एशियाई खेलः इंचियोन में भारत सा अहसास!

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इंचियोन एशियाई खेलों की शूटिंग रेंज देखने में तो बहुत सुंदर हैं लेकिन वहां पहुंचना और इवेंट के बाद वापस घर या दफ़्तर जाना किसी टारगेट पर निशाना लगाने से कम मुश्किल नहीं है.

यह रेंज एक पहाड़ी को काट कर बनाई गयी है और नीचे सड़क से पहाड़ी पर बनी रेंज का फ़ासला करीब दो किलोमीटर है.

लेकिन रेंज तक निजी गाड़ी या टैक्सी ले जाने की इजाज़त नहीं है.

अधिकारी और वीआईपी तो मज़े से बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठ कर आ जाते हैं.

लेकिन खेल प्रेमियों के लिए कभी कभी शटल चलती है वरना अधिकतर समय लोग पैदल ही जाते हैं.

एक जापानी महिला टूरिस्ट अपने कुछ दोस्तों के साथ शूटिंग के मुकाबले देखने आई थीं लेकिन पैदल चलने के चक्कर में इवेंट मिस करके अधिकारियों को बुरा भला कहकर वापस गईं.

विस्तार से पढ़िए इंचियोन डायरी

खिंचाई से नाराज वालंटियर्स

एशियाई खेलो में करीब 13,000 वालंटियर काम कर रहे हैं.

लेकिन कुछ लोगों का मानना है की वो काम करने से ज़्यादा बिगाड़ रहे हैं.

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कल दो वालंटियर्स ने कोरियाई खिलाडियों की बेसबॉल की ट्रेनिंग में एक बॉल पर एक कोरियाई खिलाडी के ऑटोग्राफ़ ले लिए.

इस पर अधिकारियों ने इन युवा वॉलंटियर्स की खिंचाई कर दी और अभी जब बातचीत चल ही रही थी, एक वॉलंटियर ने खिलाडियों की फोटो ले ली. इस पर खिलाडी भड़क गए.

अब जब बात जंगल की आग की तरह फैल कर, वॉलंटियर्स को पता चली है तो सारे वॉलंटियर कुछ खफ़ा से हैं.

इंचियोन में भारत सा अहसास!

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कम से कम एक भारतीय फ़ोटोग्राफ़र हैं जिन्हें आठ दिन इंचियोन में रहने के बाद कल यह कोरियाई शहर बिलकुल भारत में अपने घर जैसा लगा.

देर रात काम ख़त्म करके जब वो होटल पहुंचे तो देखा की बिजली नदारद थी.

भाषा ना समझने से काफी देर में उनको यह पता चला कि कमरे में बिजली सुबह ही आएगी.

होटल वालों ने इतनी मेहरबानी ज़रूर की उन्हें एक रात के लिए दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया.

दूसरे दिन प्रेस सेंटर में इस भारतीय फ़ोटोग्राफ़र ने बताया की उन्हें ऐसे लगा जैसे वो अपने घर गाज़ियाबाद में रह रहे हैं.

खेल गांव का खाना कैसा है?

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कल भारतीय बॉक्सर शिवा थापा से उनके इवेंट के बाद बात करते हुए भारतीय पत्रकारों ने इंचियोन में चल रहा फेवरट टॉपिक छेड़ते हुए पूछा कि खेल गांव में खाना कैसा है?

थापा ने मुस्कराते हुए कहा, "मुझे तो कोई प्रॉब्लम नहीं है. मैं तो वेट घटा रहा हूं वर्ना प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने के अयोग्य हो जाऊंगा. इसलिए मैं तो कुछ खा ही नहीं रहा.''

अब जर्नलिस्ट को ना तो स्टोरी मिली ना ही ख़ाना.

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