इंग्लैंड क्रिकेट टीम में होंगे ज़्यादा एशियाई

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इंग्लैंड की फ़ुटबॉल टीम में एशियाई मूल के खिलाड़ियों की कमी पर तो काफी शोर होता रहा है, लेकिन क्रिकेट का क्या हाल है?

इंग्लैंड के लिए सालों से कई एशियाई खिलाड़ी क्रिकेट खेलते रहे हैं, ऐसे में कोई समस्या नज़र तो नहीं आती.

लेकिन इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) का मानना है कि इंग्लैंड के अंदरूनी इलाक़ों में बसे एशियाई समुदाय के लोगों तक पहुंचने और नई प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए काफी कुछ किया जा सकता है.

ईसीबी ने गुरुवार को ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान पर ब्रितानी एशियाई मीडिया के सामने अपनी भावी योजनाओं का खाका पेश किया.

क्लब और संस्कृति

इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइक गेटिंग ने बताया कि बोर्ड क्या चाहता है. गेटिंग फिलहाल ईसीबी के क्रिकेट साझेदारी मामलों के प्रबंध निदेशक हैं.

गेटिंग ने कहा, "हम ब्रिटेन में लंबे समय से रह रहे एशियाई मूल के लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. हम इस संभावना की भी तलाश कर रहे हैं कि उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल ब्रिटेन के क्रिकेट को और समृद्ध बनाने में कैसे किया जा सकता है. हमने क्रिकेट के प्रति एशियाई मूल के युवाओं का जुनून देखा है."

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इंग्लैंड की हर काउंटी में कम से कम एक एशियाई खिलाड़ी ज़रूर है. ताजा जानकारी के मुताबिक यहां एशियाई मूल के एक तिहाई लोग क्रिकेट खेलते हैं. आंकड़ों के लिहाज़ से देखें तो ये अनुपात आपस में मेल नहीं खाता.

गेटिंग के अनुसार एक समस्या यह भी है कि कुछ लोग इंग्लैंड के मान्यता प्राप्त क्रिकेट क्लबों में शामिल ही होना नहीं चाहते.

गेटिंग बताते हैं, "कुछ लोग यहां आने में शरमाते हैं. तो कुछ लोग क्लब में शराब पीने के चलन को अपनी संस्कृति के विरुद्ध मानते हैं. इसी कारण से वे यहां आने से झिझकते हैं. हमें ये देखना होगा कि उनकी मदद कैसे की जा सकती है."

अंदरूनी इलाक़ों का क्रिकेट

ईसीबी मानता है कि नई एशियाई प्रतिभाओं को ढूंढने के लिए देश के अंदरूनी इलाक़ों और स्थानीय पार्कों में खेल रहे खिलाड़ियों पर नज़र रखी जानी चाहिए.

संयोग से ही साल 1980 में पाकिस्तानी मूल के एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी का पता चला था. ब्रिटेन में जन्मे और इंग्लैंड के लिए पेशेवर क्रिकेट खेलने वाले इस पाकिस्तानी खिलाड़ी का नाम वसीम खान है.

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वसीम खान ऐसे पहले ब्रितानी पाकिस्तानी हैं जिन्होंने इंग्लैंड में प्रथम श्रेणी का क्रिकेट खेला. उन्होंने साल 1995 में वार्विकशायर में अपनी पहली पारी खेली थी. आजकल वे 'चांस टू शाइन' नाम की क्रिकेट चैरिटी चलाते हैं.

ऐसे कई प्रमाण मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि क्लब सिस्टम से इतर नई प्रतिभाओं को खोजने के लिए यह तरीक़ा कारगर साबित हो सकता है, जैसे कि मोईन अली. मोईन देश के अंदरूनी इलाक़े में क्रिकेट खेलते थे. वे प्रतिभाशाली क्रिकेट खिलाड़ियों की खोज के अभियान का पहला उदाहरण हैं.

वसीम खान मानते हैं कि इंग्लैंड में ऐसे कई और मोईन अली हैं. वह कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि आने वाले सालों में ऐसी ही कई और छिपी हुई प्रतिभाएं सामने आएंगी."

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