'वर्ल्ड चैंपियन एथलीट हूं,पर प्रायोजक नहीं'

  • 25 जुलाई 2013

कभी बचपन में घास-फूंस और साधारण लकड़ी से बना जैवलिन लेकर अभ्यास किया करता था. मेरी कामयाबी में मेरे परिवार का बहुत बडा योगदान है.

मैं अपने माता-पिता का आभारी हूं, जिन्होंने मुझे तब पैरा स्पोर्ट्स में जाने की अनुमति दी जब किसी पैरा-खिलाड़ी को मैदान में जाने तक नहीं दिया जाता था.

उस समय उन्होंने मुझे प्रेरणा दी. आज भी उनका सहयोग मुझे मिल रहा है. मेरे दो बडे भाई है और मेरे परिवार में मेरी पत्नी और ढाई साल की बेटी जिया है.

दमदार प्रदर्शन

फ्रांस में आयोजित छठी आईपीएल एथलेटिक्स विश्व चैंम्पियनशिप की भाला फेंक स्पर्धा में एफ 46 वर्ग में 57.04 मीटर की दूरी तक जैवलिन थ्रो कर विश्व रिकार्ड, पैरालम्पिक रिकॉर्ड और विश्व चैम्पियनशिप रिकॉर्ड के साथ विश्व रैंकिग में नंबर एक स्थान हासिल करने की काफी ख़ुशी हो रही है.

ख़ासकर इस कामयाबी तक पहुंचने वाला पहला भारतीय होने की ज़्यादा ख़ुशी है.

इसके लिए मैंने भारत में ही पूरी तैयारी की थी और जर्मनी में आयोजित हुई विश्व क्वालिफाइंग चैंम्पियनशिप में भी पहला स्थान हासिल किया था, जिससे साबित होता है कि मैं विश्व चैंम्पियनशिप में स्वर्ण पदक पाने का भी हक़दार था.

विश्व चैंपियनशिप में चीनी खिलाड़ी के 55.50 मीटर के रिकॉर्ड को जब मैंने तोडा तब मेरे पास जैवलिन थ्रो करने का सिर्फ आखिरी अवसर था, यानी जिस थ्रो पर रिकार्ड बना वह आखिरी थ्रो ही था.

आखिरी दांव से बना इतिहास

हालांकि मेरे पहले पांच थ्रो पर ही स्वर्ण पदक पक्का हो चुका था लेकिन विश्व रिकार्ड बनाने के उद्देश्य से मैंने छठा और आखिरी थ्रो किया और इस आखिरी थ्रो ने मेरी ज़िंदगी का नया अध्याय लिख दिया.

मेरी कामयाबी में वहां के मौसम का भी योगदान रहा. उस समय वहां लगभग 31 डिग्री तापमान था और ऐसी गर्मी में एक रूसी एथलीट अपने सिर पर बर्फ रखकर बार-बार कह रहा था वैरी हॉट डे-वैरी हॉट डे. लेकिन मैं राजस्थान के चुरू ज़िले के निवासी हूं तो मुझे गर्मी से कोई परेशानी नहीं हुई.

2004 के एथेंस पैरा-ओलंपिक का अनुभव का लाभ भी मिला. वहां मैंने गोल्ड जीता था. 1998 के बुसान एशियाड में पहली बार मैं ने पैरा-स्पोर्ट्स में भाग लिया और स्वर्ण पदक जीता.

प्रायोजक की तलाश

ये आयोजन आज भी याद आता है क्योंकि पैरा एशियाई खेलों का आयोजन एशियाई खेलों के लगभग 15 दिनो बाद होना था और हम दिल्ली में ही थे, जहां मेरी मुलाक़ात वहां से लौटने वाले डिस्कस थ्रोअर्स से हुई तो उन्होंने बताया कि बुसान में इस समय काफी ठंड पड रही है जिसकी वजह से ग्रिप बनाने में बेहद मुश्किल होती है.

इसका पता चलने से यह मदद मिली कि मैने उसी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए अभ्यास किया और स्वर्ण पदक जीता और उसी पदक ने मुझमें भविष्य का हौसला भरा.

मैं एक कामयाब एथलीट हूं और इतने मेडल भी जीते हैं लेकिन आज भी मेरे पास प्रायोजक नही हैं और अपना जैवलिन मुझे ख़ुद खरीदना पड़ता है. यही एक बड़ी वजह है जिसके चलते विश्व पैरा स्पोर्टस में भारत इतनी तरक्की नहीं कर रहा है जितनी हो सकती है.

( बीबीसी हिंदी के लिए आदेश कुमार गुप्त से बातचीत पर आधारित)

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