आईपीएल में फिक्सिंग- आसान या मुश्किल?

  • 16 मई 2013
श्रीसंत
Image caption श्रीसंत सहित तीन खिलाड़ियों पर स्पॉट फिक्सिंग के आरोप लगे हैं

आईपीएल में जो कथित स्पॉट फिक्सिंग का मामला सामने आया है उस पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस टूर्नामेंट का एकमात्र मकसद ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाना है.

पिछले छह सालों से आईपीएल का आयोजन हो रहा है और हर साल कुछ न कुछ विवाद जरूर होता है. इसमें काला धन लगा हुआ है. इनमें से एक टीम के मालिक तो ऐसे हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने लोगों का पैसा वापस देने को कहा है.

इन महाशय ने 1700 करोड़ रूपए में टीम खरीदी है और उन पर फेमा के उल्लंघन के भी आरोप हैं. ऐसे माहौल में स्पॉट फिक्सिंग की बात सामने आना आश्चर्यजनक बात नहीं है.

आईपीएल ऐसा फार्मट है जिसमें फिक्सिंग और स्पॉट फिक्सिंग की गुंजाइश रहती है और ये आसान है. इसमें तो बल्लेबाज़ को उल्टे सीधे शॉट खेलने का लाइसेंस मिला है. वो फुल टॉस पर आउट हो सकता है और इसी तरह की गेंद पर छक्का मार सकता है.

पैसा

मुझे समझ में नहीं आता है कि लोग जब पकड़े जाते हैं तभी बवाल क्यों होता है. भारत में जितने भी नामी खिलाड़ी हैं या कमेंटेटर हैं वो बीसीसीआई से वेतन पाते हैं.

ऐसे में अगर कोई ईमानदारी से टिप्पणी करेगा तो बोर्ड उसकी पेंशन बंद कर सकता है. इस टू्र्नामेंट में जिस तरह का माहौल है उसमें कोई भी पाक साफ नहीं रह सकता.

आईपीएल में निगरानी जैसी कोई व्यवस्था नहीं चल सकती है.

मालिकों और खिलाड़ियों का यही एकमात्र ध्येय है - ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाना. ऐसे में कौन किसकी निगरानी करेगा.

दादागिरी

Image caption आईपीएल में तो बल्लेबाज़ को उल्टे सीधे शॉट खेलने का लाइसेंस मिला है

क्रिकेट की दुनिया में बीसीसीआई का सिक्का चलता है और आईसीसी उसकी गुलाम है.

हाल ही में शिवा रामाकृष्णन को जिस तरह प्लेयर्स बॉडी का प्रतिनिधि बनाया गया वो विश्व क्रिकेट में बीसीसीआई की दादागिरी का प्रमाण है.

क्रिकेट की दुनिया में सारा पैसा भारत से आता है और यही वजह है कि बीसीसीआई एक तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहा है.

क्रिकेट की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण भारतीय बोर्ड का अहंकार है.

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