मैडल पाने की ललक...है कोई ब्रह्मास्त्र ?

 शुक्रवार, 17 अगस्त, 2012 को 10:59 IST तक के समाचार

ब्रिटेन की साइकलिंग टीम ने लंदन ओलंपिक में कई मेडल जीते. इस टीम को खेल के प्रशिक्षण के लिहाज़ से कई खेल विशेषज्ञ आदर्श टीम मानते हैं.

भरपूर मेहनत, आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण के अलावा टीम की तैयारियों पर बहुत बारीकी से नजर रखी गई थी, जैसे खिलाड़ियों के हाथ साफ हों ताकि वो बीमारियों से बचे और ओलंपिक प्रतियोगिता में भी उनके तकिए वही हों, जिन पर वो हमेशा सोते हैं.

ब्रिटेन ने लंदन ओलंपिक के लिए लंबे समय से तैयारी की थी और उसने पदक तालिका में भी रूस जैसे देश को पीछे छोड़ते हुए 29 स्वर्ण पदकों समेत 65 पदकों के साथ तीसरा स्थान हासिल किया.

लंदन में प्रदर्शन

देवेंद्रो सिंह - मुक्केबाज़ी - क्वार्टरफाइनल में

जॉयदीप कर्माकर - निशानेबाज़ी - चौथा स्थान

टी इरफान - 20 किमी. वॉक - 10वां स्थान

वहीं भारत को लंदन ओलंपिक में छह पदक मिले. अगर पदकों की संख्या की बात की जाए तो भारत के लिए ये सफलतम ओलंपिक है लेकिन लगभग एक अरब बीस करोड़ लोगों के देश में सिर्फ छह पदक आना, इसे संतोषजनक प्रदर्शन माना जाए?

मेडल नहीं, लेकिन उम्मीदें बढ़ी

पदकों से इतर बात करें तो भारत के कुछ युवा खिलाड़ियों ने पुरजोर कोशिश की. मेडल की दौड़ में भी रहे लेकिन आखिरी बाज़ी में पिछड़ गए. बीस-बाईस साल की उम्र के ये वो युवा खिलाड़ी हैं जिन्हें लंदन में तो पदक नहीं मिले लेकिन इनसे 2016 के ब्राज़ील में होने वाले ओलंपिक में पदक की उम्मीद की जा सकती है.

देवेंद्रो

देवेंद्रो उन खिलाड़ियों में शामिल हैं जो उम्मीद जगाते हैं.

इस सूची में जिन खिलाड़ियों का नाम लिया जा सकता है वो हैं मुक्केबाज़ देवेंद्रो सिंह, रोवर स्वरण सिंह, धाविका टिंकू लूका और निशानेबाज़ जॉयदीप कर्माकर.

लेकिन भारत में खेल की युवा प्रतिभाओं का गुमनामी में खो जाना आम बात है. ऐसे में किस तरह की ट्रेनिंग, सुविधा और सहायता इन खिलाड़ियों को दी जाए ताकि ये ब्राज़ील में स्वर्ण पर निशाना लगा सके?

ये जानने के लिए बीबीसी ने बात की देश और दुनिया के कुछ नामी गिरामी कोच और ट्रेनर से.

टेरी क्रॉफोर्ड यूएस एथलेटिक्स फेडेरशन की कोचिंग निदेशक हैं. वो वर्ष 1988 की ओलंपिक में अमरीका की ट्रैक एंड फील्ड कोच भी रही हैं.

"भारत 2024 तक ओलंपिक के पहले पांच देशों में शुमार हो सकता है. आपको करना ये है कि इन मेडलिस्ट के अलावा जो खिलाड़ी क्वॉर्टरफाइनल में पंहुचे, उन पर खास ध्यान दिया जाए. सबसे ज्यादा जरूरी चीज़ एक खास सिस्टम बनाया जाए जिसमें इन खिलाड़ियों को ट्रेनिंग मिले. सिर्फ पांच और दस प्रतिशत बेहतरी करेंगे तो नतीजा आएगा."

हीथ मैथ्यूज, ट्रेनर

क्रॉफोर्ड का कहना है कि ये खिलाड़ी 20 साल की उम्र के पार हैं और अब सिर्फ विदेश में ट्रेनिंग देने से भर से बहुत बड़ा असर नहीं आ जाएगा.

क्रॉफोर्ड ने इमेल के जरिए बीबीसी को बताया, "सबसे पहले ज़रूरत एक विस्तृत योजना बनाने की है कि इन्हें किस तरह ट्रेनिंग दी जाएगी. इसके बाद ये बात सुनिश्चित करनी होगी कि इन एथलीटों को मंझे हुए कोच प्रशिक्षण दे. लेकिन सबसे जरूरी चीज है खुद उन एथलीटों को खेल के लिए कुर्बानियां देने के लिए तैयार रहना."

प्रेरक टीम

इंग्लैंड की साइकलिंग टीम ने लंदन ओलंपिक में मेडल जीते. टीम के प्रदर्शन निदेशक डेव ब्रेल्सफोर्ड ने ऐसी ट्रेनिंग विकसित की जिसमें खेल और खिलाड़ियों के हर क्षेत्र में सिर्फ एक या दो प्रतिशत का सुधार किया जाए तो आखिरकार बेहतरीन नतीजा मिलता है.

लंदन में कर्माकर मेडल लेने से महज़ एक कदम दूर रह गए थे.

इसी प्रक्रिया के तहत तकिया जैसी छोटी छोटी चीजों का भी ध्यान रखा गया.

लेकिन अगर भारतीय तैयारियों की बात करे तो यहां प्रदर्शन को सुधारने के लिए प्रदर्शन निदेशक जैसा कोई पद ही नहीं होता है.

इसके अलावा खेल के विशेषज्ञ मानते हैं कि उस सत्र तक पंहुचने के लिए भारतीयों को 1-2 प्रतिशत सुधार नहीं बल्कि पांच से दस प्रतिशत सुधार की ज़रूरत है.

ट्रेनर हीथ मैथ्यूज़ कि गिनती दुनिया के मशहूर शारीरिक प्रशिक्षकों में होती है. उन्होंने भारत में सानिया मिर्ज़ा और विजेंदर सिंह की फिटनेस पर काम किया है.

मैथ्यूज़ का कहना है कि "मेरा मानना है कि साल 2024 तक भारत ओलंपिक के पहले पांच देशों में शुमार हो सकता है. आपको करना ये है कि इन मेडलिस्ट के अलावा जो खिलाड़ी क्वॉर्टरफाइनल में पंहुचे, उन पर खास ध्यान दिया जाए. सबसे ज्यादा जरूरी चीज़ एक खास सिस्टम बनाया जाए जिसमें इन खिलाड़ियों को ट्रेनिंग मिले. सिर्फ पांच और दस प्रतिशत बेहतरी करेंगे तो नतीजा आएगा."

मैथ्यूज़ कहते हैं कि जिन बातों पर सुधार की ज़रूरत है वो हैं "बुनियादी ढांचा, कोचिंग, आधुनिक उपकरण, स्पोर्ट्स मेडिसिन और विदेशों की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना."

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