'जी हाँ, मैंने सौरभ गांगुली के साथ क्रिकेट खेला'

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

क्रिकेट की सफ़ेद गेंद दाहिने हाथ में लेकर मैं गेंदबाज़ी के लिए तैयार था. दूसरे छोर पर बल्ला थामे मेरी गेंदें खेलने को तैयार थे भारतीय टीम के पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली.

मेरे जैसे इंसान के लिए ये एक अकल्पनीय क्षण था. सौरभ गांगुली के लिए बोलिंग करने का ख़्वाब तो दूर क्रिकेट में मैं कभी गली-मोहल्ले के स्तर से आगे नहीं बढ़ पाया.

(सौरभ का सपना टूटा)

गली-मोहल्ले में भी विकेट की जगह दीवार पर कोयले से तीन लकीरें खींच कर काम चला लेना या अगर किस्मत अच्छी रही तो आठ-दस ईंटों को एक दूसरे के ऊपर रखकर कुछ न मिले तो कपड़े धोने वाली थापी से ही क्रिकेट खेलने का भरम पाल लेना.

ईमानदारी की बात तो ये है कि क्रिकेट देखना, उसके आँकड़ों पर नज़र रखना, किस खिलाड़ी ने हुक किया, किसने कवर ड्राइव मारा और किसने सैकड़ा लगाया – इस सबमें कभी अपनी दिलचस्पी रही ही नहीं. ऐसे में सौरभ गांगुली के घर के लॉन में उनसे क्रिकेट के गुर सीखना अकल्पनीय ही कहा जा सकता है.

शुरुआत मैंने उनसे बिलकुल बुनियादी सवाल से की, "बल्ला पकड़ा कैसे जाता है?" सौरभ ने एक अच्छे अध्यापक की तरह इत्मीनान से मुझे समझाया कि क्रिकेट का बैट वैसे नहीं पकड़ा जाता जैसे टेनिस का रैकेट पकड़ा जाता है.

'डाइव'

कोलकाता के मध्यवर्गीय मोहल्ले बेकाला में अपने तिमंज़िले लाल मकान के छोटे से लॉन में उन्होंने मेरी गेंदें आहिस्ता से खेलीं. पर जब मेरी बारी आई तो उनकी गेंद पर मैंने कुछ ज़ोर से ही हिट कर दिया और गेंद सीधे ख़रगोशों के बाड़े में जा घुसी. सौरभ गेंद लेने के लिए भागे और कहा, "आपने तो खरगोशों को भगा ही दिया."

(दादा को मनाने में लगे किंग खान)

उन्हें समझ में आ गया कि खिलाड़ी कच्चा है और अधजल गगरी की तरह छलक रहा है, इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि अगर हम कैच करने की प्रैक्टिस करेंगे तो बेहतर होगा. फिर मैंने नज़दीक से गेंदें फेंकनी शुरू कीं और बाएँ हाथ के बल्लेबाज़ ने सधे हुए अंदाज़ में मुझे छकाना शुरू किया.

ठीक उसी तरह जैसे चूहे को पंजे में दबाने के बाद बिल्ली कई बार छोड़ देती है और देखती है कि कहाँ तक भागेगा. सौरभ गांगुली की गेंद लपकने के लिए मैं दमतोड़ कोशिश में लगा था और अचानक उन्होंने मेरी दाहिनी ओर गेंद उछाल दी. मैं गेंद से काफ़ी दूर था मगर एक क्षणांश में मुझे याद आया कि 'डाइव' मारकर इसे कैच किया जा सकता है.

बिना आव-ताव देखे मैंने डाइव लगा दी और गेंद को ज़मीन पर गिरने से पहले अपनी दो उंगलियों में फँसा ही लिया. हालाँकि अगले ही क्षण मैं दाहिने कंधे के बल धरती से जा टकराया पर गेंद को फिर भी मैंने अपने हाथों से छूटने नहीं दिया.

राजनीति

सौरभ गांगुली ने दिलखोल कर मेरे कैच की तारीफ़ की और कहा, "आज का आपका दिन सफल रहा." पर इन दिनों गांगुली की फ़िक्र में क्रिकेट के साथ साथ राजनीति भी शामिल हो गई है. भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें अगला चुनाव लड़ने की दावत दी है. गांगुली ने अभी राजनीति में जाने की संभावना को सिरे से ख़ारिज नहीं किया है.

(गांगुली पर नौ लाख का जुर्माना)

राजनीति में जाने के सवाल पर उन्होंने कहा, "मैंने अभी राजनीति के बारे में कोई फ़ैसला नहीं किया है. ये मेरे लिए बहुत बड़ा फ़ैसला होगा और जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी. अभी मैं इस सवाल का जवाब नहीं दे पाऊँगा."

अलबत्ता बीजेपी की ओर से टिकट की पेशकश के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा था कि सौरभ गांगुली वामपंथी हैं. क्या वाक़ई सौरभ वामपंथी हैं? उन्होंने कहा, "अगर मैं वामपंथी नहीं तो दक्षिणपंथी भी नहीं हूँ. हालाँकि सीताराम येचुरी मेरे अच्छे दोस्त हैं."

गांगुली ने साल 2000 में तब भारतीय क्रिकेट टीम की कमान सँभाली थी जब कई महत्वपूर्ण खिलाड़ी मैच-फ़िक्सिंग के आरोपों में फँसे थे और सचिन तेंदुलकर भी ठीक स्वास्थ्य न होने के कारण कप्तानी छोड़ चुके थे. गांगुली को इस पस्तहिम्मती के दौर में टीम में जोश और जज़्बा भरने के लिए जाना जाता है. उनकी टीम में प्रतिभाशाली खिलाड़ी तो थे लेकिन उन्हें अभी सान पर चढ़ाया जाना बाक़ी था.

लॉर्ड्स का मैदान

गांगुली ने सबसे पहले यही काम किया. उन्होंने कहा, "मैंने इसे बहुत पेचीदा नहीं बनाया. दरअसल हम हिंदुस्तानी आराम पसंद लोग हैं. हम खाली समय का आनंद उठाते हैं, दोस्तों के साथ चाय की चुस्कियाँ लेते हुए गपशप का मज़ा लेते हैं. पर मुझे उस आरामदायक स्थिति से ख़ुद को बाहर निकलना था ताकि अपनी टीम को आगे ले जा सकूँ."

(गांगुली को फिर मिली कप्तानी)

मुझे अचानक एहसास हुआ कि सौरभ गांगुली के दो व्यक्तित्व हैं, एक क्रिकेट के मैदान में उग्र तेवरों वाला सौरभ और दूसरे मैदान के बाहर का सौम्य और शालीन, तनिक शर्मीला-सा नौजवान.

उनके बहुत से प्रशंसकों को याद है वो पल जब इंग्लैंड में क्रिकेट के मक्का कहलाए जाने वाले लॉर्ड्स के मैदान में सौरभ गांगुली नैटवेस्ट सीरीज़ में भारतीय टीम की जीत पर इतने उत्साहित और ख़ुश हुए कि उन्होंने वहीं मैदान में अपनी क़मीज़ उतारकर लहरानी शुरू कर दी. इसके लिए उनकी बहुत आलोचना हुई.

सौरभ आज भी उस क्षण थोड़ा शरारती मुस्कान के साथ याद करते हैं.

उन्होंने कहा, "मुझे नहीं पता था कि हम जीत जाएँगे क्योंकि मैच के बीच में हम 150 पर पाँच विकेट खोकर खेल रहे थे और हमें 325 रनों का पीछा करना था. इस स्थिति के बावजूद हम नैटवेस्ट फ़ाइनल जीत गए. मैं थोड़ा भावुक हो गया और भावनाओं में बह गया. अगर फिर ऐसा मौक़ा आएगा तो शायद मैं वो सब नहीं करूँगा."

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