विदेशों में जुगनू जैसे चमकते खिलाड़ी

  • 16 मई 2015
सिम भूल्लर

पिछले दिनों भारतीय मूल के कनाडावासी बास्केटबाल खिलाड़ी सिम भुल्लर मीडिया में छाए रहे.

उन्हें एनबीए में सैक्रामेंटो किंग्स की ओर से कोर्ट पर उतरने का अवसर मिला. ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाले वह पहले भारतीय मूल के खिलाड़ी है.

अब यह बात अलग है कि उन्हें केवल पहले मैच में 16 सेकेंड खेलने का मौक़ा मिला.

वैसे भारतीय व्यवसायी विवेक राणादिवे के क्लब की ओर से 10 दिन के अनुबंध के दौरान वह तीन मैचों में दो मिनट 41 सेकेंड ही कोर्ट पर बिता पाए.

हुनर से न्याय

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इसके अलावा एक ख़बर फ़ुटबॉल से भी आई जब एफसी गोवा और डेम्पो के खिलाड़ी रोमियो फर्नांडिज एशिया के बाहर किसी पेशेवर लीग में खेलने वाले पहले आउटफ़ील्ड खिलाड़ी बने.

रोमियो को ब्राज़ीली फ़ुटबॉल क्लब एटलेटिको पीआर ने आई-लीग टीम डेम्पो से लोन पर लिया है. 22 वर्षीय मिडफील्डर रोमियो इंडियन सुपर लीग में अपना कमाल दिखा चुके है. वह भारत की अंडर-23 टीम के सदस्य भी रह चुके हैं.

उन्हें एटलेटिको की ओर से नेशनल पीआर टीम के ख़िलाफ़ तब मैदान में उतारा गया जब 69वें मिनट के खेल तक एटलेटिको 4-0 से आगे थी.

लेकिन क्या कुछ समय के लिए मैदान में उतरकर भारतीय खिलाड़ी अपनी छाप छोड़ सकते हैं.

क्या देश में ध्रुव तारे जैसी साख रखने वाले खिलाड़ी विदेशों में जुगनू जैसी पल दो पल की चमक दिखाकर अपने हुनर से न्याय कर पाते हैं. और सबसे बड़ा सवाल कि क्या इनकी प्रतिभा पर इनके टीम मालिकों को पूरा भरोसा होता है.

क्षमता पर भरोसा

इसका जवाब जानने के लिए भारत के पूर्व कप्तान बाइचुंग भूटिया और सुनील छेत्री का उदाहरण काफी है. भारतीय फुटबॉल जगत के यह दो बड़े नाम विदेश में गुमनाम होकर रह गए.

सुनील छेत्री को स्पोर्टिंग क्लब डी पुर्तगाल से अनुबंध मिला लेकिन वह कोई मैच नहीं खेल सके.

जाने-माने फुटबॉल समीक्षक नोवी कपाडिया बाइचुंग भूटिया के विदेशी टीमों में खेलने को लेकर कहते हैं कि भूटिया साल 1999 से 2002 तक इंग्लैंड के बरी फुटबॉल क्लब गए. वह सेकेंड डिविज़न में खेले जो वास्तव में थर्ड डिविज़न है क्योंकि मुख्य रूप से तो वहां प्रीमियरशिप होती है, उसके बाद फर्स्ट और सेकेंड डिविज़न.

बाइचुंग भूटिया की बदक़िस्मती भी रही कि जिन कोच ने उन्हें चुना उन्हें बाद में बरी क्लब ने हटा दिया. नए कोच को भूटिया की क्षमता पर ही भरोसा नहीं था.

ऊंचा स्तर

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इसके बाद सुनील छेत्री अमरीका के लॉस एजेंलेस गैलेक्सी में गए जो वहां की मुख्य फुटबॉल लीग थी लेकिन उन्हें एक भी मैच खेलने को नहीं मिला.

उसके बाद वह पुर्तगाल की स्पोर्टिंग लिस्बन में गए जो वहां की फर्स्ट डिविज़न की टीम है लेकिन वहां भी वह उनकी बी टीम में खेले जो वास्तव में उनकी रिजर्व टीम है.

तो भारतीय खिलाड़ी क्या करें. इसे लेकर नोवी कपाडिया कहते हैं कि भारतीय खिलाड़ी वहां खेले जहां उनके और दूसरे खिलाड़ियों के स्तर में अधिक अंतर ना हो. अब अगर भारतीय खिलाड़ी ब्राज़ील और पुर्तगाल या इंग्लैंड में खेलेंगे जिनका स्तर भारत से बहुत ऊंचा है वहां उन्हें अवसर मिलना असंभव है.

बाइचुंग भूटिया भारत के लिए 107 जबकि सुनील छेत्री 82 अंतराष्ट्रीय मैच खेल चुके हैं.

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