ओलंपिक में हार-जीत से बड़ी है हिस्सेदारी

Image caption लंदन ओलंपिक का हिस्सा बने पंकज प्रियदर्षी.

ओलंपिक का मूल मंत्र है- भाग लेना, हिस्सेदारी. जीत-हार तो लगी ही रहती है. लेकिन महत्वपूर्ण है दुनिया के इस सबसे बड़े खेल मेले का हिस्सा होना. खिलाड़ियों का ओलंपिक में भाग लेना ही इतिहास बन जाता है.

पत्रकारों के लिए भी स्थिति कुछ अलग नहीं होती. ओलंपिक के आयोजन का हिस्सा बनकर अपने श्रोताओं और पाठकों तक खबरें पहुँचाना एक चुनौती है. लेकिन इस चुनौती से बड़ा है ओलंपिक का हिस्सा होना.

मैंने भी क्रिकेट विश्व कप, फुटबॉल विश्व कप, आईसीसी चैम्पियंस ट्रॉफी और विंबलडन जैसे बड़े खेल आयोजनों को कवर किया है, लेकिन ओलंपिक का अनुभव इन सबसे अलहदा है. एक साथ कई खेल, कई मुकाबले, बड़े-बड़े स्टार खिलाड़ी और सबका एक जगह जमावड़ा.

लंदन में पहले भी छह साल रह चुका हूँ. लेकिन ओलंपिक के रंग में रंगा लंदन कुछ अलग लग रहा था.

ओलंपिक का आयोजन एक चुनौती है और लंदन ने इस चुनौती को पूरा करने में कोई कमी नहीं छोड़ी.

ओलंपिक पार्क का नजारा इतना खूबसूरत है कि पूछिए मत. ओलंपिक के दौरान ये पूरा पार्क सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बना रहा.

देश-दुनिया के लोगों के लिए लंदन ओलंपिक एक उत्सव था और स्थानीय लोगों के लिए ऐसा पर्व जिसे वे बेरोकटोक सफल बनाना चाहते थे.

आजकल किसी भी देश में वॉलिंटियर आयोजन को सफल बनाने का एक अहम हिस्सा होते हैं. लंदन ओलंपिक भी इससे अलग नहीं रहा.

बड़ी संख्या में वॉलिंटियर की बदौलत ओलंपिक की गाड़ी चली और चली ही नहीं खूब दौड़ी. घंटों-घंटों तक सड़कों पर खड़े रहने वाले वॉलिंटियर आम लोगों से शालीन बने रहे. कोई डॉक्टर था, तो कोई सरकार में शीर्ष अधिकारी- लेकिन सब इस आयोजन को सफल बनाने में लगे रहे.

मेरे लिए ये वॉलिंटियर लंदन ओलंपिक के हीरो रहे. इनकी बदौलत रंग-बिरंगे ओलंपिक के माहौल में आम लोगों को जश्न मनाने का मौका मिला.

मेरी कॉम और सुशील कुमार

चलिए अब ओलंपिक खेलों की बात करते हैं. दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन. दर्शकों और समर्थकों का जुनून, नारेबाजी और आँसू. सब देखने को मिले.

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Image caption सुशील कुमार को रजत मिला लेकिन इतिहास बनाया है उन्होंने

निजी स्तर पर महिला बॉक्सर मेरी कॉम का कांस्य पदक जीतना और सुशील कुमार का ओलंपिक के आखिरी दिन रजत पदक जीतना मेरे लिए ना भूलने वाले लम्हे थे..

वैसे तो गगन नारंग ने भी पदक जीता, विजय कुमार ने भी और साइना ने भी.

लेकिन मेरी कॉम की डिमांड जितनी थी, शायद किसी भी भारतीय खिलाड़ी की नहीं. मेरी कॉम का इंटरव्यू लेने वालों की इतनी लंबी लाइन लगी होती थी कि पूछिए मत.

सभी मेरी कॉम की अदा पर फिदा थे. अपने खास अंदाज में लोगों को इंटरव्यू देती मेरी कॉम सबके आकर्षण का केंद्र रहीं. हँसते-हँसते सब बातें कहना और शालीनता से हार को स्वीकार करना. शायद ओलंपिक की यही भावना है और मेरी कॉम इस पर पूरी तरह खरी उतरी.

दूसरी ओर सुशील कुमार भारत को गोल्ड जिताते-जिताते रह गए. क्षण भर में उत्साह से भरपूर भारतीय कैंप में निराशा की लहर दौड़ गई. लगा जैसे उनके रजत पदक की जीत फीकी पड़ गई हो.

लेकिन इस निराशा को भी खत्म होते समय नहीं लगा, जब भारतीय समर्थकों ने नारेबाजी से सारे स्टेडियम को हिला दिया. बेजोड़ माहौल था. शुरू में निराश लग रहे सुशील भी बाद में संभले और जश्न में लग गए.

एक और मेरी कॉम और सुशील कुमार, तो दूसरी ओर उसैन बोल्ट. अंदाज-ए-बोल्ट में मगन दुनिया. दुनिया का तेज-तर्रार धावक और उतना ही बड़ा स्टार.

बोल्ट के 100 मीटर दौड़ को नहीं देख पाया था, इसलिए 200 मीटर दौड़ देखने की उम्मीद में भागा-भागा ओलंपिक स्टेडियम पहुँचा.

वहाँ मीडिया के सारे बॉक्स भरे हुए थे. किसी तरह एक कोने में खड़े रहने की जगह मिली. विहंगम ओलंपिक स्टेडियम और बोल्टमय माहौल. इस माहौल का एक अपना ही मजा था. लंबे समय तक दिलो-दिमाग से उस क्षण को निकालना मुश्किल होगा.

अभूतपूर्व बोल्ट

बोल्ट दौड़े और क्या दौड़े. पलक झपकते ही रेस पूरी और फिर बोल्ट अपने अंदाज में मैदान के चक्कर लगाते दिखे. अपनी जीत में मगन, बिंदास बोल्ट. ओलंपिक की वो यादगार शाम.

लेकिन उसी शाम स्टेडियम से बाहर निकलते 800 मीटर दौड़ के सेमी फाइनल में जगह बनाने वाली भारत की धाविका टिंटू लूका और उनकी मेंटर पीटी ऊषा से आमना-सामना हो गया.

बोल्ट के रंग में रंगे माहौल में टिंटू लूका मुझे आत्मविश्वास से जूझती नजर आई. पूछा क्या हो गया, तो झिझकते-झिझकते धीमे स्वर में इतना ही बोलीं- हमने कोशिश की. पीटी ऊषा बोलीं- लड़की अच्छी है, भविष्य अच्छा है, पहला ओलंपिक था. आगे कमाल करेगी.

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Image caption बोल्ट ने पलक झपकते 200 मीटर की दूरी तय की और बोले अब मैं लेजेंड हो गया हूं

लेकिन मन के किसी कोने में ये सवाल जरूर उभरा कि बोल्ट की तेज दुनिया में क्या कभी भारतीय धावक जगह बना पाएँगे. हमें भी इंतजार रहेगा.

हॉकी और साइना

भारतीय हॉकी टीम की दुर्दशा जग जाहिर है. ओलंपिक शुरू होने से पहले प्रैक्टिस सत्र के दौरान मेरी कई खिलाड़ियों से बात हुई थी. सरदार सिंह भी उनमें शामिल थे. आत्मविश्वास से भरे. कुछ करने की चाहत. बोले- अच्छी प्रैक्टिस है. कुछ करके दिखाएँगे.

फिर उसी सरदार सिंह से मुलाकात हुई बेल्जियम के खिलाफ आखिरी लीग मैच के बाद. इस मैच में भारत हारा था. सरदार वो सरदार नहीं दिखे. गमजदा, निराश लेकिन कुछ कर गुजरने का जज्बा बरकरार था.

मैंने पूछा- सरदार, ये निराशा इतनी आसानी से खत्म होगी क्या. सरदार बोले- मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ, देश को भरोसा दिलाता हूँ. हॉकी प्रेमियों को यकीन दिलाता हूँ. एक दिन कोई न कोई बड़ा टूर्नांमेंट जीत कर देश को तोहफा दूँगा.

सरदार भारतीय टीम के अहम सदस्य हैं. लेकिन कप्तान नहीं हैं. लेकिन सरदार का आत्मविश्वास देखकर लगता है कि ओलंपिक की हार भी इस सरदार को सोना बना गई है. भारत को ऐसा सरदारों की आवश्यकता है.

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Image caption भारत की हॉकी टीम का प्रदर्शन बेहद खराब रहा.

ओलंपिक खेल के दौरान कई नजारे आपको थोड़ा परेशान भी करते हैं. खिलाड़ियों की कम अंतर से हार और उनके आंसू. अमरीका की एसपराजा महिलाओं की बॉक्सिंग में हार गईं. उन्हें भी मेरी कॉम के साथ कांस्य पदक मिला.

जब सेमी फाइनल में हारीं, तो उनके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. प्रेस स्टैंड में मैं खड़ा था. पास से गुजरीं तो लगा ओलंपिक कितना मायने रखता है खिलाड़ियों के लिए. एक मौका गया नहीं कि आप गए काम से. अगला मौका तो चार साल बाद ही मिलता है, लेकिन पता नहीं उस समय प्रदर्शन कैसा रहे.

ओलंपिक के यादगार क्षणों में आयरलैंड की महिला बॉक्सर केटी टेलर का स्वर्ण पदक जीतना भी रहा. आयरलैंड के समर्थकों की इतनी तादाद थी कि लगा पूरा स्टेडियम आयरलैंडमय हो गया हो.

सोलह साल बाद आयरलैंड ने कोई स्वर्ण पदक जीता था. इसका जश्न देखने लायक था. स्टेडियम के बाहर बड़ी संख्या में इकट्ठा समर्थक देर तक नाच-गाना करते रहे.

ओलंपिक की बात हो और साइना नेहवाल की चर्चा न हो, ऐसा हो नहीं सकता. मेरी कॉम की तरह साइना नेहवाल भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में काफी लोकप्रिय हैं. खासकर ब्रिटेन का बैडमिंटन प्रेमी मीडिया साइना से काफी प्रभावित है.

लेकिन साइना से शायद ही कोई न प्रभावित हो. कई बार खिलाड़ियों के व्यवहार से दुखी मीडियाकर्मी शिकायतों का पुलिंदा लेकर बैठ जाते हैं. कई खिलाड़ी इंटरव्यू देने में मीडिया वालों को नाकों चने चबवा देते हैं, लेकिन साइना की नम्रता तथाकथित स्टार खिलाड़ियों के लिए सबक है.

मुझे याद है जब साइना ने सेमी फाइनल में जगह बनाई थी. इंटरव्यू लेने वालों की कतार लगी थी. लेकिन साइना आराम से सबसे बतियाते मेरे पास पहुँची, मुझे लगा शायद थकी होने के कारण मुझे कम समय मिलेगा. लेकिन साइना ने अपना बैग नीचे रखा और फिर आराम से सवालों के जवाब देती रहीं, जब तक मैंने उनसे पूछना जारी रखा.

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Image caption साइना नेहवाल ने कांस्य पदक जीतकर भारतीयों का उत्साह बरकरार रखा है.

ओलंपिक जैसे लंबी चलने वाली प्रतियोगिता में धीरे-धीरे खिलाड़ियों, अधिकारियों और पत्रकारों के बीच एक अनोखा रिश्ता बन जाता है.

एक-दूसरे से सुख-दुख बतियाने के अलावा खबरों का आदान-प्रदान भी खूब होता है. जिन्हें कुछ पत्रकार एक्सक्लूसिव कहते हैं, वो खबरें भी इन्हीं सर्किल से छन कर पहुँचती है या पहुँचा दी जाती है.

जन्माष्टमी के दिन की बात है. काम की धुन में हमें कहाँ याद था कि उस दिन जन्माष्टमी थी. पहलवानी का मैच देखने स्टैंड में बैठा, तो भारतीय टीम की महिला डॉक्टर ने हम सभी के पास मिठाई का डब्बा भेजा और मुझसे कहा- आप सब लोग जन्माष्टमी का प्रसाद ग्रहण करें.

सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त के पदक जीतने के बाद हमारे पास आ-आकर अन्य देशों के लोग बधाई दे रहे थे. जापान की एक महिला पत्रकार मेरी कॉम के इंटरव्यू के लिए पसीने-पसीने हो रही थी.

भारतीय हॉकी के खराब प्रदर्शन पर एक ब्रितानी स्टैंड से चिल्ला रहा था. रेलवे स्टेशन पर खड़ा एक वॉलिंटियर 12 घंटों से बिना थके चेहरे पर मुस्कान लिए सबके स्वागत में लगा था.

लंदन ओलंपिक के इन नजारों में ओलंपिक का संदेश छिपा है. कुछ क्षणिक भावनात्मक गुबार को छोड़ दिया जाए, तो ओलंपिक अपने मकसद में कामयाब रहा. सिटियस, ऑल्टियस, फोर्टियस यानी और तेज, और ऊँचा और मजबूत.

मैंने अपने पहले ओलंपिक में कई तरह से इस मकसद को पूरा होते देखा.

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