कैसी थी ऑस्ट्रेलिया की पहली क्रिकेट टीम?

  • 10 जुलाई 2013

ट्रेंट ब्रिज में बुधवार से शुरू हो रहे पहले ऐशेज टेस्ट की तैयारी के लिए ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के क्रिकेटरों को अच्छी ट्रेनिंग और फिजियोथेरेपी से लेकर ऐशो आराम की सारी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं.

लेकिन इंग्लैंड का दौरा करने वाली ऑस्ट्रेलिया की पहली टीम की स्थिति इससे पूरी तरह अलग थी.

माइकल क्लार्कऔर उनकी टीम ऐशेज के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगे हैं तो क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया भी प्रतिष्ठित ऐशेज़ कप को फिर से हासिल करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता है.

ऑस्ट्रेलियाई टीम पहला ऐशेज टेस्ट शुरू होने से क़रीब सात हफ्ते पहले इंग्लैंड पहुंच गई थी. इस दौरे का कार्यक्रम इस तरह से बनाया गया है कि हर मैच शुरू होने से पहले खिलाडी की फिटनेस का स्तर बेहतर हो और मैच के बाद वो फिर से तरोताज़ा हो सकें.

लेकिन इंग्लैंड का दौरा करने वाली पहली ऑस्ट्रेलियाई टीम की परिस्थितियां पूरी तरह भिन्न थीं.

साल 1868 में इंग्लैंड से ऑस्ट्रेलिया गए पूर्व प्रथम श्रेणी क्रिकेटर चार्ल्स लॉरेंस विक्टोरिया से 13 खिलाड़ियों की टीम लेकर ब्रिटेन पहुंचे.

इस टीम में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी शामिल थे. लॉरेंस का मकसद 1859 में आई चार्ल्स डार्विन की किताब ‘ऑन द ऑरिजिन ऑफ़ स्पिसीज़’ में उल्लेखित आकर्षक नस्लों से लोगों में पैदा हुई जिज्ञासा को भुनाना था.

विरोध

विक्टोरिया में मूल निवासियों के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था ने इस दौरे का कड़ा विरोध किया था. संस्था को डर था कि ये खिलाड़ी इंग्लैंड के विपरीत मौसम के अनुरूप खुद को नहीं ढाल पाएंगे. लेकिन इस दौरान इंग्लैंड में अच्छी गर्मी पड़ी और ये दौरा अक्तूबर तक चला.

इससे एक साल पहले ही सिडनी दौरे के दौरान और उसके तुरंत बाद चार खिलाड़ियों की मौत ने भी चिंता को बढ़ा दिया था. इनमें से कम से कम दो खिलाड़ियों की मौत निमोनिया से हुई थी. इस कारण सिडनी दौरा बीच में ही रद्द करना पड़ा था.

यही कारण है कि लॉरेंस छिपाकर खिलाड़ियों को विक्टोरिया से सिडनी लाए. फिर उन्हें एक ऐसे जहाज में सवार किया गया जिस पर ऊन लदा हुआ था. ये जहाज आठ फरवरी 1868 को ब्रिटेन के लिए रवाना हुआ.

Image caption येलानक (जॉनी कजंस) खतरनाक तेज़ गेंदबाज़ थे

इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर और उस दौरे पर लॉर्ड्स ड्रीमिंग नाम की किताब लिखने वाले एशले मैलेट का मानना है कि खिलाड़ियों के साथ जबरदस्ती नहीं की गई थी.

उन्होंने कहा, “खिलाड़ियों को ब्रिटेन में जो सम्मान मिला उससे वे खुश हुए होंगे. ऑस्ट्रेलिया में उस समय मूल निवासियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था. नस्लवाद चरम पर था.”

नाम की समस्या

तीन महीने से अधिक समय समुद्र में गुजारने के बाद टीम आखिर 13 मई को ग्रेवसैंड पहुंची. ये अवधि 2013 के पूरी ऐशेज दौरे से अधिक थी. ब्रिटेन के लोगों के लिए इन खिलाड़ियों का नाम पुकारना आसान नहीं था और यही वजह थी कि हर खिलाड़ी को सहूलियत वाले नाम दिए गए थे.

टाउन मॉलिंग में इन खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. अगले दिन स्पोर्टिंग लाइफ ने लिखा इन खिलाड़ियों ने आलोचक दर्शकों की मंडली को संतुष्ट कर दिया.

रिपोर्ट में कहा गया था, “वे एक अच्छे अभियान पर आए ऑस्ट्रेलिया के पहले मूल निवासी हैं लेकिन इसका ये मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि वे असभ्य हैं.”

ऑस्ट्रेलियाई टीम ने अपना पहला मैच 25 मई 1868 को सरे के ख़िलाफ़ ओवल में खेला था. पहले दिन के खेल को देखने 7000 दर्शक जुटे थे.

ऑस्ट्रेलियाई टीम इस दौरे पर अपने पहले पांच मैच हार गई लेकिन कई खिलाड़ियों ने अपने खेल से विश्लेषकों को काफी प्रभावित किया. जॉनी मुलैग नैसर्गिक प्रतिभा के आलराउंडर थे तो जॉनी कजंस ख़तरनाक तेज़ गेंदबाज़.

Image caption ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की युवा टीम लॉर्ड्स में खेलते हुए

टीम के दूसरे सदस्य क्रिकेट में तो माहिर नहीं थे लेकिन उन्हें दूसरे तरीकों से अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला. अधिकांश मैचों में पहले दो दिन क्रिकेट खेली जाती थी और तीसरे दिन अन्य खेल होते थे.

ब्रिटिश क्रिकेट जगत के कंजरवेटिव सदस्यों ने भी इस दौरे का विरोध किया, लेकिन लॉरेंस इस टीम को लॉर्ड्स में खिलाने को बेकरार थे क्योंकि वे जानते थे कि एमसीसी की मंजूरी मिलने के बाद दूसरे क्लबों से भी उन्हें आकर्षक प्रस्ताव मिलने लगेंगे.

प्रदर्शन

एमसीसी के 1868 के ब्योरे के मुताबिक कमेटी लॉर्ड्स में किसी संभावित मैच के बाद मूल निवासियों के प्रदर्शन के पक्ष में नहीं थी.

आखिरकार मैच पर सहमति बनी और 11-12 जून को मैच खेला गया. ऑस्ट्रेलियाई टीम मैच हार गई लेकिन उसने अपने खेल और व्यवहार से सबको प्रभावित किया. एमसीसी की आशंका के बावजूद दूसरे दिन के खेल की समाप्ति के बाद अन्य खेल आयोजित किए गए.

इसके बाद एमसीसी कमेटी में तीखी नोकझोंक हुई. हालांकि कोषाध्यक्ष ने कहा कि अन्य खेलों के आयोजन से लोग संतुष्ट दिखाई दिए और अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो लोगों को निराशा होती.

लॉरेंस का आकलन सही निकला और लॉर्ड्स के मैच की सफलता के बाद प्रस्तावों की झड़ी लग गई. लेकिन खिलाड़ियों को थकान से बचाने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. देश के अलग-अलग हिस्सों में एक के बाद एक लगातार मैच आयोजित किए गए. टीम ने कुल 126 दिनों में से 99 दिन मैदान में गुजारे.

इस दौरे के बीच में एक दुखद घटना हो गई. टीम से सबसे शानदार क्षेत्ररक्षक किंग कोल लॉर्ड्स मैच के बाद बीमार पड़ गए. उनकी हालत तेज़ी से बिगड़ती गई और 24 जून 1868 को उनकी मौत हो गई. संभवतः उन्हें क्षय रोग और निमोनिया हुआ था.

Image caption गिलेस्पी ऑस्ट्रेलिया की टेस्ट टीम में जगह पाने वाले पहले मूल निवासी थे

मूल निवासियों में घर से दूर मरना अच्छा नहीं माना जाता है. मैलेट को संदेह था कि लॉरेंस ने किंग कोल की मौत के बारे में कुछ समय तक टीम को नहीं बताया था.

मौत

उन्होंने कहा, “मूल निवासियों की संस्कृति में किसी के मरने पर उसके दोस्त और रिश्तेदार कई दिनों तक शोक मनाते हैं और इससे दौरे में व्यवधान पैदा हो सकता था.”

किंग कोल की मौत के बाद टीम के दो सदस्य जिम क्रो और सनडाउन भी बीमार हो गए और दौरा समाप्त होने से एक महीने पहले सितंबर में सिडनी लौट आए.

इस दौरे में टीम ने 14 मैच जीते, इतने ही हारे और 19 ड्रा खेले. मैलेट ने कहा कि आर्थिक रूप से ये दौरा सफल साबित हुआ और कुल 2176 पाउंड का मुनाफा हुआ. लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ऑस्ट्रेलियाई टीम के किसी खिलाड़ी को कोई भुगतान किया गया.

1869 में मूल निवासियों के संरक्षण के लिए कानून बनाए जाने के बाद भविष्य में ऐसा कोई दौरा संभव नहीं हो पाया.

1988 में मूल निवासियों की एक टीम ने ब्रिटेन का दौरा किया. जैसन गिलेस्पी ऑस्ट्रेलिया की टेस्ट टीम में जगह पाने वाले पहले मूल निवासी थे.

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