मैरीकॉम: आगे भी बॉक्सर, या फिर कोच?

मैरी कॉम
Image caption 2016 में आयोजित होने वाले अगले रियो ओलंपिक खेलों तक मैरीकॉम 33 वर्ष की हो चुकी होंगी.

मणिपुर और भारत की शान कही जाने वाली मैरीकॉम ने लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीत अपना वर्षों पुराना सपना पूरा किया और मंगलवार तड़के सुबह वो दिल्ली पहुंची.

वो बात और है कि करोड़ों भारतीय खेल प्रेमियों को उनसे एक स्वर्ण पदक की आस थी जो पूरी नहीं हो सकी और शायद मैरी को भी इस बात का मलाल जीवन भर रहेगा.

लेकिन क्या मणिपुर के एक गरीब किसान की इस बेटी ने अपने करियर में अब वो सब हासिल कर लिया है जिसके बाद किसी एथलीट को अपने करियर का दूसरा पड़ाव दिखने लगे.

रहा सवाल उस एक ओलंपिक स्वर्ण पदक का जिसे जीत न सकी मैरीकॉम.

उम्र कितनी अहम

आगे की डगर भी खासी मुश्किल सी लगती है. ज़ाहिर सी बात है 2016 में आयोजित होने वाले अगले रियो ओलंपिक खेलों तक मैरीकॉम पूरे 33 वर्ष की हो चुकी होंगी.

उस उम्र में ओलंपिक जैसे शीर्ष प्रतिस्पर्धा वाले खेलों में एक स्वर्ण या रजत पदक जीतना किसी भी 33 वर्ष के इंसान के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है, चाहे वो पुरुष हो या महिला.

हालांकि इस बात को सिरे से खारिज कर देना भी गलत ही रहेगा कि उम्र के उस पड़ाव में ओलंपिक मेडल जीतना नामुमकिन सा है.

कई ऐसे एथलीटों ने इस तरह की अटकलों को मुमकिन में बदल के भी दिखाया है.

Image caption रेचुंग्वार और खुपेंवार को लंबे समय तक मां से अलग रहना पड़ा है.

लेकिन ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ओलंपिक खेलों में महिलाओं की बॉक्सिंग प्रतिस्पर्धा इसी बार से शुरू हुई है और अगले खेलों तक तमाम ऐसे देश होंगे जिनसे कई युवा महिला बॉक्सर निकलकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं के लिए तैयार हो चुकी होंगीं.

अब रहा सवाल ये कि मैरीकॉम के हासिल करने के लिए बचा ही क्या है?

पांच बार विश्व प्रतियोगिता का ख़िताब जीत लेना कोई मामूली बात नहीं होती. साइना नेहवाल और अभिनव बिंद्रा जैसे खिलाडियों के लिए भी विश्व चैम्पियन बनना अभी एक सपना सा है.

एक दूसरी बात ये भी है कि मैरीकॉम के अपने देश भारत में अब शायद ही कोई ऐसा खेल पुरस्कार शेष रह गया है जो उन्हें नहीं मिला हो.

पद्मश्री, अर्जुन पुरस्कार और राजीव गांधी खेल रत्न जैसे नामी-गिरामी पुरस्कार तो ओलंपिक में भाग लेने के पहले ही उनकी झोली में थे.

इस लिहाज़ से अब मैरीकॉम के लिए हासिल करने के लिए कुछ बहुत शेष नहीं रह गया है.

परिवार पर ध्यान

एक और बेहद अहम बात है. मैरीकॉम के जुड़वां बच्चे. रेचुंग्वार और खुपेंवार.

जी हाँ, अब शायद इन बच्चों को अपनी चहेती मां का वो प्यार चाहिए जो अभी तक शायद उन्हें पूरी तरह नहीं मिल सका है.

Image caption मैरी कॉम के बॉक्सिंग अकादमी के बच्चे बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहे हैं.

नाना, चाची, मौसी और चाचा की छांव में ज़्यादातर रहने वाले मैरीकॉम के बच्चों के चेहरे पर एक अजीब सा कौतूहल और जिज्ञासा ही देखने को मिलती है.

पांच साल की उम्र में शायद दूसरे बच्चे इतने परिपक्व नहीं होते जितने मैरीकॉम के बच्चे हो चुके हैं.

यक़ीन मानिए अगर दुनिया के तमाम मीडियाकर्मी आपके घर उतर आएं और आपके नन्हे बच्चों की तरफ कैमरे तानकर खड़े हो जाएं तो उनके होश उड़ से जाएँगे. लेकिन मैरीकॉम के बच्चों का ढाढस देखते ही बनता है.

वो इन सबके बावजूद थोड़ा सा मुस्कुराते हैं, थोडा सा शर्माते हैं और फिर पीछे हट जाते हैं.

ख़ासतौर पर मुझे तो थोड़ा अजीब सा लगा जब मैरीकॉम के हारने के बाद उनके पिता दुखी होकर घर की रसोई में जाकर चुप-चाप बैठ गए थे और दोनों बच्चे मैरीकॉम के ड्राईंग रूम में अजनबियों से एक आस लिए टीवी स्क्रीन की तरफ निहार रहे थे कि शायद उनकी मां दोबारा पर्दे पर दिखा जाएँ.

आस और संकल्प

ट्रेनिंग और नियमित प्रैक्टिस के चलते दूर रहने के कारण मैरीकॉम के साथ-साथ बच्चों की दाद भी देनी ही होगी.

लेकिन अब कम से कम मुझे लगता है कि साल भर के भीतर ही अपने एक सफल करियर का आकलन करने की ज़रुरत आ पड़ेगी खुद मैरीकॉम को भी.

मैरी कॉम के बॉक्सिंग अकादमी के बच्चे भी बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहे हैं.

आखिरकार पांच फुट दो इंच वाली भारत की सबसे सफल बॉक्सर के कन्धों पर देश में और बेहतरीन महिला बॉक्सरों को बढ़ावा और ट्रेनिंग देने की भी तो ज़िम्मेदारी है.

मैरीकॉम अपने घर समेत मणिपुर में कुल तीन बॉक्सिंग ट्रेनिंग के प्रोग्राम चलातीं है जिनमे ज़्यादातर ऐसे बच्चे हैं जो सीधे अपने-अपने स्कूल से वहीँ पहुँचते हैं और बेसब्री से घंटों होने वाली प्रैक्टिस का इंतज़ार करते हैं. मन में एक आस और संकल्प लिए.

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