ऐसे बदली भारतीय हॉकी की तकदीर!

  • 11 नवंबर 2014
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Image caption भारतीय हॉकी टीम के कप्तान सरदार सिंह ड्रिबल करते हुए.

भारत ने पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में खेली गई चार टेस्ट मैचों की सिरीज़ को 3-1 से अपने नाम किया.

ऐसा पहली बार हुआ है. इससे पहले दोनों देशों के बीच चार हॉकी टेस्ट सिरीज़ हुई जिसमें एक बराबरी पर समाप्त छूटा जबकि भारत तीन में पराजित हुआ.

आखिरकार यह चमत्कार कैसे हुआ, यह जानने से पहले दोनों टीमों की वर्तमान स्थिति और ताक़त को समझना बेहद ज़रूरी है.

हॉकी की दुनिया की सबसे मज़बूत टीम ऑस्ट्रेलिया का दबदबा इस खेल में किस क़दर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान समय में वह विश्व चैंपियन हैं तो पिछले लंदन ओलंपिक में उसने तीसरा स्थान हासिल किया था.

इसके अलावा वह चैंपियंस ट्रॉफी की विजेता भी है. इतना ही नही वह राष्ट्रमंडल खेलों की भी चैंपियन है, जहां फाइनल में उसने भारत को ही 4-0 से हराया था.

जीत का सेहरा

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Image caption रुपिंदर पाल सिंह और कोच टेरी वॉल्श खुशी के पलों में.

दूसरी तरफ अगर भारत की बात की जाए तो उसने आखिरी बार साल 1980 में मॉस्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता था.

इसके अलावा साल 2004 के बीजिंग ओलंपिक में भारतीय टीम जगह तक नही बना सकी थी. आठ बार के ओलंपिक चैंपियन भारत के हॉकी इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ.

ऑस्ट्रेलिया अभी तक 13 बार चैंपियंस ट्रॉफी जीत चुका है. साल 2008 से तो लगातार उसी के सिर जीत का सेहरा बंधता रहा है.

भारत आज तक चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल तक भी नही पहुंचा है.

वहीं ऑस्ट्रेलिया तीन बार(1986, 2010, 2014) में विश्व चैंपियन रहा है जबकि भारत केवल एक बार साल 1975 में विश्व चैंपियन बन सका है.

भारत पिछले विश्व कप में नौवें स्थान पर रहा था. पहले मैच में 4-0 से हार के बाद भारतीय टीम का खेल कैसे बदला और कैसे बदली तक़दीर, इसके पांच मुख्य कारण रहे.

पहला कारण

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Image caption भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया में अपने प्रदर्शन से अपने आलोचकों को चुप करा दिया.

टीम के कोचों और कप्तान की जुगलबंदी. यह टीम सरदार सिंह की कप्तानी में पिछले कई सालों से खेल रही है.

इस टीम के चीफ कोच ऑस्ट्रेलिया के पूर्व महान खिलाड़ी टेरी वॉल्श हैं जिनकी कोचिंग में भारत ने पिछले दिनों 16 साल बाद एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता.

इसके अलावा पिछले राष्ट्रमंडल खेलों के फाइनल में पहुंचने से टीम का आत्मविश्वास बढ़ा, भले ही वह ऑस्ट्रेलिया से 4-0 से हारे.

इसके अलावा टीम के साथ एमके कौशिक के रूप में अनुभवी खिलाड़ी का सहायक कोच के रूप में जुडना भी रहा.

उल्लेखनीय है कि कौशिक की कोचिंग में ही भारत ने 16 साल पहले बैंकाक में एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता था.

दूसरा कारण

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खिलाड़ियों की समझ में जीत की अहमियत आना है.

लगातार एक के बाद एक हार से कुंठित भारतीय खिलाड़ियों को एशियाई खेलों में कामयाबी के बाद देशवासियों से ज़बरदस्त वाहवाही के अलावा ढ़ेरों नकद इनाम और दूसरे पुरस्कार मिले.

तीसरा कारण

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Image caption जीत का जश्न मनाते हुए दानिश मुज्तबा और आकाशदीप सिंह.

भारतीय खिलाड़ियों का हॉकी इंडिया लीग में विदेशी खिलाड़ियों के साथ खेलना भी अहम है, जिससे उनकी झिझक खुली.

एक साथ एक ही ड्रेसिंग रूम में रहने, लगातार संवाद करने से और साथ खेलने से उनके खेल की जानकारी भी मिली.

इसके अलावा चार क्वार्टर में खेले जाने वाली हॉकी इंडिया लीग में खेलने के अनुभव का लाभ मिला क्योंकि वर्तमान अंतराष्ट्रीय हॉकी इसी तर्ज पर खेली जाती है.

हॉकी इंडिया लीग में खिलाड़ियों को नीलामी में ढ़ेरो पैसा भी मिला. इससे खेल के और अपने प्रति सम्मान का भाव भी पैदा हुआ.

चौथा कारण

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इस टीम का लगातार खेलना है. इस टीम के कम से कम 12-13 खिलाड़ी पिछले 7-8 साल से टीम में बने हुए हैं.

इस टीम के छह खिलाड़ी 100 से अधिक मैचों का अनुभव अपने साथ रखते हैं.

बाक़ी खिलाड़ी भी 40 से 60 मैचों का अनुभव रखते हैं. ऐसे में कमी केवल एक बड़ी जीत की थी.

पांचवां कारण

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टीम के गोलकीपर पी श्रीजेश का ज़बरदस्त बचाव और फॉरवर्ड लाइन का फॉर्म में आना रहा.

श्रीजेश के दम पर ही भारत ने टाईब्रेकर में एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता तो ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ भी उनका दीवार बनकर खड़े रहना टीम में जोश भर गया.

गोल खाने की चिंता छोडकर कप्तान सरदार सिंह, एसवी सुनील, आकाशदीप सिंह, रमनदीप सिंह, एसके उथप्पा और रुपिंदर पाल सिंह एक के बाद एक हमले करने में कामयाब रहे.

'आखिरकार आक्रमण ही सर्वश्रेष्ठ बचाव है' वाली नीति कामयाब रही.

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