेगा कि वो कोई खास चीज खा रहे हैं.

बहुत से लोग पूछते हैं कि क्या उन्हें इस हालत में कोई खास चीज़ खानी चाहिए? मैं कहता हूँ कि अगर आप दिन भर में आलू, प्याज, टमाटर, चावल, दाल सब्जी, नियमित तौर पर खाएँ तो आप अपने आपको पूरा फिट पाएँगे.

अगला कदम

भारत आने पर उनका इरादा था कि वो आराम करेंगे ताकि शरीर में दोबारा ताकत आए, लोगों से मिलेंगे, और पहला स्कैन आने के बाद क्रिकेट की ओर पहला कदम बढ़ाएँगे.

जैसे ही जून में पहला स्कैन ठीक आया तो उन्होंने ट्रेनिंग की योजना बनानी शुरू कर दी.

हम ये नहीं कह सकते कि उनके स्कैन में कोई समस्या नहीं थी. ये उसी तरह है कि आपके शरीर पर चोट का निशान रह जाता है. अमरीका में किए गए स्कैन में ट्यूमर के बड़े आकार के मुकाबले ताज़ा स्कैन में ट्यूमर काफी छोटा हो चुका है.

हम बार-बार स्कैन करके उनकी हालत पर ध्यान देते रहेंगे.

उनकी दवाई अभी बिल्कुल बंद है और उसकी जरूरत भी नहीं है.

मैने युवराज को कह रखा है कि आपकी कीमोथेरपी हो चुकी है और अब आप क्रिकेट खेलिए. इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है.

वर्ष 2012 में कैंसर का इलाज एक अलग स्तर पर पहुँच चुका है. ये बात ठीक है कि बहुत लोगों की हालत उतनी अच्छी नहीं रहती जैसी युवराज की है, लेकिन युवराज इस अवस्था में पहुँचने वाले अकेले नहीं हैं.

ऐसे भी मरीज हैं जो कीमोथेरपी के दौरान अपने काम पर जाते हैं. और मैं भारत के बाहर की बात नहीं कर रहा हूँ.

आज भी ऐसे मरीज हैं जो विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं और अपने दफ्तर जाते हैं.

उनका इलाज चलता रहता है और वो काम करते रहते हैं.

ये 2012 की दवाओं की खासियत है.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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