भारतीय टीम को हारने की लत क्यों लगी?

भारतीय टीम
Image caption भारतीय टीम में कई खिलाड़ी आए, लेकिन प्रदर्शन निराशाजनक रहा

फिर वही कहानी. एक और सिरीज़ हार. भारतीय टीम को क्या हो गया है? अपनी ज़मीन पर भी टीम की क्यों दुर्गति हो रही है? टेस्ट तो टेस्ट वनडे में भी क्यों पिट रही है भारतीय टीम?

ऐसे और भी कई सवाल हैं, जो भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के दिमाग़ में चक्करघिन्नी की तरह घूम रहे हैं. सवाल कई हैं, लेकिन जवाब इतना आसान है नहीं.

वर्ष 2011 में जब भारत ने अपनी धरती पर विश्व कप जीता था, तो लगा जैसे भारतीय टीम दिग्विजय हो गई है, उससे पार पाना संभव नहीं. बल्लेबाज़ी में बड़े नाम, तेज़ गेंदबाज़ी में भी अपेक्षाकृत अच्छे नाम और स्पिन के तो किंग.

लेकिन पिछले कुछ समय से टीम ने पता नहीं कौन सी घुट्टी पी रखी है कि जीत से टीम का अलगाव होता दिख रहा है.

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ अपनी धरती पर टेस्ट सिरीज़ हारे, तो सवाल उठे कि सीनियर खिलाड़ी टीम का बंटाधार कर रहे हैं, युवा खिलाड़ियों को मौक़ा दिए जाने की ज़रूरत है.

चलिए टी-20 और वनडे में कई युवा खिलाड़ियों को मौक़ा दिया गया, लेकिन नतीजा वही. अब तो सचिन तेंदुलकर ने भी संन्यास ले लिया है.

आईपीएल प्रभाव

Image caption आईपीएल का असर टीम पर स्पष्ट रूप से दिख रहा है

दरअसल सारी समस्याओं की जड़ है प्रतिभाओं का सही इस्तेमाल और फिर उन्हें उभारने की बीसीसीआई की ग़लत नीति.

आप लाख कहो लेकिन इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) ने भारतीय क्रिकेट में ऐसा जिन्न लाकर खड़ा कर दिया है, जो प्रतिभाओं को समय रहते निगल रहा है.

आईपीएल की कमाई और चौके-छक्के लगाने की ऐसी होड़ लगी है कि क्रिकेट की बारीकियाँ खिलाड़ी भूलने लगे हैं. अब घरेलू क्रिकेट में प्रदर्शन से ज़्यादा आईपीएल में प्रदर्शन को ज़्यादा मान्यता मिल रही है.

इस कारण आईपीएल के एक-दो मैचों में चौके-छक्के लगाने या फिर विकेट लेने वाले खिलाड़ियों को सीधे राष्ट्रीय टीम में मौक़े मिल रहे हैं.

फिर जब इन खिलाड़ियों का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अच्छा नहीं रहता तो उन्हें टीम से बाहर होना पड़ता है. इससे भारतीय क्रिकेट पर दोहरी मार पड़ रही है. एक तो प्रतिभाशाली क्रिकेटर का समय रहते करियर पर सवाल और दूसरे नए सिरे से प्रतिभा की खोज में वही पुराना रास्ता अपनाने को बेताब बोर्ड.

वीवीएस लक्ष्मण, सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड़ ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया और सचिन तेंदुलकर ने भी वनडे को अलविदा कह दिया है.

सवाल ये है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने इनकी जगह किस खिलाड़ी को तैयार किया है. इसका जवाब है किसी को नहीं. टीम में खिलाड़ी आते-जाते रह रहे हैं. किसी को भी टीम में स्थायी जगह नहीं मिल पाई है.

आईपीएल के नशे में बोर्ड कई ऐसी नवजात प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के पटल पर ले आया, जो असमय ही गुम हो गए.

गेंदबाज़ी का भी कमोबेश यही हाल रहा. ज़हीर ख़ान के कंधे पर काफ़ी दिन तेज़ गेंदबाज़ी की कमान रही और उनके जोड़ीदार इतने बने कि नाम गिनाना मुश्किल है.

स्पिन में तो दुर्गति चिंता का विषय है. स्पिन का अगुआ रहे भारत को इंग्लैंड की टीम ने टेस्ट सिरीज़ में कैसे पटखनी दी, वो सबने देखा. यहाँ भी बढ़िया स्पिनरों की तिकड़ी अब सपने जैसा प्रतीत होता है.

पिछले कुछ समय से महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी पर भी ख़ूब सवाल उठे हैं. लेकिन मसला ये है कि बोर्ड ने किसी खिलाड़ी को इस लायक तैयार ही नहीं किया है, जो धोनी की जगह ले सके.

कुछ दिन पहले सुनील गावसकर ने विराट कोहली का नाम लिया, लेकिन पिछले कुछ समय से उनका प्रदर्शन काफ़ी निराशाजनक रहा है. वीरेंदर सहवाग में कप्तान की काबिलियत काफ़ी कम है और गंभीर ख़ुद के प्रदर्शन से जूझ रहे हैं.

समस्या

Image caption कोच फ्लेचर पर भी कई सवाल उठे हैं

यानी कप्तानी के मोर्चे पर भी भारतीय टीम में खिलाड़ियों की कमी है. कहने को तो आप प्रयोग के लिए किसी को कप्तान बना दें, लेकिन वो लंबे दौर के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

कोच की बात करें, तो वर्षों बाद भारतीय टीम को ऐसा कोच मिला है, जिसे अच्छे या बुरे किसी भी वजह से सुर्ख़ियाँ नहीं मिल रही हैं. भारतीय टीम डंकन फ्लेचर के कारण कुछ नया कर पा रही है, ऐसा बिल्कुल नहीं लगता.

यहाँ भी विदेशी कोच को लेकर बीसीसीआई की ज़िद समझ से परे है. भारत को कप्तान के साथ-साथ ऐसे कोच की भी आवश्यकता है, जो कड़े फ़ैसले कर सके. भले ही शुरुआत में उसका फल नहीं मिले. लेकिन अगर फ़ैसला सही हुआ, तो देर-सबेर नतीजा तो निकलेगा ही.

पाकिस्तान के खिलाफ सिरीज़ में मिली हार इन सब समस्याओं का नतीजा है. हो सकता है भारत की टीम इन समस्याओं के रहते एकाध मैच जीत जाए या फिर किसी सिरीज़ में विजय हासिल कर ले.

लेकिन असली समस्या का हल नहीं निकला, तो लंबी दौड़ में टीम बाक़ी टीमों से काफ़ी पिछड़ सकती है.

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