क्या टेस्ट सिरीज़ में भारत का पलड़ा भारी रहेगा?

  • 14 नवंबर 2012

अस्सी के दशक में जब अपने पहले टेस्ट मैच में लेग स्पिनर नरेंद्र हिरवानी ने 16 विकेट लेकर वेस्ट इंडीज़ की टीम को धूल चटाई थी तब विवियन रिचर्ड्स ने भारतीय टीम से कहा था, "वेस्ट इंडीज़ आइए तो आपको दिखा दूंगा!"

हालांकि पिछले साल इंग्लैंड से 4-0 से हारने के बाद किसी भारतीय खिलाड़ी ने सबके सामने इंग्लैंड से ऐसा नहीं कहा होगा लेकिन मन ही मन कई भारतीय खिलाड़ियों ने कहा होगा 'भारत आइए फिर बताते हैं'.

इस हौसले के कई कारण भी है.

भारतीय टीम ने अपने घर में पिछले 12 साल में सिर्फ दो सिरीज़ गंवाई है. उसके अलावा इंग्लैंड के खिलाफ़ 1984-85 से भारत ने 11 मैचों में छह जीत दर्ज की है और सिर्फ एक मैच में हार मिली है.

इंग्लैंड का आत्मविश्वास

लेकिन इंग्लैंड की टीम भी आत्मविश्वास से भरी होगी.

भारतीय बल्लेबाज़ी परिवर्तन के दौर से गुज़र रही है और गेंदबाज़ी भी पूरी लय में नहीं है. अगर टर्निंग पिच बनाई जाती है तो ग्रैम स्वैन के रूप में इंग्लैंड के पास बेहतरीन स्पिनर भी है.

लेकिन स्टूअर्ट ब्रॉड और स्टीव फिन के घायल होने से इंग्लैंड पहले टेस्ट में अपनी पूरी क्षमता से एक कदम पीछे होगा.

इस सिरीज़ में दो तरीके अपनाए जा सकते हैं. एक तो ये कि जल्दी ही मैच पर पकड़ बनाई जाए और फिर पूरी सिरीज़ में विपक्षी टीम को उठने का मौका न दिया जाए.

दूसरा तरीका है विपक्षी टीम के फॉर्म और लय को पहले समझा जाए और उसके बाद अपने पत्ते खोले जाए. यानी पहली कोशिश ये हो कि मैच हारने की स्थिति से बचा जाए और वहां से लगातार मज़बूत हालत में पंहुचा जाए.

दोनों टीम कौन सा तरीका अपनाती है ये उनके कप्तानों पर निर्भर करेगा.

आक्रामक होंगे कप्तान?

1981-82 की सिरीज़ में जब सुनील गावसकर ने मुंबई में पहला टेस्ट जीता था तो उन्हें लगा कि यही काफी है और उसके बाद भारतीय टीम मैच न हारने के लिए खेली और सिरीज़ के अगले पांच टेस्ट ड्रॉ हो गए. ये एक बेहद उबाऊ सिरीज़ के रूप में याद की जाती है.

महेंद्र सिंह धोनी की छवि एक आकरामक कप्तान की है लेकिन घरेलू सिरीज़ में उन्होंने दिखाया है कि वो रक्षात्मक हो जाते हैं और कई बार तो नकारात्मक रणनीति भी अपनाने लगते हैं. खासकर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड से मिली पिछले साल की हार ने उन्हं और ज्यादा रक्षात्मक बना दिया है.

धोनी को पता है कि बिना राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्षमण के मध्य कर्म कमज़ोर नज़र आती हहै.

हालांकि इस डिपारटमेंट में टीम को निराट कोहली और चेतेश्वर पुजारा से बढ़िया खेल हाल के दनों में देखने को मिला है.

Image caption ग्रेम स्वान की फिरकी गेंदबाज़ी भारतीय टीम पर भारी पड़ सकती है

लेकिन भारत की असली कमज़ोरी गेंदबाज़ी में है.

इसका आसार बहुत कम है कि पहले टेस्ट में धोनी तीन स्पिनरों के साथ खेलने का दुस्साहसिक फैसला करेंगे. ज़हीर खान की फिटनेस को देखते हुए उन्हें खिलाना भी एक जुआ साबित हो सकता है.

वहीं इंग्लैंड के कप्तान एलेस्टर कुक ने स्पष्ट कर दिया है कि वो किसी भी खिलाड़ी को तब तक नहीं चुनेंगे जब तक वो शत प्रतिशत फिट न हो.

पीटरसन की वापसी

केविन पीटरसन की वापसी से भी कुक का आत्मविश्वास बढ़ा होगा. पीटरसन दोनों ही टीमों में सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ नज़र आते हैं और सिरीज़ में वड़ी भूमिका निभा सकते हैं.

खासकर स्पिनरों पर वो भारी पड़ सकते है अगर वो युवराज सिंह या प्रज्ञान ओझा के बाएं हाथ की गेंदबाज़ी का शिकार न हो तो.

पिछली बार जब इंग्लैंड ने भारत में सिरीज़ पर कब्ज़ा किया था तब स्पिनरों और तेज़ गेंदबाज़ों को बराबर विकेट मिले थे जबकि वो विकेट भी स्पिन गेंदबाज़ी की मदद के लिए बनाए गए थे.

अगर दोनों ही कप्तान रक्षात्मक नीति न अपनाए और आक्रामक क्रिकेट खेले तो ये सिरीज़ बेहद रोचक हो सकती है.

इंग्लैंड की टीम फॉर्म में है और वो भारतीय टीम पर भारी लग सकती है.

लेकिन दूसरे खेलों की तरह क्रिकेट में भी घर में खेलने का फायदा खूब मिलता है.

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