झारखंड की हॉकी हाशिये पर क्यों चली गई?

झारखंड हॉकी

एक ज़माना था जब खेलों की दुनिया में झारखंड की शान हॉकी हुआ करती थी. यहां की मिट्टी से हॉकी का अभी भी गहरा नाता है. लेकिन अब पहले वाले दिन नहीं रहे.

झारखंड में हॉकी की नर्सरी मुरझा रही हैं. भविष्य की चिंता में गांव-देहात से निकले हॉकी खिलाड़ियों के दिल बोझिल हो रहे हैं. 80 और 90 के दशक में जब भारतीय महिला टीम की घोषणा होती थी तो उसमें झारखंड की चार-पांच खिलाड़ी एक साथ शामिल होती थी.

पुरुषों और महिलाओं के वर्ग में झारखंड के कई ऐसे चेहरे चमके जिनकी धाक सालों तक खेल के मैदानों में रही. लेकिन गुज़रते वक्त के साथ-साथ ये सब यादें बनती जा रही हैं. चार साल से भारत की राष्ट्रीय पुरुष टीम में झारखंड से एक ही खिलाड़ी है.

(वो बेचती दारू...)

साल भर से महिला वर्ग में भी यही हालत है. जबकि 2011-12 में भारतीय टीम की कप्तान झारखंड की ही असुंता लकड़ा थीं. उन्होंने दो बार वर्ल्ड कप भी खेले हैं. अभी अंसुता पटियाला में फिटनेस कैंप में शामिल हैं.

असुंता बताती हैं, "गांव, प्रखंड, ज़िला स्तर पर टूर्नामेंट होने चाहिए. इसकी कमी है. खिलाड़ियों को अच्छे मैदान, किट, भोजन की भी ज़रूरत है. अब हॉकी फास्ट हो गई है. एस्ट्रोटर्फ़ पर गेंद तेज़ी से भागती है. अभ्यास के साथ मैच बेहद ज़रूरी हैं."

जबकि झारखंड में हालात ऐसे हैं कि लड़कियां ऊबड़-खाबड़ मैदान में अभ्यास करती हैं. सुदूर गांव, जंगल के युवक-युवतियों का चयन हो भी जाता है तो उन्हें भविष्य की चिंता हमेशा सताती रहती है.

नामचीन खिलाड़ी

अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सावित्री पूर्ति अभी राष्ट्रीय चयन समिति की सदस्य हैं. वे कहती हैं, "80 के दशक में विश्वासी पूर्ति, अलमा गुड़िया, दयामणि सोय, सलोमी भेंगरा, सलोमी पूर्ति, एसमणि सांगा की जोड़ियां जबरदस्त तरीके से जमती थी. इन खिलाड़ियों को भारतीय टीम में जगह मिलती रही."

वो आगे बताती हैं, "बाद में मसीहा सोरेन, एडमिन केरकेट्टा सरीखी खिलाड़ी भी चमकीं. पुरुष वर्ग में भी झारखंड के खिलाड़ियों का परचम लहराता था. लेकिन विमल लकड़ा के बाद पिछले चार साल से कोई खिलाड़ी चोटी पर नहीं पहुंच सका."

(छोटे-छोटे शहरों से...)

ये सवाल कई लोगों के मन में उठता है कि आखिर कहां चूक हो रही है? क्या कमियां रह गई हैं जो झारखंड की हॉकी हाशिये पर जा रही है?

मौजूदा हालात से सावित्री भी चिंतित हैं. वे कहती हैं, "सुविधाएं ठीक ठाक हैं लेकिन कायदे से प्रतिभाओं की तलाश नहीं की जाती. अखबारों में विज्ञापन निकाल दिए जाते हैं कि अमुक दिन खिलाड़ियों का चयन होगा. सुदूर गांवों में हॉकी खेलने वाले बच्चों को इसकी जानकारी नहीं होती. अभाव, गरीबी की वजह से खिलाड़ी शहर नहीं पहुंच पाते."

बातें यहीं खत्म नहीं होतीं. राष्ट्रीय स्तर की कई महिला खिलाड़ी गुमनामी की ज़िंदगी जी रही हैं. खूंटी के माहिल गांव की नौरी मुंडू मामूली पगार पर स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं. नौरी 18 राष्ट्रीय टूर्नामेंट खेल चुकी हैं. उनके पास सर्टिफिकेट की मोटी फाइल हैं. नौकरी की आस में वो सर्टिफिकेट व मेडल दिखती हैं.

रख-रखाव का अभाव

जसमणि तिरू भी राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी हैं. वे खेतों में काम करती हैं. जसमणि ने भी डेढ़ दर्जन राष्ट्रीय टूर्नामेंट खेले हैं. वो कहती हैं, "हालात से समझौता करना पड़ा."

हालात ये हैं कि केंद्र सरकार ने झारखंड में स्थित रांची व गुमला के दोनों एनएसटीसी (नेशनल स्पोर्ट्स टैलेंट्स कंटेस्टैंट्स) सेंटर भी बंद कर दिए हैं. रांची का बरियातू हॉकी सेंटर, सैंट इग्नेशियस स्कूल गुमला, सैंट मेरी स्कूल सिमडेगा, एसएस स्कूल खूंटी के प्रशिक्षण केंद्र हॉकी की नर्सरी हुआ करते थे.

इन जगहों से हमेशा उम्दा खिलाड़ी निकलते थे. अकेले बरियातू प्रशिक्षण केंद्र ने ही देश को 35 से अधिक महिला अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दी हैं. बरियातू प्रशिक्षण केंद्र में अब तक एस्ट्रोटर्फ़ नहीं बिछाया जा सका. खूंटी का एस्ट्रोटर्फ़ मैदान रख-रखाव के अभाव में खराब हो रहा है.

(पुरस्कार राशि लेने से इनकार)

खूंटी एस्ट्रोटर्फ़ मैदान के पांच साल हो गए लेकिन यहां कभी कोई राष्ट्रीय स्तर का मैच नहीं हुआ. अभी सिमडेगा स्थित प्रशिक्षण केंद्र में कोई कोच नहीं हैं. वहां के कोच जगन टोपनो को खूंटी प्रशिक्षण केंद्र का कोच बनाया गया है.

झारखंड के वरिष्ठ खेल पत्रकार अजय कुकरेती कहते हैं, "सरकारी हॉकी प्रशिक्षण केंद्रों का यह हाल है कि खिलाड़ियों को समय पर किट नहीं मिलते. गांवों में जाकर प्रतिभाओं की पहचान नहीं की जाती. रांची, सिमडेगा, खूंटी, चाईबासा, गुमला, लोहरदगा के गांवों में स्कूल स्तर पर खिलाड़ियों को सुविधाएं मिले तो बेहतरीन खिलाड़ी तैयार किए जा सकते हैं."

एस्ट्रोटर्फ़़ की कमी

बरियातू सेंटर की नेहा टोप्पो सीनियर वर्ग की राज्य स्तरीय खिलाड़ी हैं. अपने साथी खिलाड़ियों के साथ सुबह छह बजे से वो अभ्यास कर रही हैं. पसीने से तरबतर लेकिन दमखम में कोई कमी नहीं. गोल दागने के साथ ही हुर्रे की आवाज़ें गूंजती हैं.

नेहा कहती हैं, "अभ्यास के लिए कम से कम एस्ट्रोटर्फ़ होना चाहिए. मैदान में खेलने से जूते और हॉकी स्टिक बहुत जल्दी टूटते हैं. एस्ट्रोटर्फ़ पर खेलने का अनुभव अलग होता है."

(ओलम्पिक संघ पर लटकी तलवार)

बंदगाव के युवक सुरीन बताते हैं, "गांवों और स्कूलों में हॉकी खेली जाती है. लेकिन आगे बढ़ने के मौके नहीं मिलते."

अभी जूनियर स्तर पर झारखंड की कई महिला खिलाड़ी उभरी हैं. लेकिन इनकी संख्या कम ही है.

विपरीत हालात

सीनियर स्तर पर महिला, पुरुष खिलाड़ियों का लगातार टोटा पड़ता जा रहा है. बरियातू सेंटर में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहीं बिरसी मुंडू का हाल ही में अंडर 19 में चयन हुआ है. वो कहती हैं, "झारखंड की लड़कियां विपरीत परिस्थितियों में भी मैदानों में खूब जूझती हैं. लेकिन यह कब तक संभव है?"

लंबे दिनों तक खूंटी के प्रशिक्षक रहे ओलंपियन मनोहर टोपनो को छह महीने पहले मुख्यालय में को-आर्डिनेटर बनाया गया है.

वो बताते हैं, "सुविधाओं की कमी खिलाड़ियों के चमकने में आड़े आ रही है. खिलाड़ी भी जी भर कर मन नहीं लगाते. सच कहूं तो उन्हें मैदान में ही मन लगता है. जबकि उन्हें पंखे, गमले गिनने व रिपोर्ट तैयार करने के काम में लगा दिया गया है."

(महिला हॉकी का गढ़ झारखंड)

पूर्व ओलंपिक खिलाड़ी सिलवानुस डुंगडुंग अभी झारखंड खेल प्राधिकरण के को-ऑर्डिनेटर हैं. वे पहले बरियातू हॉकी प्रशिक्षण केंद्र के कोच थे.

'बांस की स्टिक से हॉकी'

झारखंड में हॉकी की बदहाली के सवाल पर सिलवानुस पल भर के लिए खामोश हो जाते हैं और कहते हैं, "पहले साइकिल, स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि पर प्रशिक्षक खिलाड़ियों का चयन करने गांवों में जाते थे. एक नज़र में प्रतिभाएं पहचान ली जाती थीं. फिर उन्हें गहन अभ्यास से चमकाया जाता था लेकिन अब वो दिन नहीं रहे."

झारखंड हॉकी संघ के अध्यक्ष सुदेश महतो कहते हैं कि झारखंड में हॉकी के खोए गौरव को फिर से हासिल करने के लिए कोशिशें की जा रही हैं. इसी मकसद से पिछले दिनों रांची में जूनियर वर्ग की लड़कियों का नैशनल टूर्नामेंट भी कराया गया था.

खूंटी के स्थानीय पत्रकार अजय शर्मा बताते हैं, "तीन महीने के दरम्यां राज्य के मुख्यमंत्री दो बार खूंटी आए. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ियों को सरकार नौकरी देगी लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ. हॉकी के मैदानों की हालत अच्छी नहीं हैं. गांवों में बच्चे बांस के स्टीक से खेलते हैं."

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