हमें नौकरी दिलवा दो सर

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ये खिलाड़ी भारत के लिए स्वर्ण और रजत पदक लाते हैं. इनकी तस्वीरें अख़बारों के पहले पन्ने पर छपती थीं.

टीवी न्यूज़ चैनल इनके इंटरव्यू के लिए लाइन लगाकर खड़े रहते हैं . और फिर कुछ दिनों बाद लोग इन्हें भूल जाते हैं.

भारत के ज़्यादातर खिलाड़ी ग़रीब घरों से आते हैं. इन खिलाड़ियों के लिए खेल ज़रिया है रोज़ी रोटी कमाने का. ताकि वो इसकी मदद से सरकारी नौकरी हासिल कर सके और कुछ नकद इनाम जीत सकें.

नौकरी की ग़ुज़ारिश !

कॉमनवेल्थ गेम्स में आए एक भारतीय अधिकारी ने मुझे बताया कि उससे एक मैडल जीतने वाली भारतीय एथलीट ने कहा, "सर हमें नौकरी दिलवा दो."

अधिकारी ने उस खिलाड़ी को बताया कि एसोसिएशन उसे सिर्फ़ पैसा दिला सकती है. लेकिन नौकरी के लिए उसे राज्य सरकार से बात करनी पड़ेगी.

मैं उस मैडल विनर का नाम नहीं बताउंगा वर्ना उसका करियर ख़त्म हो सकता है.

दाद देनी होगी इन खिलाड़ियों की जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मुका़बलों में जीत हासिल करते हैं. इन खिलाड़ियों के लिए बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है.

भारत को समर्थन

ग्लासगो में भारतीय पहलवानों और मुक्केबाज़ों को ज़बरदस्त समर्थन मिल रहा है. जब भी वो रिंग में उतरते हैं तो चारों तरफ़ से इंडिया, इंडिया की आवाज़ें आती हैं.

अपने मैच के बाद भारतीय मुक्केबाज़ मनोज कुमार ने अपने चिर-परिचित हरियाणवी लहज़े में कहा, "हां हमें लोगों का सपोर्ट मिलता है. लेकिन अगर रिंग के बाहर लोग मेरे विरोधी का भी नाम ले लेकर चिल्लाएं तो मैं यही मानता हूं कि वो वो मेरे लिए ही चिल्ला रहे हैं और उत्साहित होकर मैं विरोधी पर दनादन मुक्के बरसाने लगता हूं."

बोल्ट का आगमन

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ग्लासगो में मौजूद खेल प्रेमियों का उत्साह उस समय कई गुना बढ़ गया जब छह बार के ओलंपिक चैंपियन धावक उसैन बोल्ट वहां पहुंचे.

बोल्ट 4x100 मीटर रिले हीट में दौड़ेंगे. उनकी दौड़ एक अगस्त को होगी. बोल्ट पैर में लगी चोट से पूरी तरह से उबर चुके हैं. उन्होंने कहा, "मैं यहां दौड़ने आया हूं. मुझे नहीं लगता कि मेरे पास इसके अलावा कोई और वजह थी ग्लासगो आने की. मेरी चोट जा चुकी है और अब मैं पूरी तरह से ठीक हूं."

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