भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों ने 'किया लॉयल्टी टेस्ट'

बीस साल से ज़्यादा वक्त पहले ब्रिटेन की कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता नॉर्मन टेबिट ने बदनाम 'क्रिकेट टेस्ट' का सुझाव दिया था.

लॉस एंजेलेस टाइम्स में उन्होंने कहा कि दक्षिण एशियाई मूल के ब्रितानी नागरिकों से पूछा जाना चाहिए कि वह किस क्रिकेट टीम के समर्थक हैं.

अगर वह इंग्लैंड के बजाय भारत या पाकिस्तान के प्रशंसक हैं तो यह समझा जाना चाहिए कि वह ब्रितानी समाज में घुलने-मिलने में सफल नहीं हो पाए हैं.

एक कट्टर भारतीय प्रशंसक के रूप में बाकियों के साथ मुझे भी इस टिप्पणी पर गुस्सा आया था.

वह यह समझने में नाकाम रहे थे कि हममें से बहुत से लोग जिनके मां-बाप दक्षिण एशिया से ब्रिटेन आए थे उनकी पहचान थोड़ी जटिल थी. हमें ब्रितानी होने पर गर्व था लेकिन इसके साथ ही अपने भारतीय मूल पर भी और क्रिकेट ऐसी जगह थी जहां हम अपनी उस पहचान को दिखा सकते थे.

आदर्श है बोपारा

मुझे याद है कि मेरे पिताजी हर क्रिसमस पर हमें महारानी का भाषण सुनने पर मजबूर करते थे और कहते थे कि कोई भी मेरे परिवार को नहीं बताएगा कि किसका समर्थन करना है.

तो यह देखना मज़ेदार होता कि रविवार को चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में दर्शकों को देखकर लॉर्ड टेबिट ने क्या निष्कर्ष निकाला होता?

स्टेडियम भारतीय प्रशंसकों से भरा हुआ था, जिनमें से ज्यादातर युवा थे और उनका लहजा बर्मिंघम या लंदन का था. कइयों ने भारतीय झंडा लपेटा हुआ था और चिल्ला रहे थे “इंडिया ज़िंदाबाद.” बारिश के दौरान कुछ एक खेल खेलने लगे जिसका नाम था- इंग्लैंड के प्रशंसक को ढूंढो- क्योंकि दर्शकों में मेज़बान टीम के प्रशंसक आसानी से नहीं मिल रहे थे.

Image caption क्रिकेट प्रशंसक वरिष्ठ पत्रकार राहुल टंडन ब्रिटेन में पैदा हुए और पांच साल पहले भारत में बस गए

लेकिन इस मैच से मुझे यह भी लगा कि शायद एक नया क्रिकेट टेस्ट तैयार हो रहा है.

इसका पहला संकेत तब मिला जब इंग्लैंड के रवि बोपरा गेंदबाज़ी करने आए. जैसे ही बॉल करने के लिए दौड़े युवा भारतीयों के एक समूह ने चिल्लाना शुरू कर दिया “गद्दार, गद्दार, गद्दार.”

फिर जब वह बैटिंग करने आए और आउट हो गए तो उनके ख़िलाफ़ नारे लगाने वाले कोने में ख़ुशियाँ मनाने की आवाज़ें आईं.

जब मैं ड्रिंक लेने के लिए लाइन में लगा था तो इंग्लैंड के एक बुजुर्ग प्रशंसक मेरी ओर मुड़े और कहा, “तुम बोपारा के लिए इतनी दिक्कत क्यों पैदा कर रहे हो?”

इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता एक युवा भारतीय प्रशंसक ने जवाब दिया, “क्योंकि वह इंग्लैंड के लिए खेलता है, वह एक कलंक है.”

मैंने इंग्लैंड के उस प्रशंसक को धीरे से कहा कि सभी भारतीय प्रशंसक ऐसा नहीं सोचते हैं. हममें से तो ज़्यादातर मानते हैं कि वह एक बढ़िया आदर्श है और ज़्यादा से ज़्यादा एशियाई खिलाड़ियों को इंग्लैंड की टीम में शामिल होना चाहिए.

बस क्रिकेट देखो

Image caption बॉलिंग करते हुए मॉन्टी पनेसर

मैं वापस आया तो देखा कि इंग्लैंड का एक सिख क्रिकेट प्रशंसक कुछ ही पंक्ति आगे बैठा हुआ था लेकिन वह भारतीय झंडा लिए नहीं था उसने ब्रिटेन की टीशर्ट पहनी हुई थी और उस पर उसके प्रिय खिलाड़ी का नाम लिखा था- मॉन्टी पनेसर.

जब भी इंग्लैंड विकेट लेता वह अपनी सीट पर ख़ुशी से उछल जाता.

भारतीय प्रशंसकों को यह गवारा नहीं हुआ. करीब पांच लोग उसके पास पहुंच गए और चिल्लाने लगे “बिके हुए को ढूंढ़ो.”

सिख प्रशंसक यह सुनकर आगबबूला हो गया और उन पर चिल्लाने लगा, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे बिका हुआ कहने की? मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है और तुम्हें कोई हक नहीं है कि मुझ पर चिल्लाओं सिर्फ़ इसलिए कि मैं इंग्लैंड का समर्थन कर रहा हूं.”

ठीक उसी समय कुछ वेटरों ने आकर मामले को आगे बढ़ने से रोका.

मैच ख़त्म होने के बाद भी उस सिख प्रशंसक का ग़ुस्सा ख़त्म नहीं हुआ था. मैंने उससे भारतीय प्रशंसकों के बर्ताव के लिए माफ़ी मांगी तो उसने कहा कि वे लोग भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ नहीं जानते फिर भी मुझे बिका हुआ कह रहे हैं.

इससे मुझे वह गुस्सा याद आ गया जो टेबिट के क्रिकेट टेस्ट के प्रस्ताव के बाद मुझे महसूस हुआ था.

करीब 20 साल बाद भारतीय प्रशंसकों का एक छोटा सा समूह अपना ही एक टेस्ट ईजाद कर रहा है. अगर आप इंग्लैंड का समर्थन कर रहे हैं तो उनकी नज़रों में आपने अपनी संस्कृति और विरासत से मुंह मोड़ लिया है.

मेरा उन लोगों के लिए जवाब एकदम सीधा है. बस क्रिकेट देखो यार.

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