फिर 55 साल इस तरह नहीं खेले भारत-इंग्लैंड

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भारत और इंग्लैंड की टीम 55 सालों बाद पांच क्रिकेट टेस्ट मैचों की सीरीज़ खेलेगी.

कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में इंग्लैंड में पांच टेस्ट मैचों की सीरीज़़ का पहला मैच नौ जुलाई से ट्रेंट ब्रिज में खेला जाएगा.

पांच टेस्ट मैचों की पहली शृंखला साल 1959 में इंग्लैंड में खेली गई थी. इस शृंखला में भारत को 0-5 से करारी हार मिली थी.

भारत साल 2011 में भी इंग्लैंड सीरीज़ 4-0 से हार गया था.

सवाल है कि सचिन तेंदुलकर, द्रविड़, सहवाग, गांगुली और लक्ष्मण जैसे दिग्गज खिलाड़ियों के टीम से निकल जाने के बाद मौजूदा खिलाड़ी क्या ये सीरीज़़ जीत पाएंगे.

भारत के पास चेतेश्वर पुजारा और विराट कोहली जैसे असाधारण प्रतिभा के युवा खिलाड़ी हैं जो अपने दिग्गजों के योग्य उत्तराधिकारी साबित हो सकते हैं.

भारत इंग्लैंड दौरे पर कैसा खेल दिखाएगी, पूरा आकलन आगे पढ़ें.

साल 1959 में जब भारतीय क्रिकेट टीम पांच टेस्ट मैचों की शृंखला के लिए इंग्लैंड दौरे पर गई तब जितना कुछ ग़लत हो सकता था, हुआ.

भारत को इस शृंखला में 0-5 से करारी हार झेलनी पड़ी.

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भारत के सभी बल्लेबाज इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाज फ्रेड ट्रूमैन और ब्रायन स्टैथम के दमदार हमले के सामने पूरी तरह कमज़ोर नज़र आए.

भारत पहला मैच एक पारी से हार गया. तेज़ गेंदबाज ट्रूमैन का सामने करते में स्टार बल्लेबाज चंदू बोर्डे की उंगलियां चोटिल हो गईं और स्पिनर बापू नादकर्णी के हाथ छिल गए.

दूसरा मैच लॉर्ड्स में शुरू हुआ. भारत आठ विकेट से हारा. इस मैच में स्टैंथम स्नॉर्टर की गेंद पर खेलते हुए भारतीय क्रिकेटर नारी कांट्रैक्टर की पसलियों में गंभीर चोट आई.

इसके बाद लीड्स में खेले गए तीसरे मैच में भारत को फिर से एक पारी और 173 रनों से हारना पड़ा.

हार का लगातार सामना कर रहे भारत के लिए चौथे मैच में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के छात्र अब्बास अली बेग राहत बनकर आए.

फिर से वापसी

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अब्बास अली बेग ने इंग्लैंड के खिलाफ खेलते हुए अपने पहले टेस्ट में 112 रन बनाए. हालांकि उनकी दमदार पारी के बावजूद भारत चौथा मैच भी 171 रनों से हार गया.

पांच मैचों की शृंखला ख़त्म होने के बाद आलोचक इस बात पर एकमत थे कि भारत पांच मैचों के एक पूरे दौरे के योग्य नहीं.

अगले पांच दशकों तक भारतीय सीरीज़ तीन या चार टेस्ट मैचों की शृंखला तक ही सीमित रहा. पांच मैचों का दौरा फिर नहीं हुआ.

55 साल

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भारत, इंग्लैंड से पूरे पांच टेस्ट मैचों की शृंखला खेलने के क़ाबिल है ये साबित करने में भारत को पूरे लगभग 55 साल लग गए.

भारत के हिस्से ये गौरव काफी पहले आ जाना चाहिए था. जब उसकी टीम में सचिन तेंदुलकर, द्रविड़, सहवाग जैसे सलामी बल्लेबाज, गांगुली और लक्ष्मण जैसे दिग्गज खिलाड़ी थे.

उन दिग्गजों के जाने के बाद भारतीय टीम ख़ुद को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है. और शायद उससे बेहतर हालात में न हो जो साल 2011 की थी जब भारत चारों टेस्ट हार गया था.

मौसम और गेंदबाजी

हैरत की बात है कि भारतीय टीम के लिए पांच टैस्ट मैचों की शृंखला खेलने का ये पहला अनुभव होगा, यहां तक कि कप्तान धोनी ने भी कभी ऐसी सीरीज़ नहीं खेली है.

जबकि दूसरी ओर इंग्लैंड लगातार ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ पांच टैस्ट मैचों की ऐशेज सीरीज़ खेलता रहा है. इसके अधिकांश खिलाड़ी मैच जानते हैं कि इस तरह के सीरीज़ की क्या ज़रूरते हैं.

भारत पर दबाव

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लेकिन केवल इन्हीं वजहों से भारतीय टीम कमज़ोर नहीं है.

इंग्लैंड की धरती पर भारत का प्रदर्शन कभी कभार ही अच्छा रहा है: भारतीय टीम 1932 से ही इंग्लैंड का दौरा करती रही है. लेकिन केवल तीन बार 1971, 1986 और 2007 में ही उन्हें सफलता हासिल हुई है. इसमें से दो सीरीज़ वह मात्र 1-0 से जीती थी.

स्पिन की ताकत

स्पिन भारतीय गेंदबाजी की ताक़त है. लेकिन मुश्किल ये है कि इंग्लैंड की पिच पर अपना कमाल दिखाना भारतीय स्पिनरों के लिए मुश्किल होगा.

भारत के तेज़ गेंदबाज़ सामान्यत: अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना के नहीं होते हैं.

ये सारी आलोचनाएं 18 सदस्यों वाले भारतीय दल के लिए सही नज़र आती है जो इंग्लैंड के दौरे पर गए हैं.

भारतीय क्रिकेट टीम के सभी सात तेज़ गेंदबाजों लेस्टरशर की टीम के आगे धाराशायी हो गए. जबकि उनके पास टेस्ट स्तर के बैट्समैन भी नहीं हैं.

इतिहास का दुहराव

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तो क्या साल 1959 का इतिहास फिर से दोहराया जाएगा?

मुझे अब भी लगता है कि ऐसा नहीं होगा. इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाजों से निपटने में हमारे बल्लेबाज पुराने खिलाड़ियों की तुलना में बेहतर तकनीक संपन्न है.

भारत के पास चेतेश्वर पुजारा और विराट कोहली जैसी असाधारण प्रतिभा के दो युवा खिलाड़ी हैं जो अपने दिग्गजों के योग्य उत्तराधिकारी साबित हो सकते हैं.

लेकिन लेस्टरशर में एक बार फिर से ये देखने को मिला है कि भारतीय गेंदबाजी इंग्लैंड को एक मैच में दो बार आउट कर पाएंगे. पांच टेस्ट में तो ये 10 बार करने की ज़रूरत पड़ेगी.

भारत की सीरीज़ की विजय की चाह तो एक उम्मीद ही होगी. अगर हमें सम्मानजनक ड्रॉ भी मिले तो वो ख़ुशी मनाने की बात होगी.

शर्ट लहराना

भारत और इंग्लैंड टीम की बात हो तो भारतीयों के सामने वो छवि अभी भी घूमती है जब विजयी भारतीय कप्तान सौरभ गांगुली लॉर्ड्स की बालकोनी में अपनी शर्ट उतारकर उसे हवा में लहराते नज़र आए थे.

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लॉर्ड ऐसा पवेलियन है जहां से कई लोगों को इसलिए वापस भेज दिया गया क्योंकि उन्होंने जैकेट या टाई नहीं पहनी हुई थी.

इस संदर्भ में सौरभ गांगुली ने जो किया वो पुरानी मान्यताओं को तोड़ने की कोशिश जैसा दिखता है.

भारत साल 2011 की इंग्लैंड टेस्ट सीरीज़ हार गया था.

भारतीय क्रिकेट प्रेमी जो अधिक से अधिक उम्मीद कर सकते हैं कि वो अपना पलड़ा बराबर कर ले.

अब धीर गंभीर धोनी से तो ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे सौरभ की तरह अपनी शर्ट हवा में लहराएंगे. लेकिन चहकते चेहरों और हथेलियों के बीच ट्रॉफी के लिए भारतीय टीम के समर्थक ज़रूर प्रार्थना कर सकते हैं.

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