बूट वाले खिलाड़ियों का वो पहला क्लब

इमेज कॉपीरइट Ronny Roy

भारत के सबसे पुराने फ़ुटबॉल क्लब में शुमार मोहम्मडन स्पोर्टिंग माली हालात ख़राब होने के चलते बंद होने के कगार पर पहुंच चुका है.

टीम प्रबंधन ने इसे बंद करने की घोषणा भी कर दी थी, हालाँकि फ़ुटबॉल प्रेमियों के दबाव में अब टीम डूरंड कप फ़ुटबॉल में हिस्सा ले रही है.

लेकिन वित्तीय स्थिति को देखते हुए इसके बंद होने का ख़तरा बना हुआ है.

भारतीय फ़ुटबॉल इतिहास में इस क्लब के महत्व और उसके सफ़र को रेखांकित कर रहे हैं रॉन्जॉय सेन.

मोहम्मडन स्पोर्टिंग का सफ़र

29 अक्टूबर, 1936 को एक स्कॉटिश डेली एक्सप्रेस की एक ख़बर की हेडलाइन थी – "भारतीय जादूगर- नया स्टाइल."

अख़बार के रिपोर्टर ने ये कहानी एक भारतीय फ़ुटबॉलर के बारे में लिखी थी जिसने सेल्टिक क्लब के सामने ज़ोरदार प्रदर्शन किया और अपने कौशल से दर्शकों को सम्मोहित कर डाला था.

ये फ़ुटबॉलर थे सलीम. कोलकाता के मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब ने उस साल लगातार तीसरी बार कलकत्ता फर्स्ट डिवीजन फ़ुटबॉल लीग का ख़िताब जीता था.

इमेज कॉपीरइट Ronny Roy

1934 में मोहम्मडन स्पोर्टिंग ने कलकत्ता लीग का ख़िताब जीता था. 1898 में शुरू हुई एशिया की सबसे पुरानी लीग को जीतने वाला पहला भारतीय क्लब था मोहम्मडन स्पोर्टिंग.

क़रीब 80 साल बाद 20 अक्टूबर 2014 में क्लब को आर्थिक तंगहाली के चलते बंद करने की घोषणा हुई, क्लब अभी बंद नहीं हुआ है, लेकिन बंद होने के कगार पर है.

मोहम्मडन स्पोर्टिंग की शुरुआत 1891 में हुई थी. देश में मुस्लिम लीग के गठन से क़रीब एक दशक पहले.

मुस्लिम समुदाय की पहचान

मोहम्मडन स्पोर्टिंग ने 1934 में कलकत्ता लीग में पहली बार हिस्सा लिया और चैंपियन बन गई. 1936 में क्लब ने लीग के साथ साथ आईएफए शील्ड भी जीती.

इमेज कॉपीरइट Roony Roy

मोहन बगान के बाद आईएफए शील्ड का ख़िताब जीतने वाली मोहम्मडन स्पोर्टिंग दूसरी भारतीय टीम थी.

एक साथ लीग और शील्ड का ख़िताब इससे पहले केवल तीन ब्रितानी टीमों- रायल आयरिश रायफ़ल्स, द गोर्डोन हाईलैंडर्स और कलकत्ता फ़ुटबॉल क्लब को ये उपलब्धि हासिल हुई थी.

मोहम्मडन स्पोर्टिंग की कामयाबी के चलते उनके फ़ैंस का दायरा लगातार बढ़ने लगा था. प्रत्येक मैच को देखने में बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते थे.

अंग्रेजी अख़बार अमृत बाज़ार पत्रिका के मुताबिक प्रत्येक मैच के साथ क्लब की लोकप्रियता बढ़ रही थी.

मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब के दर्शकों में युवाओं के साथ बड़े बुजुर्ग भी शामिल थे. क्लब के फ़ैंस में धर्मगुरू भी शामिल थे.

देश भर में थे फ़ैंस

1935 में कोलकाता फ़ुटबॉल ग्राउंड में मोहम्मडन स्पोर्टिंग ने मोहन बगान को हराया था, तब 60 हज़ार दर्शक जमा हुए थे.

इस जीत के बारे में एक अख़बार ने लिखा था, "आतिशबाज़ी हुई, गुब्बारे और कबूतरों को उड़ाया गया, कोलकाता के मुसलमानों ने रात भर जश्न मनाया."

इमेज कॉपीरइट Roony Roy

मोहम्मडन स्पोर्टिंग की कामयाबी की कुछ वजहें थीं. क्लब ने पहली बार बंगाल से बाहर के खिलाड़ियों को अनुबंधित करना शुरू किया.

टीम में उपमहाद्वीप के सभी मुसलमान खिलाड़ियों के आने से इसे फ़ायदा हुआ. एक दौर में टीम में क्वेटा और पेशावर के खिलाड़ी भी शामिल थे.

मैदान के गीला होने पर इसी क्लब के खिलाड़ियों ने बूट पहनकर खेलना शुरू किया. तब कोलकाता के प्रमुख क्लब के खिलाड़ी नंगे पांव खेला करते थे.

1933 में मोहम्मडन स्पोर्टिंग के छह खिलाड़ी एक मुक़ाबले में बूट पहन कर खेलने उतरे और स्थानीय टीम को 16-0 से धो डाला.

क्लब की कामयाबी का असर ऐसा था कि महान कवि काज़ी नज़रूल इस्लाम ने टीम के सम्मान में गीत की रचना की. उस दौर में टीम की कामयाबी पर मुस्लिम नेता भी जश्न मनाते थे.

स्वतंत्रता से लगा झटका

तब के अहम नेता और ब्रिटिश शासित बंगाल के प्रधानमंत्री रहे एके फज़लूल हक़ ने कहा था कि मोहम्मडन स्पोर्टिंग ने खेल की दुनिया में जो नाम कमाया है, उस पर समुदाय को गर्व है.

इमेज कॉपीरइट Roony Roy

जब मोहम्मडन स्पोर्टिंग ने 1940 में तत्कालीन बंबई में रोवर्स कप जीता था, तब मुस्लिम लीग के नेता और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली ज़िन्ना ने मुस्लिम छात्रों से कहा था कि खेल के जरिए भी मुस्लिम समुदाय को फ़ायदा हो सकता है.

भारत की स्वतंत्रता और पाकिस्तान के बनने से मोहम्मडन स्पोर्टिंग को बड़ा झटका लगा था. ज़्यादातर खिलाड़ी पाकिस्तान के हिस्से वाले बंगाल में चले गए थे.

1950 के दशक से पहले टीम में ज़्यादातर मुस्लिम खिलाड़ी होते थे, लेकिन 1960 के दशक से गैर-मुस्लिम खिलाड़ियों की संख्या बढ़ने लगी.

अभी उम्मीद बाक़ी है

1980 में कोलकाता के मुस्लिम कारोबारियों ने क्लब का प्रबंधन संभाला. टीम में मोहन बगान और ईस्ट बंगाल के कई खिलाड़ियों को शामिल किया गया और क्लब ने कई टूर्नामेंट जीते.

1981 में करीब 15 साल बाद टीम कोलकाता लीग का ख़िताब जीतने में कामयाब हुई.

इमेज कॉपीरइट Roony Roy

तब टीम में आठ हिंदू खिलाड़ी शामिल थे.

लेकिन बीते कई सालों से टीम की आर्थिक स्थिति ख़राब है. इसका असर टीम के प्रदर्शन पर भी पड़ा और टीम 2013-14 सीज़न में आई लीग के सेकंड डिवीजन में पहुंच गई है.

अभी 123 साल पुराने इस क्लब को पटरी पर लाया जा सकता है, ज़रूरत है कुछ कड़े फ़ैसले लिए जाने की और बेहतर लीडरशिप की.

(लेखक नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में पढ़ाते हैं. वे बीइंग मुस्लिम इन साउथ एशिया: डायवर्सिटी एंड डेली लाइफ़ के सह-संपादक हैं)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार