मछली फँस गई, चूल्हा जलेगा !

कोलंबो में समंदर के किनारे पर मछुआरे

कोलंबो शहर में घूमने भर की देर थी, सो मैंने गुरूवार को पैदल निकलने की ठानी.

जहाँ पर मैं इन दिनों रुका हूँ, उसके एक-दो किलोमीटर को दूरी पर ही समुद्र का किनारा है. सोचा उधर चला जाए.

दिन का समय था और किनारा एकदम वीरान सा पड़ा था. अचानक दिखा एक किनारे पर तीन लोग कुछ एक तरह सी पोशाक पहने अपनी-अपनी फिशिंग-रॉड्स के साथ मछली पकड़ रहे हैं.

पास पहुँचने पर तस्वीर और साफ हुई. ये तीनों लोग गहरे दोस्त हैं. करीब दो साल पहले तक अर्जुना, थिरुपेरा और मंजुला मिल कर एक किराने की छोटी सी दुकान चलाते थे कोलंबो की किरुला रोड के पास में.

मछलियों से चलती जिंदगी

लेकिन सुपरमार्केट्स के आने के साथ ही धीरे-धीरे इनका व्यापार ठप होता चल गया और एक ऐसा समय आया जब तीनों महीनों तक बिना किसी कमाई के रहे.

नौकरी करने का विकल्प नहीं था, क्योंकि इनमें से किसी ने ज़्यादा पढाई नहीं की थी. उसके बाद से इन्होंने एक दूसरे को ढांढ़स बंधाया और तय किया कि मछली पकड़ने का काम शुरू करेंगे.

पूँजी के अभाव में पड़े पैमाने पर तो ये काम कर नहीं सकते थे, सो छोटे स्तर पर ही शुरुआत कर दी.

आज आलम ये है कि तीनों सुबह से शाम तक समुद्र किनारे बैठ कर मछली पकड़ते हैं और जैसे ही इनके झोले में कुछ मछलियाँ हो जाती है तुरंत उन्हें आसपास के महंगे रिहायशी इलाके में बेचने निकल जाते हैं.

दर्द

Image caption मछलियों से चलती है इनकी जिंदगी.

लेकिन मछली पकड़ने का ये काम उतना आसान नहीं है जितना दिखता है. इनमे से मंजुला से मेरी टूटी-फूटी अंग्रेजी में बात हुई तो उन्होंने बताया कि इस काम में हर दिन किस्मत चाहिए, जो कभी बहुत खराब और यदा-कदा अच्छी होती है.

उन्होंने बताया, "पिछले हफ्ते तो मैं इस बुरे दौर से गुज़रा कि पूछिए मत. एक तो बारिश में घंटो काँटा डाल कर बैठे रहना, उस पर दो दिन तक एक भी मछली नहीं मिली. तीन में दो बच्चे सरकारी स्कूल जाते हैं. वहां की सस्ती फीस के लिए भी पैसे जुटाने दूभर हो गए. उस पर से छोटी बेटी बीमार भी थी."

मंजुला और थिरुपेरा से बात कर के ये भी समझ में आया कि कोलंबो एक बेहद खूबसूरत शहर होने के साथ-साथ एक ख़ासा महंगा शहर भी है. खाने-पीने की चीज़ें तो महँगी है हीं, रहने के ठिकाने में सस्ते में नहीं हैं.

मंजुला ने बताया, "समझ लीजिए जिस दिन एक खूबसूरत सी और भारी सी मछली मिल जाती है, उस दिन पांच सौ रुपए की कमाई तो पक्की हो जाती है.

कभी कभी तीन-चार ऐसी मछलियाँ मिल जाती हैं. लेकिन जिस दिन नहीं मिली उस दिन एक रुपए की भी कमाई नहीं. घर लौटता हूँ तो सबको आस रहती है. मेरी शक्ल देखते रहते हैं."

इन तीनों से बात कर के होटल की तरफ वापस लौट रहा था और मन में ख़्याल यही था कि समय भी इंसान को कहाँ से कहाँ तक पहुंचा देता है.

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