ज़हीर, गंभीर...कहाँ गए वर्ल्ड कप विजेता टीम के सितारे

सचिन तेंदुलकर

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के बिना भारतीय टीम पहली बार किसी बड़े टूर्नामेंट में उतरी. लेकिन उनकी कमी युवा खिलाड़ियों ने बिलकुल भी महसूस नहीं होने दी. अनुभवी सचिन के बिना भी भारतीय टीम ने चैंपियंस ट्रॉफी में आसानी से जीत हासिल की. सचिन एकदिवसीय मैचों से संन्यास ले चुके हैं.

भारत को तूफानी शुरुआत देने वाले वीरेंद्र सहवाग भी इस टूर्नामेंट में नहीं थे. लेकिन उनकी कमी भी ज़रा भी महसूस नहीं की गई.

भारत के क्रिकेट प्रेमियों को सहवाग की आक्रमक बल्लेबाज़ी की याद शायद ही आई होगी, क्योंकि रोहित शर्मा और शिखर धवन ने चैंपियंस ट्रॉफी के ज़्यादातर मैचों में भारत को शानदार शुरुआत दी.

(सहवाग और शिखर धवन)

सहवाग के साथ भारत को कई मैचों में बेहतरीन शुरुआत देने वाले गौतम गंभीर भी टीम में नहीं थे. विश्व कप 2011 में गंभीर ने शानदार प्रदर्शन किया था और फाइनल मैच में शानदार 97 रन भी बनाए थे. लेकिन पिछले कई समय से फॉर्म में ना होने की वजह से वो चैंपियंस ट्रॉफी में जगह नहीं बना पाए थे. कभी भारतीय टीम का अहम हिस्सा होने वाले गौतम गंभीर की कमी शिखर धवन ने ज़रा भी महसूस नहीं होने दी.

(कोहली और गंभीर की भिड़ंत)

ज़्यादा दिन पुरानी बात नहीं है जब ज़हीर ख़ान को भारतीय तेज़ गेंदबाज़ी आक्रमण की रीढ़ समझा जाता था. और अब बिना ज़हीर के भी भारतीय तेज़ गेंदबाज़ अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. भुवनेश्वर कुमार और ईशांत शर्मा ने चैंपियंस ट्रॉफी में बेहतरीन गेंदबाज़ी कर भारत को चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाई.

बाएँ हाथ के तूफानी बल्लेबाज़ और उपयोगी गेंदबाज़ युवराज सिंह भी टीम में नहीं थे. साल 2011 में हुए क्रिकेट विश्व कप में वो 'मैन ऑफ द टूर्नामेंट' थे. 9 मैचों में 90.50 के औसत से उन्होंने 362 रन बनाए थे.

(युवराज की 'कैंसर से जंग' पर किताब)

कभी उनके बिना वनडे में भारतीय मध्यक्रम की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. लेकिन रवींद्र जडेजा जैसे उभरते सितारे ने इस कदर उनकी कमी को पूरा किया कि दर्शकों और क्रिकेट विशेषज्ञों ने युवराज सिंह की ग़ैर मौजूदगी पर चर्चा तक ना की.

अनिल कुंबले के बाद भारतीय स्पिन गेंदबाज़ी के कर्णधार रहे हरभजन सिंह. टेस्ट मैचों में 400 से ज़्यादा विकेट और वनडे में 250 से ज़्यादा विकेट इनके खाते में हैं. लेकिन बुरे फॉर्म की वजह से टीम में जगह नहीं बना सके.

आर अश्विन और रवींद्र जडेजा जैसे युवा स्पिन गेंदबाज़ों ने इस कदर फिरकी गेंदबाज़ी का मोर्चा संभाला कि हरभजन सिंह की कमी ज़रा भी महसूस नहीं हुई. विशेषज्ञों के मुताबिक़ युवा स्पिनरों के फॉर्म में होने की वजह से हरभजन के लिए अब टीम में जगह बनाना खासा मुश्किल हो गया है.

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