राष्ट्रमंडल खेलः राजनीति के खेल में हारे खिलाड़ी

राष्ट्रमंडल खेलों की बेटन

राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन स्कॉटलैंड के ग्लास्गो शहर में अगले साल 23 जुलाई से तीन अगस्त तक होगा.

इससे पहले इन खेलों को साल 2010 में दिल्ली में आयोजित किया गया था.

भारत के दिल्ली शहर में राष्ट्रमंडल खेलों को यादगार बनाने के लिए क्या कुछ नहीं किया गया.

पुराने स्टेडियमों का नया रूप दिया गया तो कुछ नए स्टेडियम भी बने.

खेलों के दौरान और उसके बाद इसके आयोजन से जुड़े मुद्दे एक बड़े विवाद के रूप में उभरे और सरकार को मजबूर होकर तत्कालीन भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी और महासचिव ललित भनोट के ख़िलाफ मुक़दमा चलाना पड़ा.

फिलहाल लगभग एक साल जेल में बिताने के बाद दोनों ज़मानत पर रिहा है.

इन सबका असर भारतीय खेलों की छवि पर बहुत गहरा पड़ा.

'बिन मां-बाप के बच्चे'

कलमाड़ी और भनोट पर लगाए गए आरोप राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के जीते गए रिकॉर्ड 101 पदकों पर भारी पड़े.

Image caption दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल, 2010 खेलों से ज़्यादा अपने घोटालों के लिए चर्चा में रहे

लेकिन इसके बाद भी भारतीय ओलंपिक संघ के पदाधिकारियों ने कोई सबक़ नहीं सीखा और भारतीय ओलंपिक संघ के चुनावों में अभय सिंह चौटाला को अध्यक्ष और ललित भनोट को महासचिव के रूप में निर्वाचित करवा दिया.

इसे आधार बना कर अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भारत को ओलंपिक संघ से बाहर कर दिया.

अब हालत यह है कि भारतीय एथलीट किसी भी अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारतीय तिरंगे के नीचे प्रदर्शन नहीं कर सकते.

भारतीय ओलंपिक संघ पर पदाधिकारियों के चुनाव में धांधली के आरोप में निलंबित भारतीय ओलंपिक संघ की हालत अब ऐसी हो गई है कि उससे न तो उगलते बन रहा है न ही निगलते.

इसका सीधा-सीधा असर भारतीय खिलाड़ियों के मनोबल और तैयारियों पर पड़ रहा है.

भारतीय ओलंपिक संघ के अलावा इन दिनों संघ के पदाधिकारियों के चुनावों में धांधली के आरोप में भारतीय मुक्केबाज़ी संघ भी निलंबित है.

ऐसे में जबकि ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों की क्वींस बेटन दिल्ली पहुंच रही है तो उसे लेकर खिलाड़ियों में बहुत अधिक जोश नहीं है.

भारतीय ओलंपिक संघ का कामकाज देख रहे कार्यवाहक अध्यक्ष विजय कुमार मल्होत्रा भी पहले ही अंतराष्ट्रीय राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति से इसके सीमित स्वागत कार्यक्रम की घोषणा कर चुके हैं.

Image caption अखिल कुमार भारतीय ओलंपिक संघ के रवैये से बेहद नाराज़ हैं

तिरंगे के बिना किसी भी चैंपियनशिप में उतरने को लेकर मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुके मुक्केबाज़ अखिल कुमार कहते हैं, "यह बिलकुल ऐसा अहसास है जैसे किसी बच्चे के मां-बाप का पता ना हो."

दिखेगा असर

अब दशहरा और दुर्गा पूजा जैसे जोश भरे त्योहारो को देखते हुए राष्ट्रमंडल खेलों की बेटन को लेकर दिल्ली में एथलीटो के दौड़ने के दृश्य देखने को नहीं मिलेंगे, अगर कुछ हुआ भी तो वह संकेतात्मक अधिक होगा.

अखिल कुमार ख़ुद व्यक्तिगत रूप से बेटन के साथ दौड़ने से अधिक महत्वपूर्ण पदक जीतना मानते हैं.

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया कहती हैं, "खिलाड़ियों के जोश पर कल क्या होगा इस बात का तनाव अधिक है. किसी भी एथलीट के लिए इससे पह बहुत सम्मान का पल होता है जब उसके प्रदर्शन के बाद देश का राष्ट्रगान बजता है और तिरंगा लहराता है. अब ऐसा नहीं हो पा रहा है, इससे ज़्यादा दुख की बात भारतीय एथलीटों के लिए क्या होगी."

ग्लास्गो क्वींस बेटन को लेकर भारत के फीके स्वागत को भी वह शर्मनाक ही मानती है.

दरअसल बेटन रिले के माध्यम से किसी भी देश में राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों का पता भी चलता है और खिलाड़ी भी मानसिक रूप से अपना जुडाव महसूस करते हैं.

Image caption डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया क्वींस बेटन के फीके स्वागत को भी ठीक नहीं मानतीं

कृष्णा पूनिया कहती हैं, "दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की ज़बरदस्त तैयारी का असर चीन में हुए एशियाई खेलों में नजर आया जहां भारत ने शानदार प्रदर्शन किया और उसके बाद लंदन ओलंपिक में भी भारत पहली बार अधिक पदक जीतने में कामयाब रहा. अब वैसी तैयारियां नहीं है जिसका असर भविष्य में साफ-साफ दिखेगा."

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को स्वर्ण पदक दिला चुके पहलवान सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त के गुरू पहलवान द्रोणाचार्य सतपाल, जो खुद 1982 के एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता रह चुके हैं, पांच बार मशाल लेकर दौड़ चुके हैं.

पिछली बार राष्ट्रमंडल खेलों की बेटन पकडने वाले आखिरी खिलाड़ी के भी वही थे. उसके बाद बेटन को दिल्ली की मुख्यमंत्री को सौंपा गया था.

भारतीय ओलंपिक संघ के निलंबन को लेकर उन्होंने कहा, "जल्दी से जल्दी इस मामले का हल निकलना चाहिए. अंतराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के झंडे के नीचे अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ी कब तक खेलेंगे?"

भारतीय खिलाड़ी ऐसी स्थिति में फंस गए हैं कि वो न तो खुलकर कुछ बोल सकते हैं और न ही अपनी जीत पर गर्व कर सकते हैं.

राष्ट्रमंडल और एशियाई खेल नज़दीक आ रहे हैं और भारत का खेल मंत्रालय अब भी सिर्फ सारे हालात पर नज़र रख रहा है और खिलाड़ियों की उम्मीद भरी नज़रें उसे देख रही हैं.

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