सचिन तेंदुलकर: हीरो जो बना उभरते भारत का प्रतीक

  • 15 अक्तूबर 2013
सचिन तेंदुलकर

कुछ देर के लिए क्रिकेट को भूल जाइये. सचिन तेंदुलकर का ऐतिहासिक महत्व क्या था?

तेंदुलकर के करियर के दौरान ही भारत एक विश्व शक्ति और आर्थिक ताक़त बना. इसलिए, इतिहास के एक मोड़ से, लिटिल मास्टर सचिन तेंदुलकर पिछले 24 सालों से भारत के उदय का प्रतीक थे. शायद उनकी भूमिका इससे भी ज़्यादा था, उन्होंने भारत के उदय को प्रेरित किया.

खेल जगत में 24 साल एक लंबा वक़्त हैं. अगर आप यह अंदाज़ा लगाना चाहते हैं कि यह कितना लंबा वक्त है तो सचिन के शुरुआती करियर की वीडियो फुटेज देखिए. 1990 में इंग्लैड में लगाया गया उनका पहला शतक इस बात को साबित कर देता है.

टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहेंगे सचिन

माइकल एथर्टन को उस वक़्त अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में आए एक साल हुआ था. उस मैच में वे सचिन को कुछ हल्की लेग स्पिन गेंदें कर रहे हैं. एथर्टन ने 100 टेस्ट मैच खेले और उन्हें रिटायर हुए 12 साल हो गए हैं. वे अब पत्रकारिता और ब्रॉडकास्टिंग की दुनिया में अपनी दूसरी पारी खेल रहे हैं.

स्लिप घेरे से देखने पर डेविड गॉवर झुके हुए से नज़र आ रहे हैं. जिस गेंदबाज़ की गेंद पर तीन रन लेकर सचिन ने अपना यह पहला शतक पूरा किया था उनका नाम एंगस फ्रेज़र था. इन गर्मियों में मैंने उनके साथ एक मैच खेला. पिछले 24 साल में उनका रन अप एक या दो यार्ड कम हो गया है.

'सचिन को अंदाज़ा हो गया था'

सचिन के करियर की लंबाई का एक पैमाना यह है कि 1989 में सचिन जिन वरिष्ठ क्रिकेटरों के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे वे आज उनके युवा प्रतिद्वंदियों से 40 साल ज़्यादा बड़े हैं. लेंब और बॉथम का स्थान बेयरस्टो और रूट ने लिया. लेकिन इस दौरान सचिन तेंदुलकर अपना खेल खेलते रहे.

सचिन के करियर में भारत में आए बदलाव भी कोई कम नहीं है. 1989 में भारतीय अर्थव्यवस्था संरक्षणवाद और अंतर्मुखता में निस्तेज थी. बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ या तो भारत को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर रही थीं या फिर कोशिशें करके नाकाम हो रही थी. उदाहरण के तौर पर कोका कोला 1977 में भारत से पूरी तरह गायब हो गई थी. इस कंपनी ने 1993 में भारत में दोबारा दस्तक दी.

हम तो भूल ही गए हैं कि पिछले बीस सालों के दौरान भारत कितना बदला है. जब मैंने 1990 के दशक में क्रिकेट खेलना शुरु किया था तब वहाँ के एयरपोर्टों की हालत ख़स्ता थी. और अब दुनिया के सबसे अच्छे एयरपोर्टों में से कुछ भारत में हैं.

'सचिन ने दुनिया भर में दिल जीते हैं'

जिस वक़्त भारत की अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा था उसी वक़्त दुनिया सचिन की प्रतिभा को पहचान रही थी. खाड़ी विश्व युद्ध के बाद बढ़ी तेल की कीमतों के कारण दीवालिया हुए भारत को 1991 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आपात राहत पैकेज लेना पड़ा था.

निरादर ने पुनर्जागरण का शंखनाद किया. तत्कालीन वित्त मंत्री मनोहन सिंह को अर्थव्यवस्था सुधारने की ज़िम्मेदारी दी गई थी और उन्होंने विदेशी निवेश के लिए भारत के दरवाज़े खोल दिए.

भारत की आर्थिक क्रांति का वक़्त आते देख मनमोहन सिंह ने विक्टर ह्यूगो के शब्दों में कहा था, 'धरती पर मौजूद कोई शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका वक़्त आ गया हो.'

क्रिकेट के एक युग का अंत

ये सचिन के करियर की शुरुआत की पृष्ठभूमि थी. सचिन ने अपने लिए यह भूमिका तय की या नहीं, लेकिन उभरते हुए भारत के लिए वे एक प्रेरणास्त्रोत बन गए.

क्रिकेट ने भारत को विश्व पटल पर खुद को साबित करने का मौका दिया. वास्तव में, क्रिकेट के इतिहास में कभी भी एक मुल़्क के पास एक साथ वे तीन उपलब्धियाँ नहीं रहीं जो आज भारत के पास हैं. क्रिकेट विश्व कप की ट्रॉफी, सबसे आकर्षक घरेलू लीग और खेल के अंतरराष्ट्रीय प्रशासन में सबसे बड़ी राजनीतिक भूमिका. यहाँ तक की एमसीसी के नायकत्व के दौरान इंग्लिश क्रिकेट के पास भी इनमें से दो ही उपलब्धियाँ थीं.

क्रिकेट घरेलू विकास का एक इंजन भी बन गया है. क्रिकेट के बिना भारत में इतने आकर्षक और जटिल टीवी नेटवर्कों का विकसित होना संभव नहीं था.

जैसा की जेम्स एस्टिल अपनी किताब 'द ग्रेट तमाशा' में बताते हैं कि क्रिकेट ही वो चीज़ है जिसे देखने के भारतीय पैसे देते हैं. साल 2011 में भारतीय विज्ञापनदाताओं ने क्रिकेट कार्यकर्मों के दौरान विज्ञापनों पर तीन अरब डॉलर खर्च लिए. क्रिकेट न सिर्फ भारत के आधुनिकीकरण की झलक दिखाता है बल्कि वास्तव में यह इसका एक बड़ा कारण भी है.

सेंचुरियन में सचिन की वह यादगार पारी

खेलों की दुनिया में महानता सिर्फ प्रतिभा और उपलब्धियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह प्रासंगित भी है. 24 सालों तक सचिन एक अरब लोगों की भावनाओं और तर्कहीन उम्मीदों को लेकर चलते रहे. भारत ने जब 2011 में विश्व कप जीता तो विराट कोहली ने एक गहरे सच को बयाँ करते हुए कहा, "उन्होंने हमारे देश की उम्मीदों के बोझ को पिछले 21 सालों से अपने कंधों पर उठाया है. अब वक़्त आ गया है कि हम उन्हें अपने कंधों पर उठाए."

जोख़िम से दूर रहने वाला तेंदुलकर का व्यक्तित्व भी उन पर डाली गई अपार उम्मीदों के जवाब में ही विकसित हुआ. वे आश्वस्त रूढ़िवादी, चुपचाप रहने वाले, मध्यमवर्गीय और न्यून दर्शित होने के साथ साथ लगातार शानदार बने रहे.

पिछले साल इतिहासकार और क्रिकेट समीक्षक रामचंद्र गुहा 'गांधी के बाद के महानतम भारतीय' को तय करने वाली समिति में शामिल हुए. चयन प्रक्रिया के दो पहलू थे. पहला विशेषज्ञ जूरी का मत और दूसरा ऑनलाइन पोल. जूरी ने सचिन तेंदुलकर को दस शीर्ष भारतीयों में शामिल किया. लेकिन ऑनलाइन पोल इससे भी आगे निकल गया और सचिन को नेहरू से भी महान बता दिया.

सचिन के जीवन के विविध रंग

पीछे मुड़कर देखें तो कामयाबी भी अनिवार्य सी दिखती है. इतनी प्रतिभा के बावजूद तेंदुलकर महानता हासिल किए बिना कैसे रह सकते थे? अथाह सांस्कृतिक समर्थन उनका देश के प्रति निष्ठावान बने रहना निश्चित था. इस तथ्य के बाद, भारत की आर्थिक सफ़लताएं भी भ्रामक रूप से पूर्व निर्धारित लगती हैं. अपने मानव संसाधनों और प्राकृतिक संसाधनों के दम पर भारत का आर्थिक महाशक्ति बनना भी निश्चित था?

लेकिन इतिहास ने हमें इसका एक विपरित उदाहरण भी दिया है. सचिन तेंदुलकर की तरह जो अपने भाग्य को पूरा नहीं कर सका. उसका नाम है विनोद कांबली.

वे कांबली ही थे जिनके साथ सचिन ने आजाद मैदान पर 1988 में 664 रन की नाबाद पारी खेली थी. अपने पहले सात टेस्ट मैचों में कांबली ने चार शतक लगाए थे जिनमें दो दोहरे शतक भी शामिल थे. सचिन और कांबली को स्कूली दिनों के दौरान कोचिंग देने वाले रमाकांत आचरेकर का मानना था कि कांबली ज़्यादा प्रतिभाशाली थे.

कांबली के गायब हो जाने के कारण सचिन के लिए दमदार पूरक हो जाते हैं. कांबली कभी भी अपनी दोहरी कमज़ोरियों पर विजय प्राप्त नहीं कर पाए. ये थीं वर्ल्ड क्लास तेज़ गेंदबाज़ों के ख़िलाफ़ कमज़ोरी और अच्छे जीवन के लिए समान रूप से समस्याग्रस्त कमजोरी.

एक नज़र सचिन के कीर्तिमानों पर

23 साल की उम्र में ही कांबली को टेस्ट क्रिकेट ने नकार दिया और वे कभी वापसी नहीं कर सके. और तेंदुलकर अब संन्यास ले रहे हैं. महानता हमेशा पूर्व निर्धारित नहीं होती. इसे हासिल भी करना पड़ता है.

कामयाबी के लिए भूखे एक राष्ट्र के नायक के रूप में सचिन ने जितना दवाब झेला है शायद ही इतिसाह में कभी किसी खिलाडी़ ने झेला हो. और वे हमेशा इस पर ख़रे उतरते रहे, पूरी निश्चिंतता और सम्मान के साथ.

और इस दौरान उन्होंने हमेशा, हर रूप की क्रिकेट में, भारत के लिए खेलते हुए सौ अंतरराष्ट्रीय शतक भी जमाए.

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